Advertisements

Dashrath Krit Shani Stotra Pdf / श्री दशरथ कृत शनि स्तोत्र Pdf

Advertisements

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Dashrath Krit Shani Stotra Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Dashrath Krit Shani Stotra Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Indrajal Comics Pdf in Hindi कर सकते हैं।

Advertisements

 

 

 

Dashrath Krit Shani Stotra Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  Dashrath Krit Shani Stotra Pdf
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  46.8 Kb 
पृष्ठ 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  धार्मिक 

 

 

 

Advertisements
Dashrath Krit Shani Stotra Pdf
Dashrath Krit Shani Stotra Pdf यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

Advertisements
Dashrath Krit Shani Stotra Pdf
Ravan Rachit Shiv Tandav Stotra Pdf यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

 

 

 

 

दशरथ कृत शनि स्तोत्र Pdf

 

 

॥ अथ श्री शनैश्चरस्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशाय नमः ॥

अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रस्य । दशरथ ऋषिः ।

शनैश्चरो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ॥

शनैश्चरप्रीत्यर्थ जपे विनियोगः ।

दशरथ उवाच ॥

कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दसौरिः ।

नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ १॥

सुरासुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च ।

पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ २॥

नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृङ्गाः ।

पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ३॥

देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि ।

पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ४॥

तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा ।

प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ५॥

प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुहायाम् ।

यो योगिनां ध्यानगतोऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ६॥

अन्यप्रदेशात्स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यात् ।

गृहाद् गतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ७॥

स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी ।

एकस्त्रिधा ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ८॥

शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च ।

पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते ॥ ९॥

कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः ।

सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः ॥ १०॥

एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति ॥ ११॥

॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे श्रीशनैश्चरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

 

 

श्री दशरथ कृत शनि स्तोत्र इन हिंदी 

 

 

 

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण्ठ वाले। कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे। सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढ़ी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले। हे दीर्घ नेत्र वाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृति तुम्हारी, सब पापियों को मारे। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले। कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा। हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे। हैं पूज्य चरण तेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुत तपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी। हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रद्धा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले। स्वीकारो नमन मेरे। हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी। तप-दग्ध-देहधारी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो, अतृप्ति में निरत हो। हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि। वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता। मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुद्धि होती जिन पर। हो देव असुर मानव, हो सिद्ध या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले। स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै। बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले। स्वीकारो नमन मेरे। हैं पूज्य चरण तेरे॥.

 

 

 

Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

 

यह मात्र पाठको की सहायता के लिये इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स से लिया गया है। अगर किसी को इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी Pdf Books से कोई भी परेशानी हो तो हमें [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं, हम तुरंत ही उस पोस्ट को अपनी वेबसाइट से हटा देंगे।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

ऐसा कहकर भगवान शिव के तेज से पूर्ण शरीर वाले च्यवन कुमार दधीचि मुनि ने अपनी शरीर में समस्त ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया। तब भगवान विष्णु ने उनपर पुनः कोप करना चाहा। इतने में मेरे साथ राजा क्षुव वहां आ पहुंचे। मैंने निश्चेष्ट खड़े हुए भगवान पद्मनाभ को तथा देवताओ को क्रोध से रोका।

 

 

 

मेरी बात सुनकर इन लोगो ने ब्राह्मण दधीचि को परास्त नहीं किया। श्रीहरि उनके पास गए और उन्होंने मुनि को प्रणाम किया। तदनन्तर क्षुव अत्यंत दीन हो उन मुनीश्वर दधीचि के निकट गए और उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे – मुनिश्रेष्ठ! शिव भक्त शिरोमणे! मुझपर प्रसन्न होइए। परमेश्वर आप दुर्जनो की दृष्टि से दूर रहने वाले है।

 

 

 

मुझपर कृपा कीजिए। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! राजा क्षुव की यह बात सुनकर तपस्या की निधि ब्राह्मण दधीचि ने उनपर अनुग्रह किया। तत्पश्चात श्रीविष्णु आदि को देखकर वे मुनि क्रोद्ध से व्याकुल हो गए और मन ही मन शिव का स्मरण करके विष्णु तथा देवताओ को शाप देने लगे।

 

 

 

दधीचि ने कहा – देवराज इंद्र सहित देवताओ और मुनीश्वरो! तुम लोग रूद्र की क्रोधाग्नि से श्रीविष्णु तथा आपने गणो सहित पराजित और ध्वस्त हो जाओ। देवताओ को इस तरह शाप दे क्षुव की ओर देखकर देवताओ और राजाओ के पूजनीय द्विजश्रेष्ठ दधीचि ने कहा।

 

 

 

राजेंद्र! ब्राह्मण ही बली और प्रभावशाली होते है। ऐसा स्पष्ट रूप से कहकर ब्राह्मण दधीचि अपने आश्रम में प्रविष्ट हो गये। फिर दधीचि को नमस्कार मात्र करके क्षुव अपने घर चले गये। तत्पश्चात भगवान विष्णु देवताओ के साथ जैसे आये थे उसी तरह अपने बैकुंठ लोक को लौट गए।

 

 

 

इस प्रकार वह स्थान स्थानेश्वर नामक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। स्थानेश्वर की यात्रा करके मनुष्य शिव का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। तात! मैंने तुम्हे संक्षेप से क्षुव और दधीचि के विवाद की कथा सुनाई और भगवान शंकर को छोड़कर केवल ब्रह्मा और विष्णु को ही जो शाप प्राप्त हुआ उसका भी वर्णन किया।

 

 

 

जो क्षुव और दधीचि के विवाद संबंधी इस प्रसंग का नित्य पाठ करता है वह अपमृत्यु  को जीतकर देहत्याग के पश्चात ब्रह्मलोक मे जाता है। जो इसका पाठ करके रणभूमि में प्रवेश करता है उसे भी मृत्यु का भय नहीं होता तथा वह निश्चय ही विजयी होता है।

 

 

 

नारद जी ने कहा – विधातः! महाप्राज्ञ! आप शिवतत्व का साक्षात्कार करने वाले है। आपने यह बड़ी अद्भुत एवं रमणीय शिवलीला सुनाई है। तात! वीर वीरभद्र जब दक्ष के यज्ञ का विनाश करके कैलास पर्वत पर चले गये तब क्या हुआ? यह हमे बताइये।

 

 

 

ब्रह्मा जी बोले – नारद! रुद्रदेव के सैनिको ने जिनके अंग भंग कर दिए थे वे समस्त पराजित देवता और मुनि उस समय मेरे लोक में आये। वहां मुझ स्वयंभू को नमस्कार करके सबने बारंबार मेरा स्तवन किया। फिर अपने विशेष क्लेश को पूर्णरूप से सुनाया।

 

 

 

मित्रों यह पोस्ट Dashrath Krit Shani Stotra Pdf आपको कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में जरूर बतायें और Dashrath Krit Shani Stotra Pdf की तरह की पोस्ट के लिये इस ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर करें और इसे शेयर भी करें।

 

 

 

Leave a Comment

Advertisements
error: Content is protected !!