Gita Saar In Hindi Pdf / सम्पूर्ण गीता सार इन हिंदी डाउनलोड pdf

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Gita Saar In Hindi Pdf / गीता सार इन हिंदी पीडीऍफ़ डाउनलोड

 

 

 

 

 

 

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मोहरूपी सघन वन –  श्री कृष्ण कहते है – जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी सघन वन को पार कर जाएगी तब तुम सुने हुए तथा सुनने योग्य सबके प्रति अन्यमनस्क हो जाओगे।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – वैदिक रस्मे यथा अनुष्ठान तथा त्रिकाल संध्या, प्रातः कालीन स्नान, पितृ तर्पण आदि क्रियाए नव दीक्षितो के लिए अनिवार्य होती है।

 

 

 

किन्तु जब कोई पूर्णतया कृष्ण भावनाभावित हो जाता है और कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा हुआ हो तो इन विधि-विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है। भगवद्भक्तो के जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त है जिन्हे भगवद्भक्ति के कारण वैदिक कर्मकांड से विरक्ति उत्पन्न हो गयी।

 

 

 

यदि कोई परमेश्वर कृष्ण की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त होता है तो उसे शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार के कर्म तथा तपस्या व यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है इसी प्रकार जो यह नहीं समझता कि वेदो का उद्देश्य कृष्ण तक पहुंचना है। वह अपने आपको अनुष्ठान आदि में व्यस्त रखता है, वह केवल अपना समय नष्ट करता है। कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति शब्द ब्रह्म की सीमा या वेदो तथा उपनिषदों का परिधि को भी लाँघ जाते है।

 

 

 

जब मनुष्य श्री कृष्ण को तथा उनके साथ अपने संबंध को वास्तविक रूप में समझ लेता है तो वह सकाम कर्मो के अनुष्ठानो के प्रति पूर्णतया अन्यमनस्क हो जाता है। भले ही वह अनुभवी ब्राह्मण क्यों न हो। भक्त परम्परा के महान भक्त तथा आचार्य माधवेन्द्रपुरी का कहना है —

 

 

 

 

हे मेरी त्रिकाल प्रार्थनाओ तुम्हारी जय हो। हे स्नान तुम्हे प्रणाम है, हे देवपितृगण अब मैं आप लोगो के लिए तर्पण करने के में असमर्थ हूँ। अब तो जहां भी बैठता हूँ, यादव कुलवंशी – कंश के हन्ता श्री कृष्ण का ही स्मरण करता हूँ और इस तरह मैं अपने पापमय बंधन से मुक्त हो सकता हूँ। मैं सोचता हूँ यही मेरे लिए पर्याप्त है।

 

 

 

अपने कर्म भगवान को अर्पित करके (शुभारंभ फल से मुक्ति) – श्री कृष्ण कहते है – इस तरह से तुम कर्म के बंधन तथा उसके शुभ और अशुभ फल से मुक्त हो सकोगे। इस सन्यास योग में अपने को चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – गुरु के निर्देशन में कृष्ण भावनामृत में रहकर कर्म करने को युक्त कहते है। पारिभाषिक शब्द युक्त – वैराग्य है।

 

 

 

श्री रूप गोस्वामी ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है – (भक्ति रसामृत सिंधु 2,255) – श्री रूप गोस्वामी कहते है कि जब तक हम इस जगत में है तब तक हमे कर्म करना पड़ता है हम कर्म करना बंद नहीं कर सकते।

 

 

 

अतः यदि कर्म करके उसके फल कृष्ण को अर्पित कर दिए जाये तो यह युक्त वैराग्य कहलाता है। वस्तुतः सन्यास में स्थित होने पर ऐसे कर्मो से चित्त रूपी दर्पण स्वच्छ हो जाते है और कर्ता ज्यों-ज्यों क्रमशः आत्मसाक्षात्कार की ओर प्रगति करता है त्यों-त्यों वह परमेश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित होता रहता है। अतएव वह अंत में वह मुक्त हो जाता है और यह मुक्ति भी विशिष्ट होती है।

 

 

 

मुक्ति की पांच विशिष्ट अवस्थाए है और यहां पर स्पष्ट किया गया है। जो भक्त जीवन भर परमेश्वर के निर्देशन में रहता है। वह ऐसी अवस्था (मुक्त) को प्राप्त हुआ रहता है।

 

 

 

जहां से वह शरीर त्यागने के बाद भगवद्धाम जा सकता है और भगवान की संगति में रह सकता है। इस मुक्ति से वह (भक्त) ब्रह्म ज्योति में तदाकार नहीं होता है। अपितु भगवद्धाम में प्रवेश करता है। स्पष्ट उल्लेख है – माम उपैष्यसि – वह मेरे पास आता है, अर्थात मेरे धाम में वापस आता है .

 

 

 

जिस व्यक्ति को अपने जीवन में भगवत सेवा में रत रहने के अतिरिक्त अन्य कोई रूचि नहीं होती है वही वास्तविक सन्यासी होता है। वह जो कुछ कर्म करता है भगवान की सेवा के लिए ही करता है।

 

 

 

वह सकाम कर्मो और वेद वर्णित कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता है ऐसा व्यक्ति भगवान की परम इच्छा पर आश्रित रहते हुए अपने को उनका नित्य दास मानता है।

 

 

 

अतः वह जो कुछ भी करता है भगवान के लाभ के लिए ही करता है। वह जो कुछ कर्म करता है भगवान की सेवा करने के लिए ही करता है।

 

 

 

सामान्य मनुष्यो के लिए वेद वर्णित कर्तव्यों को सम्पन्न करना अनिवार्य होता है। किन्तु शुद्ध भक्त भगवान की सेवा में पूर्णतया रत होकर भी कभी-कभी वेदो द्वारा अनुमोदित कर्तव्यों का विरोध करता प्रतीत होता है जो वस्तुतः विरोध नहीं है।

 

 

 

इस प्रकार जो व्यक्ति जो भगवान की सेवा में रत है या जो निरंतर ही योजना बनाता रहता है कि किस तरह से भगवान की सेवा की जाय, उसे ही वर्तमान में पूर्णतया मुक्त मानना चाहिए और भविष्य में उसका भगवद्धाम जाना ध्रुव है।

 

 

 

जिस प्रकार से कृष्ण सारी आलोचनाओं से परे है। उसी प्रकार से वह भक्त भी आलोचना से परे हो जाता है। अतः वैष्णव आचार्यो का कथन है कि बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी भक्त की योजनाओ तथा कार्यो को समझ सकता है – जैसा कि इन शब्दों में कहा गया है – तार वाक्य, क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुझय” – (चैतन्य चरितामृत मध्य 23,39)।

 

 

 

 

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