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Chitragupta Chalisa Pdf Hindi / चित्रगुप्त चालीसा Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Chitragupta Chalisa Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Chitragupta Chalisa Pdf Hindi download कर सकते हैं और आप यहां से Ret Samadhi Book Pdf Hindi कर सकते हैं।

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Chitragupta Chalisa Pdf Hindi Download

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

देखते ही दक्ष के हृदय में प्रेम उमड़ आया। उस प्रेम ने उनके अंतःकरण को निर्मल एवं प्रसन्न कर दिया। पहले महादेव जी से द्वेष करने के कारण उनका अंतःकरण मलिन हो गया था। परन्तु उस समय शिव के दर्शन से वे तत्काल शरद ऋतु के चन्द्रमा की भांति निर्मल हो गए।

 

 

 

 

उनके मन में भगवान शिव की स्तुति करने का विचार उत्पन्न हुआ। परन्तु वे अनुरागाधिक्य के कारण तथा अपनी मरी हुई पुत्री का स्मरण करके व्याकुल हो जाने के कारण तत्काल उनका स्तवन न कर सके। थोड़ी देर बाद मन स्थिर होने पर दक्ष ने लज्जित हो लोकशङ्कर शिवशंकर को प्रणाम किया और उनकी स्तुति आरंभ की।

 

 

 

 

उन्होंने भगवान शंकर की महिमा गाते हुए बारंबार उन्हें प्रणाम किया। फिर अंत में कहा – परमेश्वर! आपने ब्रह्मा होकर सबसे पहले आत्मतत्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने मुख से विद्या तप और व्रत धारण करने वाले ब्राह्मणो को उत्पन्न किया था।

 

 

 

 

जैसे ग्वाला गौओ की रक्षा करता है उसी प्रकार मर्यादा का पालन करने वाला आप परमेश्वर दंड धारण किए उन साधु ब्राह्मणो की सभी विपत्तियों से रक्षा करते है। मैंने दुर्वचन से आप परमेश्वर को बींध डाला था। फिर भी आप मुझपर अनुग्रह करने के लिए यहां आ गए।

 

 

 

 

अब मेरी ही तरह अत्यंत दैन्यपूर्ण आशा वाले इन देवताओ पर भी कृपा कीजिए। भक्तवत्सल! दीनबन्धो! शंभो! मुझमे आपको प्रसन्न करने के लिए कोई गुण नहीं है। आप षड्विधि ऐश्वर्य से सम्पन्न परात्पर परमात्मा है। अतः अपने ही बहुमूल्य उदारता पूर्ण बर्ताव से मुझपर संतुष्ट हो।

 

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – नारद! इस प्रकार लोक कल्याणकारी महाप्रभु महेश्वर शंकर की स्तुति करके विनीत चित्त प्रजापति दक्ष चुप हो गए। तदनन्तर श्री विष्णु ने हाथ जोड़ भगवान वृषभध्वज को प्रणाम करके प्रसन्नता पूर्ण हृदय और वाणी द्वारा उनकी स्तुति प्रारंभ की।

 

 

 

 

तदनन्तर मैंने कहा – देवदेव! महादेव! करुणासागर! प्रभो! आप स्वतंत्र परमात्मा है। अद्वितीय एवं अविनाशी परमेश्वर है। देव! ईश्वर! आपने मेरे पुत्र पर अनुग्रह किया। अपने अपमान की ओर कुछ भी ध्यान न देकर दक्ष के यज्ञ का उद्धार कीजिए।

 

 

 

देवेश्वर! आप प्रसन्न होइए और समस्त शापो को दूर कर दीजिए। आप सज्ञान है। अतः आप ही मुझे कर्तव्य की ओर प्रेरित करने वाले है और आप ही अकर्तव्य से रोकने वाले है। महामुने! इस प्रकार परम परमेश्वर की स्तुति करके मैं दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर खड़ा हो गया।

 

 

 

 

तब सुंदर विचार रखने वाले इंद्र आदि देवताओ और लोकपाल शंकर देव की स्तुति करने लगे। उस समय भगवान शिव का मुखारबिंद प्रसन्नता से खिल उठा था। इसके ब्नद प्रसन्नचित्त हुए समस्त देवताओ, दूसरे-दूसरे सिद्धो, ऋषियों और प्रजापतियो ने भी शंकर जी की सहर्ष स्तवन किया।

 

 

 

 

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