Ganesh Aarti Pdf in Hindi / गणेश आरती Pdf Free

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Ganesh Aarti Pdf देने जा रहे हैं। आप नीचे की लिंक से गणेश आरती Pdf Free Download कर सकते हैं।

 

 

 

Ganesh Aarti Pdf in Hindi / गणेश आरती फ्री डाउनलोड 

 

 

 

Ganesh Aarti in Hindi Pdf Free

 

 

 

 

 

 

गणेश आरती के लाभ 

 

 

 

मित्रों अब हम आपको गणेश आरती के लाभ बताने जा रहे हैं। भगवान गजानन प्रथमेश हैं। बिना भगवान गणेश के कोई भी पूजा सफल नहीं हो सकती है। आईये अब गणेश जी की आरती के लाभ के बारे में जानते हैं।

 

 

 

1- जिस घर में रोजाना भगवान श्री गणेश जी की आरती होती है, उस घर में कभी भी धन – धान्य की कमी नहीं पड़ती है।

 

2 – भगवान श्री गणेश जी की आरती से घर में खुशहाली रहती है।

 

3 – भगवान गणेश की आरती से सभी देवी – देवता प्रसन्न होते हैं।

 

 

 

Ganesh Aarti in Hindi Written

 

 

 

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल,
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल,

 

जय जय जय गणपति गणराजूमंगल भरण करण शुभ काजू,
जै गजबदन सदन सुखदाता विश्व विनायक बुद्घि विधाता !!

 

 

 

!!  वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन,
राजत मणि मुक्तन उर माला स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला,

 

 

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं  मोदक भोग सुगन्धित फूलं,
सुन्दर पीताम्बर तन साजित  चरण पादुका मुनि मन राजित  !!

 

 

 

!!  धनि शिवसुवन षडानन भ्राता  गौरी ललन विश्वविख्याता,
ऋद्घिसिद्घि तव चंवर सुधारे  मूषक वाहन सोहत द्घारे,

 

 

कहौ जन्म शुभकथा तुम्हारी  अति शुचि पावन मंगलकारी,
एक समय गिरिराज कुमारी  पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी !!

 

 

 

!!  भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा  तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा,
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी  बहुविधि सेवा करी तुम्हारी,

 

 

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा  मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा,
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला  बिना गर्भ धारण, यहि काला !!

 

 

!!  गणनायक, गुण ज्ञान निधाना  पूजित प्रथम, रुप भगवाना,
अस कहि अन्तर्धान रुप है  पलना पर बालक स्वरुप है,

 

 

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना,
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं  नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं  !!

 

 

 

!!  शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं  सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं,
लखि अति आनन्द मंगल साजा  देखन भी आये शनि राजा ,

 

 

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं  बालक, देखन चाहत नाहीं,
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो  उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो !!

 

 

 

!!  कहन लगे शनि, मन सकुचाई  का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई,
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ  शनि सों बालक देखन कहाऊ,

 

 

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा  बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ,
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी  सो दुख दशा गयो नहीं वरणी  !!

 

 

 

!!  हाहाकार मच्यो कैलाशा  शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ,
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो  काटि चक्र सो गज शिर लाये,

 

 

बालक के धड़ ऊपर धारयो  प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो,
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे  प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे !!

 

 

 

!!  बुद्घ परीक्षा जब शिव कीन्हा  पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा,
चले षडानन, भरमि भुलाई रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई,

 

 

चरण मातुपितु के धर लीन्हें  तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें,
तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई  शेष सहसमुख सके न गाई !!

 

 

 

!!  मैं मतिहीन मलीन दुखारी  करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी,
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा  जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा,

 

 

अब प्रभु दया दीन पर कीजै  अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै !!

 

 

 

ll दोहा ll

!!  श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान,
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान,

 

 

सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश,
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश !!

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

अर्जुन कहता है कि – हे कृष्ण ! आपने मुझसे जो कहा है। उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ। हे प्रभु ! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरुप को समझ सकते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जैसा कि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में कहा गया है। भगवद्गीता के समझने की गुरु परंपरा विलुप्त हो गई थी।

 

 

 

 

अतः कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान देकर उसकी पुनः स्थापना की, क्योंकि वह अर्जुन को वह (कृष्ण) अपना परम प्रिय सखा तथा भक्त समझते थे।

 

 

 

 

यह पर अर्जुन इसकी पुष्टि करता है कि श्रद्धा विहीन तथा आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग कृष्ण को नहीं समझ सकते है। जब देवतागण कृष्ण को नहीं समझ सकते तो आधुनिक जगत के तथाकथित विद्वानों का कहना ही क्या है? भगवद्कृपा से ही अर्जुन समझ गया कि परम सत्य कृष्ण है और वह सम्पूर्ण है।

 

 

 

 

 

अतः हमे अर्जुन के पथ का ही अनुसरण करना चाहिए। उसे भगवद्गीता का प्रमाण प्राप्त था। अतः जैसा कि गीतोपनिषद की भूमिका में हमने कहा है कि भगवद्गीता का ज्ञान परंपरा विधि से ही प्राप्त करना उत्तम रहता है।

 

 

 

 

 

परंपरा विधि के लुप्त होने पर उसके सूत्रपात के लिए ही अर्जुन को चुना गया। हमे चाहिए कि अर्जुन का हम अनुसरण करे जिसने कृष्ण की सारी बातें जान ली। तभी हम भगवद्गीता के सार को समझ सकेंगे और तभी हम कृष्ण को भगवान के रूप में जान सकेंगे।

 

 

 

 

 

 

15- भगवान (कृष्ण) को जानना (भक्ति के माध्यम से) – अर्जुन ने कहा – हे पुरुषोत्तम सबके उद्गम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवो के देव हे ब्रह्माण्ड के प्रभु ! निःसंदेह एकमात्र आप ही अपने को अपनी अंतरंगा शक्ति से जानने वाले है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – परम सत्य का अनुभव तीन प्रकार से किया जाता है 1- निराकार ब्रह्म 2- अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान के रूप में, अतः परम सत्य के ज्ञान की अंतिम अवस्था भगवान है।

 

 

 

 

हो सकता है कि सामान्य व्यक्ति अथवा ऐसा मुक्त पुरुष भी जिसने निराकार ब्रह्म अथवा अन्तर्यामी परमात्मा का साक्षात्कार किया है।

 

 

 

 

वह भी भगवान को न समझ पाए अतः ऐसे व्यक्तियों के लिए भगवद्गीता के माध्यम से भगवान को समझने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए जिसे स्वयं कृष्ण ने श्लोको के माध्यम से कहा है।

 

 

 

 

परमेश्वर कृष्ण को वही जान सकता है जो अर्जुन तथा उसके अनुयायियों की भांति भक्ति करने के माध्यम से भगवान के सम्पर्क में रहते है। आसुरी या नास्तिक प्रकृति के लोग कृष्ण को नहीं जान सकते है या कि ऐसे लोगो के लिए कृष्ण जानना संभव नहीं है क्योंकि उनकी बुद्धि कृष्ण की परा शक्ति (माया) से ढकी हुई रहती है।

 

 

 

 

जो कृष्ण नहीं जानता है उसे भगवद्गीता की टीका करने का तो कत्तई प्रयास नहीं करना चाहिए और भगवान से दूर ले जाने वाला मनोधर्म तो परम घातक होता है।

 

 

 

 

भगवद्गीता कृष्ण की वाणी है और चूँकि यह कृष्ण का तत्व विज्ञान है अतः इसे कृष्ण से ही समझना चाहिए। जैसा कि अर्जुन ने किया इसे नास्तिको से ग्रहण नहीं करना चाहिए। श्रीमद्भागवत में (1,2,11) कहा गया है कि –

वदन्ति तत्त्वविदस्तत्वं यज्ज्ञान मद्वयम। 

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानीति शब्द्यते।।  

 

 

 

 

यदि कोई (कृष्ण) को भूतेश रूप में समझ लेता है तो भी उन्हें परम नियंता के रूप में नहीं जान पाता है। इसलिए उन्हें यहां पर भूतेश या परम नियंता कहा गया है।

 

 

 

 

यदि कोई भूतेश रूप में उन्हें (कृष्ण) को समझ लेता है तो भी उन्हें समस्त देवताओ के उद्गम के रूप में नहीं समझ पाता है। इसलिए उन्हें देव-देव, सभी देवताओ का पुज्यनीय देव कहा गया है।

 

 

 

 

कभी-कभी निर्विशेषवादी कृष्ण को भगवान के रूप में या उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार करते है। किन्तु अनेक मुक्त पुरुष कृष्ण को पुरुषोत्तम रूप में नहीं समझ पाते इसलिए अर्जुन ने उन्हें पुरुषोत्तम कहकर सम्बोधित किया है।

 

 

 

 

इतने पर भी कुछ लोग नहीं समझ पाते कि कृष्ण ही समस्त जीवो के जनक है। इसलिए अर्जुन उन्हें भूत भावन कहकर सम्बोधित करता है।

 

 

 

 

यदि कृष्ण को देव-देव के रूप में समझ लिया जाय तो वह (कृष्ण) प्रत्येक वस्तु के स्वामी के रूप में समझ नहीं आते। इसलिए अर्जुन उन्हें यहां पर जगत्पति कहता है।

 

 

 

 

इसलिए अर्जुन की अनुभूति के आधार पर कृष्ण विषयक सत्य की स्थापना इस श्लोक में हुई है। हमे चाहिए कि कृष्ण को यथा रूप में समझने के लिए हम अर्जुन के पद चिन्हो का अनुसरण करे।

 

 

 

 

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