Dhyan Yog Pdf in Hindi / ध्यान योग Pdf Free Download

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Dhyan Yog Prakash Pdf / ओशो ध्यान योग Pdf 

 

 

 

Shree Shabda Dhyan Yog Pdf

 

Osho Dhyan Yog Pdf Free Download

 

Sahaj Dhyan Yog Pdf

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

भगवान का भक्त किसी भी फल (भौतिक, आध्यात्मिक) के लिए प्रयत्नशील नहीं – मेरा ऐसा भक्त जो सामान्य कार्य कलापो पर आश्रित नहीं है जो शुद्ध है, दक्ष है, चिंतारहित है, समस्त कष्टों से रहित है और किसी फल के लिए प्रयासरत नहीं रहता है वह मुझे अत्यंत प्रिय है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – शुद्ध भक्त कभी भी ऐसी किसी वस्तु के लिए प्रयास नहीं करता है जो भक्त के नियमो के प्रतिकूल हो, उदाहरण के लिए किसी विशाल भवन को बनवाने में अधिक शक्ति लगती है।

 

 

 

अतः वह कभी ऐसे कार्य में रूचि नहीं रखता है। जो उसकी भक्ति के प्रगति में बनती हो। वह भगवान के लिए मंदिर का निर्माण करा सकता है।

 

 

 

और उसके लिए सभी प्रकार की चिंताए उठा सकता है। लेकिन वह अपने परिवार वालो के लिए बड़ा मकान का निर्माण नहीं कराता है। भक्त को धन दिया जा सकता है किन्तु उसे धनार्जन के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए

 

 

 

 

भक्त कभी किसी दल में भाग नहीं लेता है। यह तो स्वाभाविक होता है कि भक्त प्रातः काल जल्दी उठता है और दिन में दो बार स्नान करता है इस प्रकार वह भीतर तथा बाहर से भी स्वच्छ रहता है।

 

 

 

भक्त दक्ष होता है। वह प्रामाणिक शास्त्रों में दृढ विश्वास रखता है क्योंकि उसे समस्त सांसारिक क्रिया कलापो का ज्ञान होता है। वह जानता है कि उसका शरीर एक उपाधि है अतः वह सभी उपाधियों से मुक्त होने के कारण कभी व्यथित नहीं होता है।

 

 

 

 

17- शुभ तथा अशुभ वस्तुओ का परित्याग (ऐसा भक्त भगवान का प्रिय) – भगवान कहते है कि – उसे (भक्त को जो न कभी हर्षित होता है, न शोक करता है, जो न तो पछताता है, न इच्छा करता है, जो शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की वस्तुओ का परित्याग करता है ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – शुद्ध भक्त भौतिक लाभ से न तो हर्षित होता है , न हानि होने पर दुख करता है। वह अपनी किसी प्रिय वस्तु के खो जाने पर पश्चाताप नहीं करता है।

 

 

 

वह पुत्र या शिष्यों की प्राप्ति के लिए न तो उत्सुक रहता है और नही मिलने पर दुःख भी नहीं करता है। वह सभी प्रकार के शुभ तथा अशुभ पाप कर्मो में सदैव ही परे रहता है।

 

 

 

 

इसी प्रकार उसे इच्छित वस्तु न मिलने पर दुःख नहीं होता है। भक्ति के पालन करने में उसके लिए कुछ भी बाधक नहीं बनता है। वह परमेश्वर के लिए बड़ी से बड़ी विपत्ति सह लेने को तैयार रहता है। ऐसा भक्त कृष्ण को अतिशय प्रिय होता है।

 

 

 

 

ज्ञान में दृढ, भक्ति में संलग्न (भक्त भगवान को प्रिय) – भगवान कहते है कि -जो मित्र तथा शत्रुओ के लिए समान है, जो मान तथा अपमान, शीत तथा गर्मी, सुख तथा दुःख, यश, अपयश में समभाव रखता है जो दूषित संगति से सदैव मुक्त रहता है।

 

 

 

 

जो सदैव मौन तथा किसी भी वस्तु से संतुष्ट रहता है। जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता है। जो ज्ञान में दृढ है और भक्ति में संलग्न है ऐसा पुरुष मुझे अत्यंत प्रिय है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भक्त समस्त परिस्थितियों में सुखी रहता है, उसे कभी स्वादिष्ट भोजन मिलता है तो कभी कुछ भी नहीं मिलता है किन्तु वह संतुष्ट रहता है।

 

 

 

 

वह आवास की सुविधा की चिंता नहीं करता है। वह कभी पेड़ के नीचे रह सकता है तो कभी अत्यंत उच्च कोटि के भवन में, लेकिन वह इनमे से किसी के प्रति आसक्ति भाव नहीं रखता है।

 

 

 

 

भक्त सदैव ही कुसंगति से दूर रहता है। मानव समाज का यह स्वभाव है कि कभी किसी की निंदा की जाती है तो कभी किसी की प्रशंसा की जाती है।

 

 

 

 

किन्तु भक्त कृतिम, यश, अपयश, दुख तथा सुख से ऊपर उठा रहता है। भक्त कृष्ण कथा के अतिरिक्त कुछ नहीं बोलता है अतः उसे मौनी कहा जाता है।

 

 

 

 

वह तो अत्यंत धैर्यवान होता है। मौनी का अर्थ यह कि कृष्ण कथा के अतिरिक्त कुछ न बोले या अनर्गल प्रलाप न करे। मनुष्य को आवश्यकता पड़ने पर बोलना चाहिए, भक्त के लिए तो सर्वाधिक अनिवार्य वाणी भगवान के लिए बोलना चाहिए।

 

 

 

 

सद्गुणों के बिना कोई शुद्ध भक्त नहीं बन सकता है। जो भक्त नहीं है उनमे सद्गुणों का सर्वथा ही अभाव रहता है। सद्गुणों का विकास करने से या अपने स्वभाव में सद्गुणों को समाहित कर लेने पर ही किसी को भक्त कहा जा सकता है।

 

 

 

 

भक्त स्थिर कहलाता है क्योंकि वह अपने संकल्प तथा ज्ञान में दृढ होता है। भले ही भक्त के लक्षणों की कुछ पुनरावृति हुई हो लेकिन वह इस बात पर बल देने के लिए है कि भक्त को यह सारे गुण अर्जित करने चाहिए जो उपरोक्त वर्णित हुआ है।

 

 

 

 

उसे इन सद्गुणों के लिए कभी बाह्य प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अपितु कृष्ण भावनामृत या भक्ति में संलग्न रहने के कारण ही उसमे यह सभी सद्गुण स्वतः ही विकसित होने लगते है।

 

 

 

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