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Top 5 + Devdutt Pattanaik Books Pdf Hindi Free Download

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मित्रों इस पोस्ट में Devdutt Pattanaik Books Pdf Hindi दिया जा रहा है। आप नीचे की लिंक से Devdutt Pattanaik Books Pdf Hindi Free Download कर सकते हैं।

 

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Devdutt Pattanaik Books Pdf Hindi

 

 

सीता देवदत्त पटनायक बुक फ्री डाउनलोड 

 

 

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Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है।

 

 

 

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ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

इन्द्रिय तृप्ति इच्छा का त्याग – श्री कृष्ण कहते है – हे पाण्डु पुत्र ! जिसे सन्यास कहते है उसे ही तुम योग अर्थात परब्रह्म से युक्त होना जानो क्योंकि इस इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा का त्याग किए बिना कोई कभी योगी नहीं हो सकता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – वास्तविक सन्यास, योग या भक्ति का अर्थ है कि जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति को जाने और तदानुसार ही कर्म करे।

 

 

 

जीवात्मा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। वह परमेश्वर की तटस्था शक्ति है। जब माया के वशीभूत होता है तो वह बद्ध हो जाता है किन्तु जब वह कृष्ण भावना भावित रहता है या आध्यात्मिक शक्ति से सजग रहता है तो वह अपनी सहज अवस्था में होता है।

 

 

 

 

इसका अभ्यास योगी करते है जो इन्द्रियों को भौतिक आसक्ति से रोकते है किन्तु कृष्ण भावना भावित व्यक्ति को ऐसी किसी वस्तु में अपनी इन्द्रिय लगाने का अवसर ही नहीं मिलता है जो कृष्ण के निमित्त न हो। फलतः कृष्ण भावना भावित व्यक्ति सन्यासी तथा योगी साथ-साथ होता है।

 

 

 

 

इस प्रकार जब मनुष्य पूर्ण ज्ञान में होता है तो वह समस्त इन्द्रिय तृप्ति का त्याग कर देता है। अर्थात समस्त इन्द्रिय तृप्ति के कार्य कलापो का परित्याग कर देता है।

 

 

 

 

ज्ञान तथा इन्द्रिय निग्रह योग यह दोनों प्रयोजन कृष्ण भावनामृत द्वारा स्वतः ही पूरे हो जाते है। यदि मनुष्य स्वार्थ का त्याग नहीं कर पाता है तो ज्ञान तथा योग दोनों व्यर्थ ही रहते है।

 

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति में किसी प्रकार की आत्म तृप्ति की इच्छा नहीं रहती है। वह सदैव परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए कार्य मे लगा रहता है। जीवात्मा का मुख्य ध्येय तो समस्त प्रकार की आत्म तृप्ति को त्याग कर परमात्मा को तुष्ट करने के लिए तैयार रहना है।

 

 

 

 

अतः जिसे परमेश्वर के विषय में कुछ भी तथ्य मालूम नहीं रहता है वह व्यक्ति ही अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा रहता है क्योंकि कोई कभी निष्क्रिय नहीं रह सकता है। कृष्ण भावनामृत का अभ्यास करने से सभी कार्य सुचारु ढंग से संपन्न हो जाते है।

 

 

 

 

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