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Chandra Stotram Pdf / चंद्र स्तोत्र Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Chandra Stotram Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Chandra Stotram Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से चंद्र देव मंत्र Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Chandra Stotram Pdf / चंद्र स्तोत्रम पीडीएफ

 

 

 

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Chandra Stotram Pdf
चंद्र स्तोत्र पीडीऍफ़ डाउनलोड 
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Chandra Stotram Pdf
चंद्र कवच पीडीऍफ़ डाउनलोड
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Chandra Stotra in Hindi

 

 

 

श्वेताम्बर: श्वेतवपु: किरीटी, श्वेतद्युतिर्दण्डधरो द्विबाहु: ।

चन्द्रो मृतात्मा वरद: शशांक:, श्रेयांसि मह्यं प्रददातु देव: ।।1।।

 

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।

नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम ।।2।।

 

क्षीरसिन्धुसमुत्पन्नो रोहिणी सहित: प्रभु: ।

हरस्य मुकुटावास: बालचन्द्र नमोsस्तु ते ।।3।।

 

सुधायया यत्किरणा: पोषयन्त्योषधीवनम ।

सर्वान्नरसहेतुं तं नमामि सिन्धुनन्दनम ।।4।।

 

राकेशं तारकेशं च रोहिणीप्रियसुन्दरम ।

ध्यायतां सर्वदोषघ्नं नमामीन्दुं मुहुर्मुहु: ।।5।।

 

इति मन्त्रमहार्णवे चन्द्रमस: स्तोत्रम

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

 

उन्होंने अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट कंद, मूल, फल लाकर श्री राम जी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

फिर वह हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गई। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। उन्होंने कहा – मैं किस प्रकार से आपकी स्तुति करू? मैं अत्यंत ही मूढ़ बुद्धि हूँ।

 

 

 

 

मैं मंदबुद्धि हूँ। श्री रघुनाथ जी ने कहा – हे भामिनि! मेरी बात सुन, मैं तो केवल एक भक्ति का ही संबंध मानता हूँ।

 

 

 

 

जाती-पाती, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुंब, गुण और चतुराई इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित व्यक्ति कैसा लगता है जैसे जलहीन बादल दिखाई देता है।

 

 

 

 

मैं तुमसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति संतो का सत्संग है। दूसरी भक्ति मेरे कथा प्रसंगो में प्रेम है।

 

 

 

 

35- दोहा का अर्थ-

 

 

 

तीसरी भक्ति अभिमान रहित होकर गुरु के चरणों की सेवा करना है और चौथी भक्ति यह है कि सब कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करे।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

मेरे मंत्र का जाप और मुझमे दृढ विश्वास यह पांचवी भक्ति है जो वेदो में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुत कार्यो से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषो के धर्म आचरण में लगे रहना।

 

 

 

 

सातवीं भक्ति है सारे जगत को मुझसे ओत-प्रोत देखना और मुझसे अधिक संत पुरुषो को मानना। आठवीं भक्ति वह है कि कुछ भी मिल जाय उसी में ही संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोष को न देखना।

 

 

 

 

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