Chitralekha Hindi Book Pdf Free / चित्रलेखा हिंदी बुक Pdf Free

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चित्रलेखा नावेल खरीदें। मंत्र 195 में 

 

 

 

चित्रलेखा राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित बहुत ही प्रसिद्ध उपन्यास है। चित्रलेखा के लेखक भगवती चरण वर्मा जी है। यह उपन्यास उन विरले उपन्यास में गिना जाता है जो काल की सीमा लांघती है अर्थात उसे तब जैसा पढ़ा जाता था आज भी वैसी ही लोकप्रियता उसकी बनी हुई है। चित्रलेखा की कहानी पाप और पुण्य पर केंद्रित है। पाप का निवास क्या है ? आपको पूरी कहानी समझने के लिए यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

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सारे शरीर में व्याप्त (अविनाशी आत्मा) – कृष्ण कहते है – जो सारे शरीर में व्याप्त है उसे ही तुम अविनाशी समझो। उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त आत्मा की प्रकृति का अधिक स्पष्ट वर्णन हुआ है। प्रत्येक शरीर को शरीर में किसी अंश या पूरे भाग में सुख दुख का अनुभव होता है, सभी लोग समझते है कि जो सारे शरीर में व्याप्त है वह चेतना है। किन्तु चेतना की यह स्थिति किसी के शरीर  सिमित रहती है। एक शरीर के सुख तथा दुख का बोध दूसरे शरीर को नहीं होता है। फलतः प्रत्येक शरीर में व्यष्टि आत्मा है। इस आत्मा को बाल के अग्रभाग के दस हजारवें भाके तुल्य बताया जाता है और इस आत्मा की उपस्थिति का लक्षण व्यष्टि चेतना द्वारा परिलक्षित होता है। श्वेताश्वर उपनिषद में आत्मा का विशद वर्णन हुआ है। (श्वेताश्वर उपनिषद 5. 9) “यदि बाल के अग्रभाग को एक सौ भागो में विभाजित किया जाय और फिर इनमे से प्रत्येक भाग को एक सौ भागो में विभाजित किया जाय तो इस तरह से प्रत्येक भाग का माप ही आत्मा का परिमाप है।”

 

 

 

इस प्रकार आत्मा का प्रत्येक कण भौतिक परमाणुओं से होता है और ऐसे ही असंख्य कण है। यह अत्यंत लघु आत्म स्फुलिंग भौतिक शरीर का मूल आधार है और इस आत्म स्फुलिंग का प्रभाव सारे शरीर में उसी तरह से व्याप्त रहता है जिस तरह से किसी औषधि का प्रभाव पूरे शरीर में व्याप्त रहता है। सामान्य से सामान्य व्यक्ति समझ सकता है कि यह भौतिक शरीर चेतना रहित होने पर मृतक हो जाता है। आत्मा की यह धारा (विद्युत धारा) सारे शरीर में में चेतना के रूप में अनुभव की जाती है और यही आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण है। शरीर की मृत अवस्था में इस चेतना को किसी भी भौतिक उपचार से वापस नहीं लाया जा सकता है। अतः यह चेतना भौतिक संयोग के फलस्वरूप नहीं है अपितु इसका कारण आत्मा ही है।

 

 

 

 

हठ योग का प्रायोजन विविध आसनो द्वारा उन पांच प्रकार के प्राणो को नियंत्रित करना है जो आत्मा को घेरे हुए है। यह योग किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं अपितु भौतिक आकाश के बंधन से अणु आत्मा की मुक्ति के लिए किया जाता है। इस प्रकार से अणु आत्मा को सारे वैदिक साहित्य ने स्वीकार किया है और प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति अपने व्यावहारिक अनुभव से इसका प्रत्यक्ष अनुभव करता है। केवल मुर्ख व्यक्ति ही इस अणु आत्मा को सर्वव्यापी विष्णु तत्व के रूप में सोच सकता है।

 

 

 

 

मुंडक उपनिषद में (3. 19) सूक्ष्म (परमाणविक) आत्मा की और अधिक विवेचना हुई है। “आत्मा आकार अणु तुल्य है जिसे पूर्ण बुद्धि के द्वारा ही जाना जा सकता है। यह अणु आत्मा पांच प्रकार के प्राणो में तैर रहा है। (प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान) यह पांच प्राण है और हृदय के भीतर स्थित है और देहधारी जीव के पूरे शरीर में अपने प्रभाव का विस्तार करता है। जब आत्मा को पांच वायु के कल्मष से शुद्ध कर लिया जाता है तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव प्रकट होता है।

 

 

 

 

अणु आत्मा का प्रभाव सारे शरीर में व्याप्त हो सकता है। मुंडक उपनिषद के अनुसार यह अणु आत्मा प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है। चूंकि भौतिक विज्ञानी इस अणु आत्मा को मापने में असमर्थ होते है। अतः उनमे से कुछ अनुभव करते है कि आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है। जो लाल रुधिर कण फेफड़ो में ऑक्सीजन ले जाता है उन्हें आत्मा से ही शक्ति प्राप्त होती है। अतः जब आत्मा यहां से निकल जाता है तब रुधिरोत्पादक संलयन (fusion) बंद हो जाता है।

 

 

 

 

व्यष्टि आत्मा तो परमात्मा के साथ-साथ हृदय में है और इसलिए शारीरिक गतियों की सारी शक्ति इसी भाग से उद्भूत है। औषधि विज्ञान लाल रुधिर कणो की महत्ता को स्वीकार तो करता है किन्तु यह निश्चित करने में समर्थ नहीं हो पाता कि शक्ति का श्रोत आत्मा है। हृदय ही सारी शक्ति का उद्गम स्थल है इसे औषधि विज्ञान भी स्वीकार करता है।

 

 

 

 

अतः कोई चाहे वैदिक ज्ञान का अनुगामी हो या आधुनिक विज्ञान का ज्ञाता हो वह शरीर में आत्मा के अस्तित्व को नकार ही नहीं सकता है। पूर्ण आत्मा के ऐसे अणुकणो की तुलना सूर्य के प्रकाश कणो से की जाती है। इस सूर्य प्रकाश में अनेको तेजोमय अणु होते है। इसी प्रकार परमेश्वर के अंश उनकी किरणों के परमाणु स्फुलिंग है और प्रभा या पराशक्ति कहलाते है। भगवान ने स्वयं भगवद्गीता में आत्मा के इस विज्ञान का विशद वर्णन किया है।

 

 

 

 

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