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20 + Comics Books In Hindi Pdf Free Download / कॉमिक्स बुक्स Pdf

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मित्रों इस पोस्ट में Comics Books In Hindi Pdf दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Comics Books In Hindi Pdf Free Download कर सकते हैं।

 

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गजमुखासुर की कहानी

 

 

 

एक बहुत बड़ा दैत्य था। उसका नाम गजमुखासुर था। वह शंकर जी का परम् भक्त था। वह शंकर जी की तपस्या कर रहा था। शंकर जी उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर गजमुखासुर के सामने आकर उससे वरदान मांगने के लिए कहा।

 

 

 

 

तब गजमुखासुर ने कहा, “हे महादेव, आप हमे यह वरदान दीजिए, मैं देवता दानव और मानव के हाथो कभी नहीं मरूं।”

 

 

 

 

शंकर जी बोले, “गजमुखासुर मैं तुम्हे यह वरदान तो दे दूंगा। लेकिन तुम अपनी शक्ति का अनुचित प्रयोग तो नहीं करोगे ?”

 

 

 

 

गजमुखासुर ने शंकर जी को विश्वास दिलाया कि वह अपनी शक्ति का अनुचित प्रयोग नहीं करेगा। भगवान शंकर तो भोलेनाथ है। उन्होंने गजमुखासुर का विश्वास कर लिया और उसे मनचाहा वरदान प्रदान कर दिया।

 

 

 

 

 

भोलेनाथ ने गजमुखासुर से कहा, “इतना याद रखना जिस दिन तुमने हमारे द्वारा प्रदान किया गया वरदान का अनुचित लाभ उठाओगे तो उसके बाद ही तुम्हारी मृत्यु कोई भी नहीं टाल सकता।”

 

 

 

 

इतना कहकर शंकर जी अंतर्ध्यान हो गए। अब गजमुखासुर अपने दिए हुए वचन का पालन नहीं करता था। वह सभी ऋषि मुनियो को और अन्य जीवो को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था।

 

 

 

 

उसकी प्रताड़ना से देवता भी परेशान थे। सभी देवताओ ने शंकर जी के पास जाकर कहा, “हे भोलेनाथ, आपने गजमुखासुर को वरदान देकर अच्छा नहीं किया। वह सभी देवताओ मुनियो और मानवो को प्रताड़ित कर रहा है। अब आप ही उस दुष्ट असुर से सबकी रक्षा कर सकते है।”

 

 

 

 

 

तब महादेव सबको दुखी देखकर अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपने पुत्र गणेश को गजमुखासुर का वध करने का आदेश दिया।

 

 

 

 

गणेश जी के साथ अन्य देवता सहायता के लिए जाना चाहते थे। लेकिन शंकर जी ने सभी देवताओ को मना कर दिया। अब गणेश जी अकेले ही जाकर गजमुखासुर को युद्ध के लिए ललकारने लगे।

 

 

 

 

गजमुखासुर ने गणेश जी के ऊपर अपने सभी अस्त्रों का संधान किया लेकिन उसके सभी अस्त्र विफल हो गए। तब गणेश जी बोले, “अरे दुष्ट असुर देख मैं न तो मनुष्य हूँ न दानव, न ही मेरा पूर्ण शरीर देवता का है। मैं तो देवता और हाथी का स्वरूप हूँ तू मुझे नहीं हरा पाएगा।”

 

 

 

 

इतना सुनकर ही गजमुखासुर भागने लगा क्योंकि उसके सारे अस्त्र शस्त्र विफल हो रहे थे। गणेश जी गजमुखासुर के पीछे-पीछे भागने लगे।

 

 

 

 

तब उस दुष्ट असुर ने मूषक का रूप धारण कर लिया। गणेश जी उस मूषक पर सवार हो गए। उस असुर ने गणेश जी को गिराना चाहा।

 

 

 

 

तब गणेश जी ने मूषक के रूप में असुर के कानो को पकड़ लिया। असुर जितनी कोशिश करता गणेश जी को गिराने के लिए उतनी ही बार उसके कान की खिचाई हो जाती थी क्योंकि गणेश जी ने उस दुष्ट मूषक रूपी असुर के कानो को पकड़ रखा था।

 

 

 

 

 

तभी मूषक के कान बड़े हो गए। अब उस मूषक के रूप में असुर को अपनी भूल का अंदाजा हो गया था। उसने गणेश जी से अपनी पराजय स्वीकार कर लिया था और बोला, “गणेश जी आपने मुझे अपना वाहन बनाकर कृतार्थ कर दिया अब मैं इस रूप में ही सदैव आपके साथ रहना चाहता हूँ।”

 

 

 

 

 

उसके बाद से गणेश जी गजमुखासुर को अपना वाहन स्वीकार कर लिया और सभी को उस दुष्ट असुर के त्रास से मुक्ति दिलाया।

 

 

 

 

बदमाश मुखिया

 

 

 

Comics Books In Hindi Pdf

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विक्रमपुर गांव बहुत ही सुखी और संपन्न गांव था। विक्रमपुर रातो रात ही सुखी और संपन्न नहीं हुआ था। उसकी सम्पन्नता में कई पीढ़ी के मुखिया का अथक परिश्रम और प्रयास था।

 

 

 

 

लेकिन जो वर्तमान में विक्रमपुर का मुखिया था। वह गांव की सम्पन्नता में कम और अहंकार की परिपूर्णता में अधिक ध्यान देता था। उसने कुछ ऐसे नियम बना दिए थे कि उसके जीवित रहते कोई अन्य मुखिया बन ही नहीं सकता था।

 

 

 

 

 

वह अपने घर के बाहर जाकर बैठ जाता था और अपने हाथ में एक डंडा रखता था। मुखिया रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति को चाहे वह किसी भी उम्र का हो सभी को एक डंडा अवश्य ही मारता था।

 

 

 

 

 

मुखिया ने अपने घर के सामने एक सुंदर सी फुलवारी लगवा रखा था। फुलवारी में तरह-तरह के रंग बिरंगे और सुगन्धित फूल खिले रहते थे। फुलवारी की देखभाल के लिए मुखिया ने एक माली का प्रबंध किया था।

 

 

 

 

जब भी माली फूलो की देखभाल के लिए आता था। तब उसे मुखिया गिनकर सात डंडे अवश्य ही मारता था। इस तरह मुखिया बहुत प्रसन्न होता था। मुखिया विघ्न संतोषी था पर पीड़ा में उसे ख़ुशी मिलती थी।

 

 

 

 

विक्रमपुर गांव के सभी लोग उस क्रूर मुखिया से बहुत तंग आ चुके थे। लेकिन मुखिया के पास असीमित अधिकार होने के कारण कोई भी उसका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाता था।

 

 

 

 

यद्यपि सभी लोगो में मुखिया के प्रति भारी असंतोष व्याप्त था। धीरे-धीरे कई वर्ष बीतते गए मुखिया अब वृद्ध हो चला था। तथापि उसकी आदत में कोई भी सुधार नही हुआ और न ही सुधार होने की कोई संभावना थी।

 

 

 

 

सभी लोग अपने घर परिवार के प्यार में इतना उलझ जाते है कि उन्हें पता ही नहीं लगता कि सब कुछ यही पर छोड़ना पड़ेगा। एक मृत्यु ही तो है जो सबको अपने साथ अवश्य ही लेकर जाती है।

 

 

 

 

 

वह मृत्यु लोक के सभी प्राणियों से इतना ज्यादा प्यार करती है कि इस मृत्यु लोक के हर प्राणी को अपने साथ और अपने पास रखने के लिए उतावली रहती है।

 

 

 

 

 

इस तरह वह निर्दयी मुखिया को भी मृत्यु एक दिन अपने साथ ले गई। मुखिया की मृत्यु का समाचार सुनते ही विक्रमपुर के सभी नागरिक ख़ुशी से झूमते हुए गाने बाजे के साथ ही मुखिया के घर के बाहर एकत्रित हो गए और मुखिया की अंतिम यात्रा की तैयारी धूम-धाम से करने में लग गए।

 

 

 

 

 

मुखिया को खूब इत्र गुलाब से नहलाकर फूलो का हार पहनाया गया। फिर उसे चार चार लोग उसके शव को गाड़ी में रखकर श्मशान घाट ले गए।

 

 

 

 

प्रत्येक लोग इतने खुश थे कि उन्हें मानो नई जिंदगी मिल गई थी। किसी भी मृतक को एक पाव भी घी नसीब नहीं होता है लेकिन उस मुखिया को लोग सैकड़ो मटके घी से सरावोर कर दिया।

 

 

 

 

ऐसा इसलिए कि उस ‘महादुष्ट मुखिया’ की प्रताड़ना से सब लोग आजाद हो गए थे। सैकड़ो कुंतल लकड़ियों पर मुखिया का पार्थिव शरीर रखा गया और सभी लोगो ने नाच गाने के मध्य ही मुखिया की चिता को अग्नि के हवाले कर दिया।

 

 

 

 

सभी के मन में यह विचार था कि उस दुष्ट मुखिया का एक भी निशान शेष नहीं रहना चाहिए। मुखिया का एक लड़का था, वह बहुत ही ईमानदार था। उसने अपने पिता के बनाए हुए सभी नियम निरस्त कर दिए थे।

 

 

 

 

सभी गांव के लोग सबकी सहमति से मुखिया के लड़के को विक्रमपुर का नया मुखिया बना दिया था। मुखिया के मरने के बाद उसका माली बहुत जोर-जोर से रोने लगा।

 

 

 

 

तब नए मुखिया ने माली से पूछा, “क्या तुम्हे पुराने मुखिया के मरने पर प्रसन्नता नहीं हुई ?”

 

 

 

 

तब माली ने नए मुखिया से कहा, “हमे पुराने मुखिया के मरने पर खूब प्रसन्नता हुई। लेकिन मैं इसलिए रो रहा हूँ कि अगर वह फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेकर किसी तरह यहां आ गया तो हम सभी लोगो को फिर पहले की तरह सताएगा।”

 

 

 

 

उसी समय एक बुजुर्ग सज्जन ने कहा, “कि ऐसी मान्यता है कि जिस मनुष्य के पाप कर्म ज्यादा होते है। उस पाप कर्म के बोझ से दबकर मनुष्य की आत्मा एकदम लघु से लघुतर हो जाती है। जिस कारण उस लघु से लघुतर आत्मा को कीट पतंगो का जीवन प्राप्त होता है और जिसके कर्म अच्छे होते है तो उस अच्छे कर्म के कारण स्वरुप उस मनुष्य की आत्मा का पूर्ण विस्तार होकर वापस मनुष्य का जीवन प्राप्त होता है।”

 

 

 

 

 

उस बुजुर्ग की बात सुनकर माली खुश हो गया। उसे विश्वास हो गया कि अब दुष्ट मुखिया को मनुष्य का जीवन दुबारा मिलना संभव नहीं है। विक्रमपुर गांव के सभी लोग अपने नए मुखिया से खुश थे।

 

 

 

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