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Ek Yogi Ki Atmakatha Pdf / Agama shastra pdf / Tantra Mantra Books

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मित्रों इस पोस्ट में हम आपको Ek Yogi Ki Atmakatha Pdf / Agama shastra pdf दे रहे हैं। आप इसे नीचे की लिंक से फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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Ek Yogi Ki Atmakatha Pdf / Aapke Avchetan Man Ki Shakti Pdf

 

 

 

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Ek Yogi Ki Atmakatha Pdf
Ek Yogi ki Atmakatha in Hindi PDF Download
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आगम और तंत्र
आगम शास्त्र यहाँ से डाउनलोड करें। 
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Tantra Mantra Books in Hindi Pdf
धूमावती और बगलामुखी तांत्रिक साधना यहां से डाउनलोड करे।
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श्री षोडशी तन्त्र साधना
श्री षोडशी तंत्र साधना यहां से डाउनलोड करे।
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Tantra Shakti
तंत्र शक्ति यहां से डाउनलोड करे।
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कुण्डलिनी शक्ति कैसे जागृत करें
कुण्डिलीनी शक्ति कैसे जागृत करें।
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Brihad Indrajala
बृहद इंद्रजाल यहां से डाउनलोड करे।
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Muslim Tantra
मुस्लिम तंत्र यहां से डाउनलोड करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

स्मरण शक्ति का विभ्रम (मोह से) – श्री कृष्ण कहते है – क्रोध से पूर्ण मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मरण शक्ति का विभ्रम हो जाता है। जब स्मरण शक्ति भ्रमित हो जाती है तो बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य भवकूप में पुनः गिर जाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – श्रील रूप गोस्वामी का यह आदेश है –

पपश्चिकतया बुद्धया हरि संबंधि वस्तुनः।

मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते।।

 

 

कृष्ण भावनामृत के विकास से मनुष्य यह जान सकता है कि प्रत्येक वस्तु का उपयोग भगवान की सेवा के लिए किया जा सकता है। जो कृष्ण भावनामृत के ज्ञान से रहित है उनका तथाकथित वैराग्य फल्गु अर्थात गौण कहलाता है। वह कृतिम ढंग से बचाने का प्रयास करते है। फलतः उनकी मोक्ष कामना होते हुए भी उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं होता है अथवा उनको वैराग्य की चरम अवस्था भी प्राप्त नहीं हो पाती है। कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति की स्थिति सर्वदा ही उन सबके विपरीत होती है जो भगवद्भक्त या कृष्ण भावनाभावित नहीं है कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति जानता है प्रत्येक वस्तु का उपयोग भगवान  में किस प्रकार से किया जाय फलतः उसे भौतिक माया बाँध नहीं पाती अर्थात वह भौतिक चेतना का शिकार नहीं होता है।

 

 

 

 

कृष्ण भावनामृत से सरावोर व्यक्ति (भक्त) यह जानता है कि कृष्ण परम भोक्ता है और भक्ति पूर्वक उन्हें जो भी भेट अर्पित की जाती है उसे वह ग्रहण अवश्य करते है अतः भगवान को अच्छा भोजन चढाने के बाद भक्त उस भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है। लेकिन जो निर्विशेषवादी है उनके अनुसार भगवान निराकार होने के कारण भोजन नहीं कर सकते है। अतः वह अच्छे खाद्यों से बचता है कृष्ण को अर्पित की हुई हर वस्तु प्राणवान हो जाती है अर्थात हर उस वस्तु में कृष्ण भावनामृत का संचार हो उठता है जो कृष्ण को अर्पित की जाती है और उस वस्तु को प्रसाद स्वरुप में ग्रहण करने पर भक्त के अधः पतन का कोई संकट नहीं रहता है। जबकि ऐसी वस्तुओ का जो कृष्ण को अर्पित की जाती है। अभक्त इसे पदार्थ रूप में तिरस्कार कर देता है।

 

 

 

 

कृष्ण भक्ति के बिना जीव मुक्ति के स्तर तक पहुँचने के बाद भी नीचे गिर जाता है क्योंकि उसे भक्ति का जरा भी आश्रय नहीं मिलता है। निर्विशेषवादी अपने कृतिम त्याग के कारण ही जीवन को भोग नहीं पाता यही कारण है कि मन के थोड़े से विचलन से वह पुनः भवकूप में आ गिरता है।

 

 

 

 

 

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