Chhaya Mat Chhuna Man Hindi Pdf / छाया मत छूना मन हिमांशु जोशी Pdf

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Chhaya Mat Chhuna Man Hindi Pdf / छाया मत छूना मन Hindi Pdf

 

 

 

Chhaya Mat Choona Man Hindi Pdf Free Download

 

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

 

जो समाज को सामाजिक जीवन के चार विभागों एवं काम धंधो अथवा वर्णो के चार विभागों में विभाजित करती है – मानव समाज को जन्म के अनुसार विभाजित करने का उद्देश्य उस संस्था का कदापि नहीं है।

 

 

 

 

ऐसा विभाजन शैक्षिक योग्यताओ के आधार पर किया जाता है। यह विभाजन समाज में शांति तथा सम्पन्नता बनाये रखने में सहायक होता है। यहां पर जिन गुणों का उल्लेख हुआ है उन्हें दिव्य कहा गया है और वह आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति करने वाले व्यक्तियों के निमित्त है जिससे वह लोग भौतिक जगत से मुक्त हो सके।

 

 

 

 

वर्णाश्रम संस्था में सन्यासी को समस्त सामाजिक वर्णो तथा आश्रमों में प्रधान या गुरु माना गया है या गुरु माना जाता है जो यह सोचता है कि समाज से सभी प्रकार के संबंध तोड़ लेने पर हमारी रक्षा कौन करेगा तो ऐसे लोगो को सन्यास ग्रहण नहीं करना चाहिए। सन्यासी की पहली योग्यता निर्भयता होनी चाहिए।

 

 

 

 

चूँकि सन्यासी को बिना किसी सहायक के एकाकी रहना होता है। अतएव भगवान की कृपा ही उसकी एकमात्र आश्रय होती है। ब्राह्मण को समाज के तीन वर्णो – क्षत्री के, वैश्यो तथा शूद्रों – का गुरु माना जाता है।

 

 

 

 

लेकिन सन्यासी इस संस्था के शीर्ष पर होते है और वह ब्राह्मणो का भी गुरु माना जाता है। सन्यास करने वाले सन्यासी को यह पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि अन्तर्यामी स्वरुप परमात्मा या कृष्ण सदैव अंतर में रहते है, वह सब कुछ देखते है और जानते है कि कोई क्या करना चाहता है।

 

 

 

 

सन्यासी को सदैव ही यह सोचना चाहिए कि “मैं कभी अकेला नहीं हूँ” इस तरह मनुष्य को दृढ विश्वास होना चाहिए कि परमात्मा स्वरुप कृष्ण ही शरणागत व्यक्ति की रक्षा करेंगे।

 

 

 

 

 

भले ही वह (सन्यासी) गहनतम जंगल में क्यों न रहे। उसका साथ कृष्ण देंगे और सब तरह से उसकी रक्षा करेंगे। ऐसा विश्वास अभयम या निर्भयता कहलाता है।

 

 

 

 

सन्यास आश्रम में व्यक्ति की ऐसी मनोदशा आवश्यक है। भगवान चैतन्य आदर्श सन्यासी थे और जब वह अपने प्रवास में पुरी में रहते थे तो उनकी भक्तिनो को उनके पास नमस्कार करने तक के लिए आना वर्जित था।

 

 

 

 

उन्हें दूर से ही प्रणाम करने का आदेश था। यह स्त्री जाति के लिए घृणाभाव का चिन्ह कदापि नहीं था अपितु सन्यासी पर लगाया गया प्रतिबंध था कि उसे स्त्रियों से निकट सम्पर्क नहीं रखना चाहिए।

 

 

 

 

सन्यास आश्रम में पालन किए जाने के लिए अनेक विधि-विधान है। सन्यासी को अपने अस्तित्व को शुद्ध करना होत्ता है। इनमे सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सन्यासी को किसी स्त्री के साथ घनिष्ठ संबंध रखना चाहिए उसे एकांत स्थान में स्त्री से बाटे करने तक कि मनाही है।

 

 

 

 

मनुष्य को अपने अस्तित्व को शुद्ध बनाने के लिए विशेष परिस्थिति (स्तर) मे विधि-विधानों का पालन करना होता है। सन्यासी के लिए स्त्रियों के साथ घनिष्ठ संबंध तथा इन्द्रिय तृप्ति के लिए धन का संग्रह वर्जित है। आदर्श सन्यासी तो स्वयं भगवान चैतन्य थे और उनके जीवन से हमे सीख लेनी चाहिए कि वह स्त्रियों के विषय में कितने कठोर थे।

 

 

 

 

भगवान चैतन्य का एक निजी पाषर्द छोटा हरिदास उनके अन्य पार्षदों सहित उनके साथ निरंतर रहा, लेकिन किसी कारण वश उसने एक तरुणी को आसक्ति की दृष्टि से दृष्टिपात किया।

 

 

 

 

भगवान चैतन्य इतने कठोर थे कि उन्होंने उसे अपने पार्षदों की संगति से तुरंत ही विलग कर दिया। चैतन्य महाप्रभु तो भगवान के सबसे वदान्य अवतार माने जाते है क्योंकि वह अधम से अधम बद्ध जीवो को स्वीकार करते थे, लेकिन जहां तक स्त्रियों की संगति का प्रश्न था, वह सन्यास आश्रम के विधि-विधानों का कठोरता से पालन करते थे।

 

 

 

 

 

उनका कहना था “जो सन्यासी या अन्य कोई भी व्यक्ति प्रकृति के चंगुल से छूटने का इच्छुक है और अपने को आध्यात्मिक प्रकृति तक ऊपर उठाना चाहता है तथा भगवान के पास वापस जाना चाहता है  वह उनका उपभोग न करे, उनकी ओर इच्छा दृष्टि से देखे।

 

 

 

 

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