Dharmo Rakshati Rakshitah in Hindi / धर्मो रक्षति रक्षितः मीनिंग इन हिंदी

मित्रों इस पोस्ट में Dharmo Rakshati Rakshitah in Hindi दिया गया है। आप नीचे Dharmo Rakshati Rakshitah Meaning in Hindi जान पाएंगे।

 

 

 

Dharmo Rakshati Rakshitah in Hindi धर्मो रक्षति रक्षितः मीनिंग इन हिंदी 

 

 

 

 

 

 

धर्मो रक्षति रक्षितः इसका अर्थ है कि तुम धर्म की रक्षा करो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। आइये सर्वप्रथम पूरा श्लोक पढ़ते है और फिर उसके अर्थ को विस्तार से समझते है।

 

 

 

इस श्लोक का अगर साधारण अर्थ समझे तो यह है कि अगर धर्म का नाश होगा तो आपका भी नाश होगा। इसलिए धर्म की रक्षा करो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। इसीलिए धर्म का हनन कभी मत करो इस डर से कि मरा हुआ धर्म हमारा भी नाश कर देगा धर्म का त्याग कभी मत करो।

 

 

 

अब इस श्लोक के एक मुख्य भाग “धर्मो रक्षति रक्षितः” को लोग अपने-अपने हिसाब से प्रयोग करते है। जबकि यह श्लोक एक गहरा सार अपने अंदर समेटे हुए है।

 

 

 

आप जिस भी धर्म में पैदा हुए है उस धर्म का आदर करे, सम्मान करे क्योंकि आपकी पहली पहचान उसी धर्म ने दी है। इसलिए धर्म को छोड देना या दूसरे धर्म में जाना यह आपकी पसंद हो सकती है और अधिकार भी लेकिन यह तर्क संगत नहीं है।

 

 

 

धर्म कोई बुरा नहीं होता, हर धर्म अच्छा सिखाता है, जीवन को सिखाता है, प्रभु सुमिरन सिखाता है, बुरा बनाते है धर्म के ठेकेदार। जो धर्म की ठेकेदारी करते है और कहते है “हमारा धर्म” बस यही सब दिक्कत आती है।

 

 

 

दूसरे शब्दों में “धर्मो रक्षति रक्षितः” श्लोक का अर्थ समझते है। इसमें सर्वप्रथम आपको धर्म को समझना होगा। वैदिक सनातन व्यवस्था में धर्म “ऋत” पर आधारित है। अब यह प्रश्न उठता है कि “ऋत” किसे कहते है ?

 

 

Dharmo Rakshati Rakshitah in Hindi

 

 

 

“ऋत” वैदिक सनातन धर्म में सही प्राकृतिक व्यवस्था और संतुलन को बनाते है। इसीलिए ऋग्वेद में कहा गया है “ऋतस्य यथा प्रेत” इसका अर्थात है प्रकृति के नियमो के अनुसार जीवन को जिओ।

 

 

 

 

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि “धर्मो रक्षति रक्षितः” श्लोक की आवश्यकता किस वजह से हुई और अब इसको क्या अधिकतर प्रयोग किया जा रहा है।अब इसका कारण यह है कि जिस तरह से शायद धर्म परिवर्तन ट्रस्टिकरण आदि हो रहा है इसीलिए इस श्लोक का प्रयोग बढ़ रहा है।

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

ब्रह्मलीन कर्म का अर्थ – कृष्ण कहते है – जो पुरुष प्रकृति के गुणों के प्रति आसक्ति नहीं रखते हुए अनासक्त रहता है जो दिव्यज्ञान में पूर्णतया स्थित है उसके सभी कर्म ब्रह्म में लीन हो जाते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – दिव्यज्ञान से पूर्ण व्यक्ति का कर्म सदैव ही आदि विष्णु कृष्ण के लिए होता है। अतः उसका सारा कर्म यज्ञ रूप होता है क्योंकि यज्ञ का उद्देश्य परम् पुरुष विष्णु अर्थात कृष्ण को प्रसन्न करना है।

 

 

 

पूर्ण रूपेण कृष्ण भावना भावित होने पर मनुष्य समस्त द्वंदों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है और इस तरह वह भौतिक गुणों के कल्मष से भी मुक्त हो जाता है। वह इसलिए मुक्त होता है कि कृष्ण के साथ अपने संबंध की स्वभाविक स्थिति को जानता है। फलस्वरूप उसका चित्त कृष्ण भावनामृत से विचलित नहीं होता है। अतः ऐसे कृष्ण भावनामृत यज्ञ से कर्म का फल निश्चय ही ब्रह्म में विलीन हो जाता है और मनुष्य को कोई भौतिक फल नहीं भोगना पड़ता है।

 

 

 

32- समानता का दर्शन – श्री कृष्ण कहते है – हे अर्जुन ! वह पूर्ण योगी है जो अपने व्यक्तिगत से प्रत्येक प्राणी के सुख तथा दुख से अवगत होता है। जीव के दुख का कारण ईश्वर से अपने संबंध विस्मरण होना है। पूर्ण योगी यह जानता है कि भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित बद्ध जीव कृष्ण से अपने संबंध को भूल जाने के कारण तीन प्रकार के भौतिक तापो (दुखो) को भोगता है। सुख का कारण कृष्ण को मनुष्यो के समस्त कार्यो का परम भोक्ता समस्त भूमि तथा लोको का स्वामी एवं समस्त जीवो का परम हितैषी मित्र समझना है।

 

 

 

 

चूंकि कृष्ण भावना भावित व्यक्ति सुखी होता है। इसलिए वह कृष्ण ज्ञान को सर्वत्र वितरित कर देना चाहता है। चूंकि पूर्ण योगी कृष्ण भावना भावित बनने के महत्व को घोषित करता है। अतः वह विश्व का सर्वश्रेष्ठ उपकारी एवं भगवान का प्रियतम सेवक है। दूसरे शब्दों में भगवद्भक्त सदैव जीवो के कल्याण को देखता है और इस तरह वह सभी प्राणियों का सखा होता है।

 

 

 

जो योगी पूर्ण रूप से ध्यानमग्न होने के लिए एकांत में चला जाता है। वह उतना पूर्ण नहीं होता जितना कि वह भक्त जो प्रत्येक व्यक्ति को कृष्ण भावना भावित बनाने का प्रयास करता रहता है। वह सर्वश्रेष्ठ योगी है क्योंकि वह स्वानतः सुखाय सिद्धि नहीं चाहता है। अपितु अन्य लोगो के लिए भी सन्मार्ग चाहता है। वह अपने मित्र से द्वेष नहीं करता है। यही है वह अंतर जो एक भगवद्भक्त तथा आत्मोन्नति में रूचि रखने वाले योगी में होता है।

 

 

 

गीता सार इन हिंदी 

 

 

श्री कृष्ण कहते है कि जो व्यक्ति इन्द्रियों को पूर्णतया वश में रखते हुए इन्द्रिय संयमन करता है और अपनी चेतना को मुझमे स्थिर कर देता है वह मनुष्य स्थिर बुद्धि कहलाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – योग सूत्र भी विष्णु का ध्यान अति आवश्यक बताता है शून्य का नहीं। तथा कथित योगी जो विष्णु पद को छोड़कर अन्य किसी वस्तु का ध्यान धरते है वह केवल मृगमरीचिकाओं की खोज में वृथा ही अपना संयम गवाते है। हमे कृष्ण भावना भावित होना चाहिए, भगवान के प्रति अनुरक्त होना चाहिए असली योग का यही उद्देश्य होता है। यहां बताया गया है कि योग सिद्धि की चरम अनुभूति कृष्ण भावनामृत ही है।

 

 

 

जैसा कि पहले कहा जा चुका है दुर्वासा मुनि का झगड़ा महाराज अम्बरीष से हुआ था क्योंकि वह गर्व वश महाराज अम्बरीष पर क्रुद्ध हो गए थे जिससे वह अपनी इन्द्रियों को नहीं रोक पाए। जब तक कोई कृष्ण भावना भावित नहीं होता है तब तक इन्द्रियों को वश में करना कदापि संभव नहीं होता है। दूसरी तरफ महाराज अम्बरीष दुर्वासा मुनि के समान योगी नहीं थे किन्तु वह कृष्ण के भक्त अवश्य ही थे और उन्होंने मुनि के सारे अन्याय सहन कर लिए थे इसलिए महाराज अम्बरीष विजयी हुए थे।

 

 

 

 

इस प्रसंग में मत्पर शब्द अत्यंत सार्थक है। कोई मत्पर किस तरह हो सकता है इसका वर्णन महाराज अम्बरीष के जीवन में बताया गया है। मत्पर परंपरा के महान विद्वान तथा आचार्य श्रील बलदेव विद्या भूषण का कहना है – “मद्भक्ति प्रभावने सर्वेन्द्रिय विजय पूर्विका स्वात्म दृष्टिः सुलभेति भावः – इन्द्रियों को केवल कृष्ण की भक्ति के बल से वश में किया जा सकता है। यहां अग्नि का उदाहरण उल्लेखनीय है। “जिस प्रकार से जलती हुई अग्नि कमरे के भीतर की सारी वस्तुए जला देती है उसी प्रकार योगी के हृदय में स्थित भगवान विष्णु सारे मैल को जलाकर योगी का हृदय स्वच्छ बना देते है।

 

 

 

 

राजा अम्बरीष अपनी इन्द्रियों को वश में के सके क्योंकि उनमे निम्लिखित गुण थे जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में (9. 4. 18. 20) हुआ है। “राजा अम्बरीष ने अपना मन कृष्ण चरणारविंदो पर स्थिर कर दिया था।

 

 

 

अपनी वाणी को भगवत चर्चा में लगा दिया था। अपने हाथो को भगवान का मंदिर साफ करने में लगा दिया था। अपने कानो को भगवान की लीला सुनने में लगा दिया था।

 

 

 

अपनी आखो को भगवान का स्वरुप देखने में लगा दिया था। अपनी नाक को भगवान के चरणारविंदो पर भेट किए फूलो की गंध सुघने में लगाया अपने शरीर को भक्त का शरीर स्पर्श करने में लगाया था।

 

 

 

 

अपने पांवो को जहां-जहां भगवान के मंदिर है उन स्थानों की यात्रा करने में लगाया था। अपनी जीभ को उन्हें (भगवान को) अर्पित तुलसीदलो का आस्वादन करने में लगाया था।

 

 

 

 

अपने सिर को भगवान को नमस्कार करने में लगाया था तथा अपनी इच्छाओ को भगवान की इच्छाओ को पूरा करने में लगा दिया था और इन गुणों के कारण वह भगवान के मत्पर भक्त बनने के योग्य हो गए थे।

 

 

 

 

 

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