Download All Vedas Pdf Hindi / आल वेद डाउनलोड पीडीएफ फ्री

मित्रों इस पोस्ट में Download All Vedas Pdf Hindi दिया जा रहा है। आप यहां से आल वेद पीडीएफ फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

Download All Vedas Pdf Hindi आल वेद डाउनलोड पीडीएफ फ्री 

 

 

1- Atharva Veda in Hindi Pdf  Part 1

 

2- Atharva Veda in Hindi Pdf  Part 2

 

3- Rig Veda Pdf Hindi

 

4- Sam Veda Pdf Hindi 

 

5- Yajur Veda In Hindi Pdf

 

 

 

वेद क्या हैं?

 

 

वेद भगवान द्वारा ऋषियों के सुनाये गए ज्ञान पर आधारित है। वेद दुनिया के प्रथम धर्म ग्रंथ है और ईश्वर द्वारा सुनाए जाने के कारण उन्हें श्रुति भी कहा जाता है। वेदो में मानव के जीवन की हर समस्या का समाधान है।

 

 

 

कैसे हुई वेदो की उत्पत्ति

 

 

 

शत पथ ब्रह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि, वायु, सूर्य और अंगिरा ने कठोर तप किया और क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद प्राप्त किए और एक अन्य ग्रंथ के अनुसार चारो वेदो की उत्पत्ति हुई।

 

 

 

वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज है और इसकी 28000 (अट्ठाइस हजार) पांडुलिपियां महाराष्ट्र के पुणे के “भंडारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट” में रखी हुई है और इनमे से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियों को बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हुए यूनेस्को ने विरासत की सूचि में शामिल किया है।

 

 

 

वेदो के उपवेद कौन से है ?

 

 

 

वेदो के उपवेद में ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्व वेद, अथर्व वेद का स्थापत्य वेद है

 

 

 

 

Yajurveda Pdf in Hindi 

 

 

 

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यजुर्वेद हिन्दू धर्म के पवित्र चार वेदो में से दूसरे नंबर पर है। इसमें यज्ञ आदि के लिए मंत्रो का वर्णन है और मंत्रो की शैली गद्यात्मक और पद्यात्मक है। यजुर्वेद में ऋग्वेद के 663 मंत्र का वर्णन है। यजुर्वेद में अश्वमेध यज्ञ का भी वर्णन है। यजुर्वेद की 5 शाखाए है। 1- काठक। 2- कपिष्ठल। 3- मत्रियाणी। 4- तैतीरीय। 5- राजसनेयी।

 

 

 

Yajurveda Hindu Dharma Ke Pavitra Char Vedon Mein Se Dusare Numaber Par Hai . Isame Yagya Aadi Ke Liye Mantron Ka Varanan Hai Aur Mantron Ki Shaili Gadyatmak Aur Padyatmak Hai . Yajurved Mein Rig Veda Ke 663 Mantron Ka Samaves Hai . Isame Ashvamedh Yagya Ka Bhi Varanan Hai .

 

 

 

सामवेद Hindi Pdf Free 

 

 

 

सामवेद हिन्दू धर्म के पवित्र वेदो में तीसरे नंबर पर है। इसमें 1875 मंत्र है, जिसमे से अगर 69 मंत्रो को और 17 मंत्र अथर्व वेद और यजुर्वेद के 4 मंत्र को छोड़ दे तो बाकी के मंत्र ऋग्वेद के है फिर भी इस वेद की महत्ता बहुत अधिक है।

 

 

 

इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में “वेदनानां सामवेदोSस्मि” कहा है। सामवेद छोटा जरूर है लेकिन इसमें सभी वेदो का सार है।

 

 

 

Rigved Pdf Hindi ऋग्वेद पीडीएफ हिंदी 

 

 

 

हिन्दू धर्म के 4 बेहद पवित्र वेदो में ऋग्वेद में Rig ved का प्रथम स्थान है और कई जगहों पर वर्णित है कि ऋग्वेद से ही अन्य वेदो की रचना हुई है क्योंकि अन्य तीनो वेदो में ऋग्वेद की छाप (मंत्र आदि) अवश्य मिल जायेंगे। ऋग्वेद अपने आप में एक सम्पूर्ण वेद है। इसकी रचना पद्यात्मक है। ऋग्वेद में 10 अध्याय है और इसमें 1028 सूक्त है और इसमें लगभग 10580 मंत्र है।

 

 

 

 

ऋग्वेद के प्रथम मंडल की रचना अनके ऋषियों ने की, जबकि द्वितीय की गृत्समय, तृतीय की विश्वामित्र (कही-कही विश्वासमित्र) चतुर्थ की वामदेव, पंचम की अत्रि, षष्टम की भरद्वाज, सप्तम की वशिष्ठ, अष्टम की कण्व और अंगिरा तथा नवम और दशम के भी अनेक ऋषियों ने की।

 

 

 

ऋग्वेद की 5 मुख्य शाखाए है। शाकल्प, वास्कल, आश्वलायन, शोखामन, मण्डूकायन और इसके अलावा भी इसकी 21 और शाखाए है। ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है और इसके रचयिता भगवान धन्वंतरि है।

 

 

 

ऋग्वेद के 10 उपनिषद है – ऐतरेय, आत्मबोध, कौषीतकि, निर्वाण, नाद विंदू, अक्षमाया, त्रिपुरा, वहवरुका और सौभाग्य लक्ष्मी। ऋग्वेद में जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकत्सा, मानस चिकित्सा तथा हवन द्वारा चिकित्सा का वर्णन है।

 

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

संयम का अभ्यास – श्री कृष्ण कहते है – इस प्रकार से शरीर, मन तथा कर्म में निरंतर संयम का अभ्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवद्धाम की प्राप्ति होती है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अब योगाभ्यास के चरम लक्ष्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है। योगाभ्यास किसी भौतिक सुविधा की प्राप्ति के लिए नहीं किया जाता है। इसका उद्देश्य तो भौतिक संसार से विरक्ति प्राप्त करना है जो कोई इसके द्वारा स्वास्थ्य लाभ चाहता है या भौतिक सिद्ध प्राप्त करने की इच्छा रखता है। वह भगवद्गीता के अनुसार कदापि योगी नहीं होता है।

 

 

 

भगवद्गीता में भगवद्धाम का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि यह वह स्थान है जहां न सूर्य कि आवश्यकता है न चांद या बिजली की जरूरत है। आध्यात्मिक राज्य के सारे लोक उसी प्रकार से स्वतः प्रकाशित होते है जिस प्रकार सूर्य द्वारा यह भौतिक आकाश। न ही भौतिक अस्तित्व की समाप्ति का अर्थ शून्य में प्रवेश है क्योंकि यह केवल कल्पना मात्र है। भगवान की शृष्टि में कही भी शून्य नहीं है। उल्टे भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर मनुष्य भगवद्धाम में प्रवेश करता है।

 

 

 

वैसे तो भगवद्धाम सर्वत्र है। किन्तु चिन्मयव्योम तथा उसके लोको को ही परम धाम कहा जाता है एक पूर्ण योगी जिसे भगवान कृष्ण का पूर्णज्ञान है जैसा कि यहां पर भगवान ने स्वयं कहा है – (मच्चितः मप्तरः मतस्थानम) वास्तविक शांति प्रदान कर सकता है और अंततोगत्वा या गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है।

 

 

 

कोई भी कृष्ण तथा विष्णु रूप में उनके पूर्ण विस्तार को सही-सही जाने बिना बैकुंठ में या भगवान के नित्य धाम (गोलोक, वृन्दावन) में रवेश नहीं कर सकता है। ब्रह्म संहिता मे (5. 37) स्पष्ट उल्लेख है – यद्यपि भगवान सदैव अपने धाम में निवास करते है जिसे गोलोक कहा जाता है तो भी वह अपनी परा-आध्यात्मिक शक्तियों के कारण सर्वव्यापी ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा है।

 

 

 

अतः कृष्ण भावना भावित व्यक्ति ही पूर्ण योगी है क्योंकि उसका मन सदैव कृष्ण के कार्य कलापो में ही तल्लीन रहता है। वेदो में (श्वेताश्वर उपनिषद 3. 8) भी हम पाते है। केवल भगवान कृष्ण को जान लेने पर जन्म तथा मृत्यु के पथ को जीता जा सकता है। दूसरे शब्दों में योग की पूर्णता संसार से मुक्ति प्रदान करने में है। इंद्रजाल अथवा व्यायाम के करतबों से अबोध जनता को मुर्ख नहीं बनाया जा सकता या इन्द्रजाल और व्यायाम के करतबों से अबोध जनता को मुर्ख बनाने में योग का उपयोग नहीं होना चाहिए।

 

 

 

 

16- योगियों के लिए नियम (भोजन तथा नींद) – श्री कृष्ण कहते है – हे अर्जुन ! जो अधिक खाता है या कम खाता है जो अधिक सोता है अथवा पर्याप्त नहीं सोता है उसके योगी बनने की संभावना ही नहीं रहती है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर योगियों के लिए भोजन तथा नींद के नियमन की संस्तुति की गई है। अधिक भोजन का अर्थ है शरीर तथा आत्मा को बनाए रखने के लिए आवश्यकता से अधिक भोजन ग्रहण करना। मनुष्यो को मांसाहार खाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रचुर मात्रा में शाक, अन्न, फल तथा दुग्ध उपलब्ध है। ऐसे सादे भोज्य पदार्थ भगवद्गीता के अनुसार सतोगुणी माने जाते है।

 

 

जो व्यक्ति इन्द्रिय सुख के लिए खाता है अथवा अपने लिए भोजन करता है किन्तु कृष्ण को भोजन अर्पित नहीं करता है वह केवल पाप खाता है और जो पाप खाता है और नियत मात्रा से अधिक भोजन करता है वह पूर्ण योग का पालन नहीं कर सकता है। मांसाहार तो तमोगुणियो के लिए है। अतः जो लोग मांसाहार करते है मद्यपान करते है धूम्रपान करते है कृष्ण को भोग लगाए बिना भोजन करते है वह पाप कर्मो का अवश्य भोग करेंगे क्योंकि वह केवल दूषित वस्तुए ही खाते है।

 

 

 

सबसे उत्तम यही है कि कृष्ण को अर्पित भोजन के उच्छिष्ट भाग को ही ग्रहण करना चाहिए। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति कभी भी ऐसा भोजन नहीं ग्रहण करता जो इससे पूर्व कृष्ण को अर्पित नहीं किया गया हो। अतः केवल कृष्ण भावना भावित व्यक्ति ही योगाभ्यास में पूर्णता प्राप्त कर सकता है। मनुष्य को प्रतिदिन 6 घंटे से अधिक नींद नहीं ग्रहण करनी चाहिए। जो व्यक्ति 24 घंटे में से 6 घंटो से अधिक सोता है। वह अवश्य ही तमोगुणी होता है तमोगुणी व्यक्ति आलसी होता है तथा नींद अधिक ग्रहण करता है ऐसा व्यक्ति कदापि योग नहीं साध सकता है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति शास्त्रों द्वारा अनुमोदित उपवास करता है न तो वह आवश्यकता से अधिक उपवास करता है, न अधिक खाता है।  न ही ऐसा व्यक्ति कभी योग का अभ्यास करता है जो कृतिम उपवास की अपनी विधिया निकाल कर भोजन नहीं करता है। जो व्यक्ति भोजन करने में तथा निद्रा ग्रहण करने में संतुलन रखता है वह योगाभ्यास करने के लिए पूर्णतया योग्य होता है। जो आवश्यकता से अधिक खाता है वह सोते समय अनेक सपने देखेगा ऐसा व्यक्ति योग में पूर्ण रूप से विफल रहता है।

 

 

 

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