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दिव्य ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

कर्म के फल से परे (कृष्ण) – यहां पर भगवान खुद को कर्म फल से परे बताते है और कहते है मुझपर किसी कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता, न ही मैं कर्म फल की कामना करता हूँ। जो भी मेरे संबंध में इस सत्य को जानता है वह भी कर्मो के फल पाश में नहीं बंधता अर्थात उसे भी कर्म फल नहीं बांध पाते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जिस प्रकार भौतिक जगत में संविधान के नियम है जो यह बताते है कि राजा न तो दंडनीय रहता है, न ही किसी राज नियमो के अधीन ही रहता है। उसी तरह यद्यपि भगवान इस भौतिक जगत के शृजनहार है। किन्तु वह भौतिक जगत के कार्यो द्वारा कभी प्रभावित नहीं होते है।

 

 

 

किसी संस्थान का स्वामी कर्मचारियों के अच्छे या बुरे कार्यो के लिए उत्तरदायी कदापि नहीं होता है। कर्मचारी स्वतः ही अपने कार्यो के लिए उत्तरदायी रहते है। जीवात्माएँ अपने इन्द्रिय तृप्ति के कार्यो में लगी रहती है किन्तु वह कार्य भगवान द्वारा निर्दिष्ट नहीं होते है। शृष्टि करने पर भी भगवान इससे पृथक रहते है जबकि जीवात्माएँ भौतिक कार्य कलापो के सकाम कर्म फलो से बद्ध रहती है क्योंकि उनमे प्राकृतिक साधनो पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रवृत्ति रहती है।

 

 

 

 

इन्द्रिय तृप्ति के उत्तरोत्तर प्रगति के लिए सारी जीव आत्माए इस संसार के कर्मो में प्रवृत्ति हो जाती है और मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग में सुख की कामना के वशीभूत रहती है। स्वयं में पूर्ण होने के कारण ही भगवान को तथा कथित स्वर्ग सुख का कोई आकर्षण ही नहीं रहता है। स्वामी कभी भी कर्मचारियों के जैसा ही निम्नस्तरीय या कि स्तर हीन सुख की कामना नहीं करता है। सारे देवतागण भगवान के द्वारा नियुक्त सेवक है, स्वामी सदैव ही भौतिक क्रिया कलापो से पृथक रहता है। उदाहरणार्थ – पृथ्वी पर उगने वाली विभिन्न वनस्पतियो के लिए वर्षा का उत्तरदायित्व नहीं होता है। यद्यपि वर्षा के बिना वनस्पतियो का उगना संभव नहीं है।

 

 

 

 

वैदिक पुष्टि के द्वारा ही इसे समझा जा सकता है – “भौतिक शृष्टि के लिए भगवान ही परम कारण है। प्रकृति तो केवल निमित्त मात्र है। जिसमे विराट जगत दृष्टिगोचर होता है।” प्राणियों की अनेक जातियां होती है यथा देवता मनुष्य तथा निम्न पशु और ए सब पूर्व के शुभाशुभ कर्मो के फल को भोगने के लिए बाध्य होते है। वेदांत सूत्र में (2. 1. 34) पुष्टि हुई है। भगवान किसी भी जीव के प्रति पक्षपात कदापि नहीं करते। जीवात्मा अपने कर्मो के लिए स्वयं ही उत्तरदायी होती है।

 

 

 

 

भगवान उन्हें केवल ऐसे कर्म करने के लिए समुचित सुविधाए तथा प्रकृति के गुणों के नियम सुलभ कराते है किन्तु वह उनके भूत तथा वर्तमान कर्मो के प्रति उत्तरदायी नहीं होते है। भगवान उसे प्रकृति अर्थात वाहिरंगा शक्ति के माध्यम से केवल सुविधा प्रदान  होते है। जो व्यक्ति भगवान के दिव्य स्वभाव को नहीं जानता और सोचता है कि भगवान के समस्त कार्य कलाप सामान्य व्यक्तियों की तरह कर्म फल के लिए होते है। वह व्यक्ति निश्चित रूप से कर्म फलो में आबद्ध हो जाते है।

 

 

 

 

जो व्यक्ति इस कर्म नियम की सारी बारीकियों से भली प्रकार से अवगत होता है वह अपने कर्मो के फल से प्रभावित नहीं होता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति भगवान के इस दिव्य स्वभाव से परिचित होता है वह कृष्ण भावनामृत में अनुभवी होता है। अतः उस व्यक्ति पर कर्म के नियम लागू नहीं होते या कर्म के फल उस व्यक्ति के ऊपर अपना प्रभाव नहीं दिखा पाते। किन्तु जो भी परम सत्य को जानता है वह कृष्ण भावनामृत में स्थिर मुक्त जीव है।

 

 

 

 

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