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Educational Psychology pd Pathak pdf / शिक्षा मनोविज्ञान Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Educational Psychology pd Pathak pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Educational Psychology pd Pathak pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Life Ke Kadve Sach book Pdf कर सकते हैं।

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Educational Psychology pd Pathak pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम  Educational Psychology pd Pathak pdf
पुस्तक के लेखक  पी.डी. पाठक 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  18.9 Mb 
पृष्ठ  566 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  मनोवैज्ञानिक 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

यह सब करके शांत भाव से बैठकर भक्तवत्सल शंकर का ध्यान करना चाहिए। मैं भगवान शिव का ध्यान बता रहा हूँ जिसके अनुसार उनका चिंतन करके मंत्र जप करना चाहिए। इस तरह निरंतर जप करने से बुद्धिमान पुरुष भगवान शिव के प्रभाव से उस मंत्र को सिद्ध कर लेता है।

 

 

 

जो अपने दो करकमलो में रखे हुए दो कलशो से जल निकालकर उनसे ऊपर वाले दो हाथो द्वारा अपने मस्तक सींचते है। अन्य दो हाथो में दो घड़े लिए उन्हें अपनी गोद में रखे हुए है तथा शेष दो हाथो में रुद्राक्ष एवं मृगमुद्रा धारण करते है, कमल के आसन पर बैठे है।

 

 

 

सिर पर स्थित चन्द्रमा से निरंतर झरते हुए अमृत से जिनका सारा शरीर भींगा हुआ है तथा जो तीन नेत्र धारण करने वाले है उन भगवान मृत्युंजय का जिनके साथ गिरिजानन्दिनी उमा भी विराजमान है मैं भजन करता हूँ। ब्रह्मा जी कहते है – तात! मुनिश्रेष्ठ दधीचि को इस प्रकार उपदेश देकर शुक्राचार्य भगवान शंकर का स्मरण करते हुए अपने स्थान को लौट गए।

 

 

 

उनकी यह बात सुनकर महामुनि दधीचि बड़े प्रेम से शिव जी का स्मरण करते हुए तपस्या के लिए वन में गए। वहां जाकर उन्होंने विधिपूर्वक महामृत्युंजय मंत्र का जप और प्रेम पूर्वक भगवान शिव का चिंतन करते हुए तपस्या प्रारंभ की। दीर्घकाल तक उस मंत्र का जप और तपस्या द्वारा भगवान शंकर की आराधना करके दधीचि ने महामृत्युंजय शिव को संतुष्ट किया।

 

 

 

महामुने! उस जप से प्रसन्नचित्त हुए भक्तवत्सल भगवान शिव दधीचि के प्रेम वश उनके सामने प्रकट हो गए। अपने प्रभु शंभु का साक्षात् दर्शन करके मुनीश्वर  दधीचि को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विधि पूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ भक्तिभाव से भगवान शंकर का स्तवन किया।

 

 

 

तात! मुने! तदनन्तर मुनि के प्रेम से प्रसन्न हुए शिव ने च्यवनकुमार दधीचि से कहा – तुम वर मांगो। भगवान शिव का यह वचन सुनकर भक्त शिरोमणि दधीचि दोनों हाथ जोड़ नतमस्तक हो भक्तवत्सल शंकर से बोले – देवदेव महादेव! मुझे तीन वर दीजिए।

 

 

 

मेरी हड्डी सबसे मजबूत हो जाए। कोई भी मेरा वध न कर सके और मैं सर्वत्र अदीन रहूं ककभी मुझमे दीनता न आये। दधीचि का यह वचन सुनकर प्रसन्न हुए परमेश्वर शिव ने तथास्तु कहकर उन्हें वे तीनो वर दिए। शिव जी से तीन वर पाकर वेदमार्ग में प्रतिष्ठित महामुनि दधीचि आनंदमग्न हो गए और शीघ्र ही राजा क्षुव के स्थान में गए।

 

 

 

महादेव जी से अवध्यता वज्रमय अस्थि और अदीनता पाकर दधीचि न राजेंद्र क्षुव के मस्तक पर वार किया। फिर तो राजा क्षुव भी क्रोध करके दधीचि पर प्रहार किया। वे भगवान विष्णु के गौरव से अधिक गर्व में भरे हुए थे। परन्तु क्षुव का चलाया हुआ वह परमेश्वर शिव के प्रभाव से महात्मा दधीचि का नाश न कर सका।

 

 

 

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