Durga Kavach Pdf in Hindi / दुर्गा कवच हिंदी Pdf

नमस्कार मित्रों, आज हम आपको Durga Kavach Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से दुर्गा कवच हिंदी Pdf Download कर सकते हैं।

 

 

 

Durga Kavach Pdf Download / दुर्गा कवच पाठ Pdf 

 

 

 

दुर्गा कवच हिंदी में pdf download

 

 

 

 

 

 

दुर्गा कवच के फायदे 

 

 

मित्रो अब हम आपको बताने जा रहे है कि Durga Kavach Ke Fayde क्या है।

 

 

1- दुर्गा कवच के पाठ से धन-धान्य की कमी नहीं होती है।

2- दुर्गा कवच के पठन से रोग-दोष समाप्त होते है।

3- दुर्गा कवच के पाठ से घर में खुशहाली आती है।

4- दुर्गा कवच के पाठ से घर का वातावरण सुखमय और शांत रहता है।

5- दुर्गा कवच के पाठ से साधक को सुख शांति मिलती है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान अर्जुन से यहां पुरुषोत्तम योग के विषय में कह रहे है – भगवान ने कहा – कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष है जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर है और शाखाये नीचे की ओर तथा पत्तियां वैदिक स्त्रोत्र है। जो इस वृक्ष को जानता है वह वेदो का ज्ञाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भक्ति योग की विवेचना के बाद पूछा जा सकता है। “वेदो का क्या प्रयोजन है।” इस अध्याय में बताया गया है कि वैदिक अध्ययन का प्रयोजन कृष्ण को समझना है।

 

 

 

अतः जो कृष्ण भावनाभावित है जो भक्ति में रत है वह वेदो को पहले से जानता है। यद्यपि इस संसार में ऐसे वृक्ष का, जिसकी शाखाये नीचे की ओर तथा जड़े ऊपर की ओर हो।

 

 

 

 

इसका कोई अनुभव नहीं है। ऐसा वृक्ष जलाशय के निकट पाया जाता है। किन्तु ऐसा वृक्ष हम जलाशय के निकट देखा जा सकता है।

 

 

 

 

किन्तु बात कुछ ऐसी है कि जलाशय के तट पर उगे हुए वृक्ष का प्रतिबिंब जल में पड़ता है तो उसकी जड़े ऊपर की ओर और उसकी शाखाये नीचे की ओर दिखती है।

 

 

 

 

इस भौतिक जगत के बंधन की तूलना अश्वत्थ के वृक्ष से की गई है। जो व्यक्ति सकाम कर्मो में लगा हुआ है उसके लिए इस वृक्ष का कोई अंत नहीं है। वह एक शाखा से दूसरी तथा तीसरी शाखा में भ्रमण करता रहता है।

 

 

 

 

वैदिक स्त्रोत्र जो आत्मोन्नति के लिए है वह ही इस वृक्ष के पत्ते है। इस जगत रूपी वृक्ष का कोई अंत नहीं है और जो इस वृक्ष में आसक्त है उसकी मुक्ति की कोई संभावना नहीं है।

 

 

 

 

दूसरे शब्दों में यह जगत रूपी वृक्ष आध्यात्मिक जगतरूपी वास्तविक वृक्ष का प्रतिबिम्ब मात्र है। इसकी जड़े ऊपर की ओर बढ़ती है क्योंकि वह इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक से प्रारम्भ होती है। जहां पर ब्रह्मा स्थित है। यदि कोई मोह रूपी इस अविनाशी वृक्ष को समझ लेता है तो वह इससे बाहर निकल सकता है।

 

 

 

 

इस आध्यात्मिक जगत का प्रतिबिम्ब हमारी इच्छाओ में स्थित है। जिस प्रकार वृक्ष का प्रतिबिम्ब जल में रहता है। इच्छा ही प्रतिबिंबित भौतिक प्रकाश में वस्तुओ के स्थित होने का कारण है।

 

 

 

 

जो व्यक्ति इस भौतिक जगत से बाहर निकलना चाहता है उसे विश्लैषिक अध्ययन के माध्यम से इस वृक्ष को भली-भांति समझ लेना चाहिए। फिर वह इस वृक्ष से अपना संबंध विच्छेद कर सकता है।

 

 

 

 

बाहर निकलने की इस विधि को जान लेना आवश्यक है। भव बंधन से निकलने की कई विधियों का वर्णन पिछले अध्यायों में हुआ है।

 

 

 

 

भगवद्भक्ति ही सर्वोच्च विधि है जिसे हम तेरहवे अध्याय तक देख चुके है। भौतिक कार्यो से विरक्ति तथा भगवान की दिव्य सेवा में अनुरक्ति ही भक्ति का मूल सिद्धांत है।

 

 

 

 

यह वृक्ष वास्तविक वृक्ष का प्रतिबिम्ब होने के कारण वास्तविक प्रतिरूप है। आध्यात्मिक जगत में सब कुछ है। इस संसार की जड़े ऊपर की ओर बढ़ती है।

 

 

 

 

इस अध्याय में इस संसार से आसक्ति तोड़ने का वर्णन हुआ है। ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक से पूर्ण भौतिक पदार्थ से यह प्रक्रिया शुरू होती है।

 

 

 

 

वही से सारे ब्रह्माण्ड का विस्तार होता है। जिसमे अनेक लोक उस वृक्ष की शाखाये के रूप में होते है। इसके फल जीवन के कर्मो के फल अर्थात धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के द्योतक है।

 

 

 

 

ब्रह्म के निर्विशेषवादी इस अश्वत्थ वृक्ष का मूल मानते है और सांख्य दर्शन के अनुसार इसी मूल से पहले प्रकृति पुरुष तब तीनो गुण निकलते है और फिर पांच स्थूल तत्व (पंच महाभूत) फिर दस इन्द्रियां (दशेन्द्रिय) मन आदि।

 

 

 

 

इस प्रकार यह संसार को चौबीस तत्वों में विभाजित करते है। यदि ब्रह्म समस्त अभिव्यक्तियों का केंद्र है एक प्रकार से यह भौतिक जगत 180 अंश के गोलार्ध में है और 180 अंश के गोलार्ध में आध्यात्मिक जगत है। चूँकि यह भौतिक जगत उल्टा प्रतिबिम्ब है। अतः आध्यात्मिक जगत में भी इसी प्रकार की विविधता होनी चाहिए।

 

 

 

 

परन्तु यह श्रोत जहां से यह प्रतिबिम्ब प्रतिबिंबित होता है शाश्वत है। वास्तविक वृक्ष के प्रतिबिम्ब का विच्छेदन करना होता है। प्रकृति परमेश्वर की वाहिरंगा शक्ति है और पुरुष साक्षात् परमेश्वर है।

 

 

 

 

इसकी व्याख्या भगवद्गीता में पहले हो चुकी है। चूँकि यह अभिव्यक्ति भौतिक है अतः क्षणिक है। प्रतिबिम्ब भी क्षणिक होता है कभी दिखता है कभी लुप्त हो जाता है।

 

 

 

 

जब कोई कहता है कि अमुक व्यक्ति वेद का ज्ञाता है तो इससे समझा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति इस भौतिक जगत से विच्छेद की क्रिया को जानता है।

 

 

 

 

यदि वह इस विधि (क्रिया) को जानता है तो वह वास्तव में वेदो का ज्ञाता है। जो व्यक्ति केवल वेदो के कर्म कांडो में आकृष्ट होता है।

 

 

 

 

वह इस वृक्ष की सुंदर हरी पत्तियों में आकृष्ट हो जाता है। वह वेदो के वास्तविक उद्देश्य से अनभिज्ञ रहता है। वेदो का उद्देश्य भगवान ने स्वयं प्रकट किया है और वह है – इस प्रतिबिंबित वृक्ष को काटकर आध्यात्मिक जगत के वास्तविक वृक्ष को प्राप्त करना जिससे उस मूल जड़ का पता लग सके कि मनुष्य इस भौतिक संसार में किस प्रकार से उलझ गया है और जब उसे मूल जड़ का ज्ञान हो जायेगा तो वह प्रबुद्ध हो सकेगा और उस परम पुरुष के पास ही विश्राम पायेगा।

 

 

 

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