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Cash Memo Kya Hota Hai? कैश मेमो क्या होता है ? जाने हिंदी में

इस पोस्ट में Cash Memo Kya Hota Hai? के बारे में बताया गया है। आप इस पोस्ट में कैश मेमो क्या होता है ? के बारे में जान पायेंगे।

 

 

 

Cash Memo Kya Hota Hai? कैश मेमो क्या होता है ?

 

 

 

Cash Memo का हिंदी अर्थ धन पत्रक होता है। कैश मेमो वह पत्र होता है जिसमे बेचे गए सामान की पूरी डिटेल और दिए लिए गए पैसो का पूरा हिसाब होता है। इसपर प्रतिष्ठान का पता होता है। इसे किसी भी वाद विवाद के लिए वैध माना जाता है। कैश मेमो प्रतिष्ठान के कैश बुक में दर्ज किया जाता है।

 

 

 

Cash Memo Number – कैश मेमो नंबर प्रतिष्ठान कैश मेमो छपवाते वक़्त उसपर सीरियल वाइज लिखवाते है। जैसे Cash Memo No. 1 2 3…..100। यह नंबर प्रतिष्ठान के Cash Book में दर्ज करने में सहायक होता है।

 

 

 

Cash Meaning In Hindi – कैश का हिंदी मतलब रोकड़ा, नगद होता है। आपने यह कहावत “आज नगद कल उधार” तो सुनी ही होगी।

 

 

Cash Memo Kya Hota Hai
Cash Memo Kya Hota Hai

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत है – कृष्ण कहते है – आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु। वह न तो कभी जन्मा है न जन्म लेता है और न जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – आत्मा में परिवर्तन नहीं होता है जबकि शरीर परिवर्तनशील होता है। आत्मा अजन्मा है, चूंकि वह भौतिक शरीर धारण करता है अतः शरीर जन्म लेता है आत्मा न जन्म लेता है न मरता है। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु होती है। गुणात्मक दृष्टि से परमात्मा का अणु अंश परम से भिन्न है। वह शरीर की भांति विकारी नहीं है। कभी-कभी आत्मा को स्थायी या कूटस्थ कहा जाता है। शरीर में छह प्रकार के रूपांतर होते है। वह माता के गर्भ से जन्म लेता है कुछ काल तक रहता है बढ़ता है कुछ परिणाम उत्पन्न करता है धीरे-धीरे क्षीण होता है और अंत में समाप्त हो जाता है।

 

 

 

 

चूंकि आत्मा जन्म नहीं लेता है उसका न तो भूतकाल है न तो वर्तमान काल और न ही भविष्यकाल है। वह नित्य शाश्वत तथा सनातन है। अर्थात आत्मा के जन्म लेने का कोई इतिहास नहीं है। शरीर में परिवर्तन का आत्मा के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आत्मा वृक्ष या किसी अन्य भौतिक वस्तु की तरह क्षीण नहीं होता है। आत्मा की कोई उप सृष्टि नहीं होती है। हम शरीर के प्रभाव में आकर आत्मा का इतिहास ढूढ़ने का प्रयास करते है। आत्मा शरीर की तरह कभी वृद्ध नहीं होता है। अतः तथा कथित वृद्ध पुरुष भी अपने अंदर वाल्यकाल या युवा जैसी अनुभूति करता है।

 

 

 

 

शरीर की उप सृष्टि संताने है और वह भी व्यष्टि आत्माए है और शरीर के कारण ही वह किसी न किसी की संताने प्रतीत होती है। शरीर की वृद्धि आत्मा की उपस्थिति के कारण होती है। किन्तु न तो आत्मा की कोई उपवृद्धि है न ही उसमे कोई भी परिवर्तन होता है। अतः आत्मा शरीर के छः प्रकार के परिवर्तन से मुक्त है। कठोपनिषद में (1. 2. 18) कहा गया है।

न जायते म्रियते वा विपश्चित्रायं कुतश्चिन्न वभूव कश्चित। अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणों नहन्यते हन्य माने शरीरे।।

इसका अर्थ तथा तात्पर्य भगवद्गीता के श्लोक जैसा ही है। इस श्लोक में एक विशिष्ठ शब्द विपश्चित का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है विद्वान या ज्ञानमय।

 

 

 

 

आत्मा के दो प्रकार है – एक तो अणु आत्मा और दूसरा विभु आत्मा। कठोपनिषद में (1. 2. 20) इसकी पुष्टि इस प्रकार से हुई है। “परमात्मा तथा अणु आत्मा दोनों शरीर रूपी उसी वृक्ष में जीव के हृदय में विद्यमान है और इनमे से जो समस्त इच्छाओ तथा शोक से मुक्त हो चुका है। वही भगवद्कृपा से आत्मा की महिमा को समझ सकता है।” कृष्ण परमात्मा के भी उद्गम है जैसा कि अगले अध्याय में बताया जाएगा और अर्जुन अणु आत्मा के समान है जो अपने वास्तविक स्वरुप को भूल गया है। अतः उसे कृष्ण द्वारा या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि गुरु द्वारा प्रबुद्ध किए जाने की आवश्यकता है।

 

 

 

 

आत्मा ज्ञान या चेतना से सदैव पूर्ण रहता है। अतः चेतना ही आत्मा का लक्षण है। यदि कोई हृदयस्थ आत्मा को ढूंढने में विफल रहता है तो वह चेतना की उपस्थिति से आत्मा को ज्ञात कर सकता है। चूंकि शरीर में चाहे वह शरीर पशु का हो या किसी पुरुष का शरीर हो उनमे कुछ न कुछ चेतना अवश्य रहती है। अतः हम आत्मा की उपस्थिति को जान लेते है। कभी-कभी हम बादलो या अन्य कारणों से आकाश में सूर्य को नहीं देख पाते है किन्तु सूर्य का प्रकाश सदैव विद्यमान रहता है। प्रातः काल आकाश में ज्यों ही थोड़ा सा प्रकाश दिखता है तो हमे ज्ञात हो जाता है कि यह दिन का समय है और सूर्य आकाश में है।

 

 

 

 

जीव की चेतना परमेश्वर की चेतना से भिन्न होती है क्योंकि परम चेतना तो सर्वज्ञ है -भूत, वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञान से पूर्ण। व्यष्टि जीव की चेतना सदैव ही विस्मरणशील होती है। जब वह अपने स्वरुप को भूल जाता है तो उसे कृष्ण के उपदेशो से शिक्षा तथा प्रकाश और बोध प्राप्त होता है। किन्तु विस्मरणल जीव नहीं है। यदि वह विस्मरणशील होते तब उनके द्वारा दिए गए भगवद्गीता के उपदेश व्यर्थ होते।

 

 

 

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