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Dhruvswamini Pdf in Hindi / ध्रुवस्वामिनी नाटक pdf download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Dhruvswamini Pdf in Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Dhruvswamini Pdf in Hindi Download कर सकते हैं और यहां से Sukh Sagar pdf Hindi कर सकते हैं।

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Dhruvswamini Pdf in Hindi

 

 

पुस्तक का नाम  Dhruvswamini Pdf in Hindi
पुस्तक के लेखक  जयशंकर प्रसाद 
भाषा  हिंदी 
साइज  1 Mb 
पृष्ठ  40 
फॉर्मेट  Pdf 
श्रेणी  कहानी 

 

 

 

ध्रुवस्वामिनी Pdf Download

 

 

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Dhruvswamini Pdf in Hindi
Dhruvswamini Pdf in Hindi Download यहां से करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये

 

 

 

नाना प्रकार के सुगंधित श्रेष्ठ द्रव्यों से सुवासित तथा सुंदर प्रकाश से परिपूर्ण था। वहां चंदन और अगर की सम्मिलित गंध फ़ैल रही थी। उस भवन में फूलो की सेज बिछी हुई थी। विश्वकर्मा का बनाया हुआ वह भवन नाना प्रकार के विचित्र चित्रों से सुसज्जित था।

 

 

 

श्रेष्ठ रत्नो की सार भूत मणियों से निर्मित सुंदर हारो द्वारा उस वासगृह को अलंकृत किया गया था। उसमे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कृत्रिम बैकुंठ,, ब्रह्मलोक, कैलास, इंद्रभवन तथा शिवलोक आदि दीख रहे थे। ऐसे आश्चर्यजनक शोभा से सम्पन्न उस वासभवन को देखकर गिरिराज हिमालय की प्रशंसा करते हुए भगवान महेश्वर बहुत संतुष्ट हुए।

 

 

 

वहां अति रमणीय रत्नजटित उत्तम पलंग पर परमेश्वर शिव बड़ी प्रसन्नता से अपने समस्त भाई बंधुओ एवं दूसरे लोगो को भी भोजन कराया तथा जो कार्य शेष रह गए थे उन्हें भी पूरा किया। शैलराज हिमालय इस प्रकार आवश्यक कार्य में लगे हुए थे और प्रियतम परमेश्वर शिव शयन कर रहे थे।

 

 

 

इतने में ही पूरी रात गुजर गयी और सूर्योदय हो गया। सूर्योदय होने पर धैर्यवान और उत्साही पुरुष नाना प्रकार के बाजे बजाने लगे। उस समय विष्णु आदि सब देवता सानंद उठे और अपने इष्ट देव देवेश्वर शिव का स्मरण करके वहां से कैलास को चलने के लिए जल्दी-जल्दी तैयार हो गए।

 

 

 

उन्होंने अपने वाहन भी सुसज्जित कर लिए। तत्पश्चात धर्म को शिव के नजदीक भेजा। योग शक्ति से सम्पन्न धर्म नारायण की आज्ञा से वासगृह में पहुंचकर योगीश्वर शंकर से समयोचित बात बोले – प्रमथगणो के स्वामी महेश्वर! उठिये,  उठिये आपका कल्याण हो। आप हमारे लिए भी कल्याणकारी होइए।

 

 

 

जनवासे में चलिए और वहां सब देवताओ को कृतार्थ कीजिए। धर्म की यह बात सुनकर महेश्वर हँसे। उन्होंने धर्म को कृपादृष्टि से देखा और शय्या त्याग दी। इसके बाद धर्म से हँसते हुए कहा – तुम आगे चलो। मैं भी वहां शीघ्र ही आऊंगा इसमें संशय नहीं है।

 

 

 

भगवान शिव के ऐसा कहने पर धर्म जनवासे में गए। तत्पश्चात शंभु भी वहां जाने को उद्यत हुए। यह जानकर महान उत्सव मनाती हुई स्त्रियां वहां आयी और भगवान शंभु के युगल चरणारबिंदो का दर्शन करती हुई मंगलगान करने लगी। तदनन्तर लोकाचार का पालन करते हुए शंभु प्रतःकालिक कृत्य करके मेना और हिमालय की आज्ञा ले जनवासे को गए।

 

 

 

मुने! उस समय बड़ा भारी उत्सव हुआ। वेदमंत्रों की ध्वनि होने लगी और लोग चारो प्रकार के बाजे बजाने लगे। अपने स्थान पर आकर शंभु ने लोकाचारवश मुनियो को, विष्णु को और मुझको प्रणाम किया। फिर देवता आदि ने उनकी वंदना की।

 

 

 

उस समय जय-जयकार, नमस्कार तथा वेदमन्त्रोच्चारण की मंगलदायिनी ध्वनि होने लगी। इससे सब ओर कोलाहल छा गया। ब्रह्मा जी कहते है – तदनन्तर विष्णु आदि देवता तथा ऋषि कैलास लौटने का विचार करने लगे। तब हिमालय ने जनवासे में आकर सबको भोजन के लिए निमंत्रित किया।

 

 

 

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