Dhyan Yog Pratham Aur Antim Mukti Pdf Download

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प्रथम और अंतिम मुक्ति pdf download / Dhyan Yog Pratham Aur Antim Mukti Pdf

 

 

 

प्रथम और अंतिम मुक्ति pdf download

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

 

भगवान कह रहे है – हे अर्जुन ! अतः उठो ! लड़ने के लिए तैयार हो जाओ और यश अर्जित करो। अपने शत्रुओ को जीतकर सम्पन्न राज्य का भोग करो। यह सब मेरे द्वारा ही मारे जा चुके है और हे सव्यसाची ! तुम तो युद्ध में केवल निमित्त मात्र हो सकते हो।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यह विराट जगत बद्ध जीवो के लिए भगवद्धाम वापस जाने के लिए सुअवसर (सुयोग) है। जब तक उनकी प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रकृति रहती है तब तक वह बद्ध रहते है।

 

 

 

 

किन्तु जो कोई भी परमेश्वर की इस योजना (इच्छा) को समझ लेता है और कृष्ण भावनामृत का अनुशीलन करता है वह  बुद्धिमान है।

 

 

 

 

दृश्य जगत की उत्पत्ति और उसका संहार ईश्वर की परम अध्यक्षता में होता है। इस प्रकार कुरुक्षेत्र का युद्ध ईश्वर की योजना के अनुसार ही लड़ा गया था।

 

 

 

 

अर्जुन युद्ध करने से मना कर रहा था किन्तु उसे बताया गया कि परमेश्वर की इच्छानुसार उसे लड़ना होगा। यदि कोई कृष्ण भावनामृत से पूरित हो और उसका जीवन भगवान दिव्य सेवा में अर्पित हो तो समझो कि वह कृतार्थ है।

 

 

 

 

भगवान ने अर्जुन को सव्यसाची कहा था – जिसका अर्थ है कि जो युद्धभूमि में अत्यंत कौशल के साथ तीर छोड़ सके। इस प्रकार अर्जुन को एक पटु योद्धा के रूप में संबोधित किया गया है जो अपने शत्रुओ को तीर से मारकर मौत के घाट उतार सकता है।

 

 

 

 

 

निमित्तमात्रम – “केवल कारण मात्र” यह शब्द भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसार भगवान की इच्छानुसार गतिमान है। अल्पज्ञ पुरुष सोचते है कि यह प्रकृति बिना किसी योजना के ही गतिशील है और सारी शृष्टि आकस्मिक है।

 

 

 

 

ऐसे अनेक तथाकथित विज्ञानी है जो यह सुझाव रखते है कि संभवतया ऐसा था या ऐसा हो सकता है। किन्तु इस प्रकार के “शायद” “या हो सकता है” का प्रश्न ही नहीं उठता।

 

 

 

 

प्रकृति द्वारा विशेष योजना संचालित की जा रही है। यह विशेष योजना क्या है? यह योजना कृष्ण भावनामृत होकर भगवद्धाम जाने के लिए एक सुअवसर है।

 

 

 

 

 

34- गुरु के माध्यम से भगवान को जानना (भगवान की योजना) – भगवान कहते है कि – द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य महान योद्धा पहले ही मारे जा चुके है। अतः तुम उनका वध करो और तनिक भी विचलित न होओ। तुम केवल युद्ध करो। युद्ध में तुम अपने शत्रुओ को परास्त करोगे।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – प्रत्येक योजना भगवान के द्वारा बनती है। किन्तु वह अपने भक्तो पर इतने कृपालु रहते है कि जो भक्त उनकी इच्छा के अनुसार उनकी योजना का पालन करते है।

 

 

 

 

उन्हें ही उसका श्रेय देते है। मनुष्य को चाहिए कि ऐसी योजनाओ का अनुसरण करे और जीवन संघर्ष में विजयी बने। अतः जीवन को इस प्रकार से गतिशील होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति कृष्ण भावनामृत में कर्म करे और गुरु के माध्यम से भगवान को जाने भगवान की योजनाए गुरु की कृपा से ही समझ में आती है और भक्तो की योजनाए उनकी ही योजनाए है।

 

 

 

 

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