{ PDF } Chanakya Neeti PDF Hindi Download / चाणक्य नीति PDF इन हिंदी

Chanakya Neeti PDF Hindi मित्रों इस पोस्ट में Chanakya Niti PDF के बारे में दिया गया है।  आप यहां से Chanakya Niti in Hindi PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

Chanakya Neeti PDF Hindi Download चाणक्य नीति PDF 

 

 

 

 

 

 

 

आचार्य चाणक्य भारत में अपने परिचय के लिए उन्हें किसी उपमा की आवश्यकता नहीं है। वह भारतीय इतिहास के क्षितिज में एक अत्यंत प्राज्वल्य मान नक्षत्र है, जो स्वयं ही प्रकाशित होकर अपने देश को प्रकाशीय ऊर्जा से भर दिया, उनके दिखाए हुए मार्ग का दुनिया के अनेक देश अनुकरण कर रहे है।

 

 

 

 

 

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक, कुशल राजनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री चतुर कूटनीतिज्ञ के रूप में आचार्य चाणक्य सदैव स्मरणीय है। वह ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता क्षमता और विद्वता के बल से भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया।

 

 

 

 

 

चाणक्य ने अपने जीवन के अनुभव चिंतन अध्ययन से अर्जित ज्ञान को मानव कल्याण के लिए अभिव्यक्त किया है। इतना कालखंड बीत जाने के बाद भी चाणक्य नीति की उपयोगिता बानी हुई है। चाणक्य की तुलना किसी से किया ही नहीं जा सकता है। उनकी तुलना किसी से करना “सूरज” को दीपक दिखाने जैसा होगा।

 

 

 

Chanakya Neeti PDF Hindi
Chanakya Neeti PDF Hindi

 

 

 

चाणक्य नीति ( Chankya Niti Hindi PDF ) –  चाणक्य नीति में कुल 17 अध्याय है। इनकी नीतियों में राजा का कर्तव्य, जनता का अधिकार और वर्ण व्यवस्था के विषय में उचित मार्ग दर्शन किया गया है।

 

 

 

चाणक्य नीति के पति परायण स्त्री और चरित्र हीन स्त्री में भेद, दुश्मन की पहचान व मित्र भेद की व्याख्या भी अनेक उदाहरण के द्वारा बताई गयी है, जो आज के दौर में कसौटी पर सोने के जैसा ही खरा उतरती है।

 

 

 

 

 

चाणक्य के नीति परक ग्रंथ में जीवन सिद्धांत तथा आदर्श का बड़ा सुंदर संगम देखने में आता है। संस्कृत साहित्य में नीति परक शास्त्रों में चाणक्य नीति शास्त्र का उच्च स्थान है। इसका मुख्य विषय मानव समाज को सफल बनाने के लिए अमूल्य सुझाव दिए गए है।

 

 

 

 

 

इनके द्वारा रचित नीति शास्त्र का अनुकरण आज भी प्रासंगिक है। इन्होने अपनी नीतियों के द्वारा ही मौर्य साम्राज्य के अपने समय में बुलंदियों पर पहुंचाने का कार्य किया, इस ग्रंथ में सूत्रात्मक शैली में जीवन यापन की व्याख्या का समावेश है। चाणक्य के लिखे हुए अर्थ शास्त्र को “कौटिल्य का शास्त्र” भी कहते है, क्योंकि आचार्य चाणक्य का एक नाम कौटिल्य भी था।

 

 

 

दहेज़ चाहिए या बहू? Hindi Kahani 

 

 

 

नरोत्तम  की एक विदुषी कन्या थी। उसका नाम सुरभि था। वह अच्छे ढंग से पढ़ी-लिखी हुई लड़की थी। उसे समाज में लड़कियों के साथ होता पक्षपात सहन नहीं होता था।

 

 

 

 

नरोत्तम ने अपनी कन्या का विवाह देवनरायण के लड़के के साथ तय कर दिया था। देवनरायण पैसे का लोभी था। उसका लड़का किशोर सरकारी नौकरी करता था।

 

 

 

 

इसलिए उसने दहेज़ में किशोर का सारा पढ़ाई का पैसा वसूलने की सोच रखा था। नरोत्तम जब अपनी लड़की का रिश्ता देवनरायण के लड़के के साथ तय करने पहुंचे थे तभी देवनरायण ने नरोत्तम से कह दिया था कि पूरे दस लाख रुपये दहेज में चाहिए तब ही यह रिश्ता होगा अन्यथा नहीं।

 

 

 

 

 

नरोत्तम ने दस लाख रुपये दहेज देने का आश्वासन दिया था। लेकिन यह बात नरोत्तम गायकवाड़ ने अपनी लड़की सुरभि को नहीं बताई थी।

 

 

 

 

उन्हें डर था कि दहेज की बात मालूम होने पर सुरभि शादी से इंकार कर देगी। शादी का समय धीरे-धीरे नजदीक आ गया था। वर वधू लग्न मंडप में बैठे हुए थे। पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे।

 

 

 

 

 

वर वधू के पास नरोत्तम की अर्धांगिनी को बैठना था लेकिन वह भी दहेज के खिलाफ थी। इसलिए वहां से चली गई थी। अब नरोत्तम गायकवाड़ ने यह रश्म निवाही और वर वधू के पीछे आकर बैठ गए।

 

 

 

 

तभी देवनरायण ने पीछे से आकर कहा, “नरोत्तम जी आपको बात याद है ना।”

 

 

 

 

नरोत्तम ने कहा, “आप फ़िक्र मत करिए मैं आधा पैसा अभी और आधा पैसा बाद में दे दूंगा।”

 

 

 

 

देवनरायण ने कहा, “हमे बात के मुताबिक पूरा पैसा इसी समय चाहिए अन्यथा मैं अपने लड़के को विवाह मंडप से बाहर बुला ले जाऊंगा।”

 

 

 

 

सुरभि को बात समझते देर नहीं लगी कि यह सब दहेज के लिए हो रहा है। उसने मंडप में बैठे किशोर को इस विषय में बोलने के लिए कुछ कहा तो किशोर बोला, “पिता जी के सामने कोई भी उनकी बात नहीं काट सकता है।”

 

 

 

 

देवनरायण पुनः जिन्न की भांति प्रकट होते हुए नरोत्तम से बोला, “आपको हमारी बात का ध्यान रखना होगा नहीं तो मैं अपने लड़के को अपने साथ लेकर चला जाऊंगा।”

 

 

 

 

नरोत्तम ने कहा, “आप थोड़ा धैर्य रखिए। मैंने छोटे भाई को व्यवस्था करने के लिए कह दिया है।”

 

 

 

 

कुछ समय में नरोत्तम का छोटा भाई एक बैग में नौ लाख रुपये लेकर आया और नरोत्तम से बोला, “सिर्फ नौ लाख का ही इंतजाम हो सका है।”

 

 

 

 

तभी दहेज का दानव प्रकट होते हुए बोला, “हमे पूरे दस लाख चाहिए तभी यह व्याह हो सकता है।”

 

 

 

 

नरोत्तम ने देवनरायण से कहा, “मैं आपके पैर पकड़ता हूँ। मैं आपको यह रिश्ता होने के बाद एक लाख रुपये दे दूंगा।”

 

 

 

 

अब तो सुरभि के धैर्य का बांध टूट चुका था। उसने नरोत्तम से कहा, “पिता जी रिश्ते हाथ पकड़कर संपन्न किए जाते है। पैर पकड़कर रिश्ते नहीं होते है। मैं यह शादी नहीं करुँगी।”

 

 

 

 

सुरभि के इतना कहते ही वहां के सभी लोग ताली बजाने लगे क्योंकि दहेज को दूर करने के लिए किसी एक को पहल तो करना ही था।

 

 

 

 

वह पहल सुरभि ने किया था। अब तो सुरभि मुखर हो चुकी थी। उसने देवनरायण को सम्बोधित करते हुए कहा, “आपका नाम देवनरायण भले ही हो लेकिन आपका काम तो असुरो जैसा ही है। मैं अब आपके बेटे के साथ शादी नहीं कर सकती हूँ। आप जल्द से जल्द यहां से अपने बेटे के साथ चले जाइए अन्यथा हमे आपको जेल भिजवाने का प्रबंध अवश्य ही करना पड़ेगा।”

 

 

 

 

सुरभि के इतना कहते ही देवनरायण ने अपने बेटे के साथ वहां से हटने में ही अपनी भलाई समझी और उनका दहेज़ का सपना अधूरा ही रह गया।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

भगवान का (यज्ञ का स्वामी) रूप अर्जुन को बतलाना – भगवान कहते है – हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन, निरंतर परिवर्तननशील यह भौतिक प्रकृति अधिभूत (भौतिक अभिव्यक्ति) कहलाती है।

 

 

 

 

भगवान का विराट रूप जिसमे सूर्य तथा चंद्र जैसे समस्त देवता सम्मिलित है, अधिदैव कहलाता है। तथा प्रत्येक देहधारी के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित मै परमेश्वर अधियज्ञ (यज्ञ का स्वामी) कहलाता हूँ।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – परमेश्वर के विराट स्वरुप की धारणा, जिसमे सारे देवता तथा उनके लोक सम्मिलित है, अधिदैवत कहलाती है। यह भौतिक प्रकृति निरंतर परिवर्तन होती रहती है, सामान्यतः भौतिक शरीरो को छ अवस्थाओं से निकलना होता है- 1- वे उत्पन्न होते है 2- बढ़ते है 3- कुछ काल तक रहते है 4- कुछ गौण पदार्थ उत्पन्न करते है 5- क्षीण होते है 6- और अंत में विलुप्त हो जाते है। यह भौतिक प्रकृति ही अधिभूत कहलाती है। यह किसी निश्चित समय में उत्पन्न की जाती है और किसी निश्चित समय में विनष्ट कर दी जाती है।

 

 

 

 

 

प्रत्येक शरीर में आत्मा स्थित परमात्मा का वास होता है जो भगवान कृष्ण का अंश स्वरुप है। यह परमात्मा ही अधियज्ञ कहलाता है और हृदय में स्थित होता है।

 

 

 

यह परमात्मा प्रत्येक आत्मा को मुक्त भाव से कार्य करने की छूट देता है और स्वयं उसके कार्यो की निगरानी करता रहता है क्योंकि इसके द्वारा भगवान बल देकर कहते है कि परमात्मा उनसे भिन्न नहीं है। यह परमात्मा प्रत्येक आत्मा के पास आसीन है और आत्मा के कार्य कलापो का साक्षी है तथा आत्मा की विभिन्न चेतनाओं का उद्गम है।

 

 

 

 

अधिदैवत नामक भगवान के विराट स्वरुप का चिंतन उन नवदीक्षितों के लिए है जो भगवान के परमात्मा स्वरुप तक नहीं पहुँच पाते है। अतः उन्हें परामर्श दिया जाता है कि वे उस विराट पुरुष का चिंतन करे जिनके पांव अधोलोक है जिनके नेत्र सूर्य तथा चंद्र है और जिनका सिर उच्च लोक है। परमेश्वर के इन विविध स्वरूपों के सारे कार्य उस कृष्ण भावनाभावित भक्तो को स्वतः ही स्पष्ट हो जाते है।

 

 

 

 

 

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