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Divya Prerna Prakash Pdf / दिव्य प्रेरणा प्रकाश Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Divya Prerna Prakash Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Divya Prerna Prakash Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf कर सकते हैं।

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Divya Prerna Prakash Pdf Download

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भ्रम छोडो। मुनि की बात कभी झूठ नहीं हो सकती। यदि बेटी पर तुम्हे स्नेह है तो उसे सादर शिक्षा दो कि वह भक्ति पूर्वक सुस्थिर चित्त से भगवान शंकर के लिए तप करे। मेनके! यदि भगवान शिव प्रसन्न होकर काली का पाणिग्रहण कर लेते है तो सब शुभ ही होगा।

 

 

 

नारद जी का बताया हुआ अमंगल या अशुभ नष्ट हो जायेगा। शिव के समीप सारे अमंगल सदा मंगलरूप हो जाते है। इसलिए तुम पुत्री को शिव की प्राप्ति के लिए तपस्या करने की शीघ्र शिक्षा दो। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! हिमवान की यह बात सुनकर मेना को बड़ी प्रसन्नता हुई।

 

 

 

वे तपस्या में रुचि उत्पन्न करने के लिए पुत्री को उपदेएश देने के निमित्त उसके पास गयी। परन्तु बेटी के सुकुमार अंग पर दृष्टिपात करके मेना के मन में बड़ी व्यथा हुई। उनके दोनों नेत्रों में आंसू भर आये। फिर तो गिरिप्रिया मेना में अपनी पुत्री को उपदेश देने की शक्ति नहीं रह गयी।

 

 

 

अपनी माता की उस चेष्टा को पार्वती जी शीघ्र ही जान गयी। तब वे सर्वज्ञ परमेश्वरि कलिका देवी माता को बारंबार आश्वासन दे तुरंत बोली – मां! तुम बड़ी समझदार हो। मेरी यह बात सुनो। आज पिछली रात्रि के समय ब्रह्ममुहूर्त में मैंने एक स्वप्न देखा है उसे बताती हूँ।

 

 

 

ममताजी! स्वप्न में एक दयालु एवं तपस्वी ब्राह्मण ने मुझे शिव की प्रसन्नता के लिए उत्तम तपस्या करने का प्रसन्नता पूर्वक उपदेश दिया है। नारद! यह सुनकर मेनका ने शीघ्र अपने पति को बुलाया और पुत्री के देखे हुए स्वप्न को पूर्णतः कह सुनाया।

 

 

 

मेनका के मुख से पुत्री के स्वप्न को सुनकर गिरिराज हिमालय बड़े प्रसन्न हुए और अपनी प्रिय पत्नी को समझाते हुए बोले – प्रिये!! पिछली रात में मैंने भी एक स्वप्न देखा है। मैं आदर पूर्वक उसे बताता हूँ। तुम प्रेम पूर्वक उसे सुनो। एक बड़े उत्तम तपस्वी थे। नारद जी ने वर के जैसे लक्षण बताये थे।

 

 

 

उन्ही लक्षणो से युक्त शरीर को उन्होंने धारण कर रखा था। वे बड़ी प्रसन्नता के साथ मेरे नगर के निकट तपस्या करने के लिए आये। उन्हें देखकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ और मैं अपनी पुत्री को साथ लेकर उनके पास गया। उस समय मुझे ज्ञात हुआ कि नारद जी के बताये हुए वर भगवान शंभु ये ही है।

 

 

 

तब मैंने उन तपस्वी की सेवा के लिए अपनी पुत्री को उपदेश देकर उनसे भी प्रार्थना की कि वे इसकी सेवा स्वीकार करे। परन्तु उस समय उन्होंने मेरी बात नहीं मानी इतने में ही वहां सांख्य और वेदांत के अनुसार बहुत बड़ा विवाद छिड़ गया।

 

 

 

तदनन्तर उनकी आज्ञा से मेरी बेटी वही रह गयी और अपने हृदय में उन्ही की कामना रखकर भक्ति पूर्वक उनकी सेवा करने लगी। सुमुखि! यही मेरा देखा हुआ स्वप्न है जिसे मैंने तुम्हे बता दिया। अतः प्रिये मेने! कुछ काल तक इस स्वप्न के फल की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

 

 

 

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