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Brihaspati Kavacham Pdf / बृहस्पति कवच पीडीएफ डाउनलोड

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Brihaspati Kavacham Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Brihaspati Kavacham Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से बृहस्पति स्तोत्र Pdf भी पढ़ सकते हैं।

 

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Brihaspati Kavacham Pdf / बृहस्पति कवच पीडीएफ

 

 

 

बृहस्पति कवच पीडीऍफ़ डाउनलोड 

 

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Brihaspati Kavacham Pdf
Brihaspati Kavacham Pdf
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Brihaspati Kavach in Hindi 

 

 

 

श्रीगणेशाय नमः ।

अस्य श्रीबृहस्पतिकवचस्तोत्रमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः,

अनुष्टुप् छन्दः, गुरुर्देवता, गं बीजं, श्रीशक्तिः,

क्लीं कीलकं, गुरुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् ।

अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ १॥

बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः ।

कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ २॥

जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः ।

मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ ३॥

भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः ।

स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ ४॥

नाभिं देवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः ।

कटिं पातु जगद्वन्द्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ ५॥

जानुजङ्घे सुराचार्यो पादौ विश्वात्मकस्तथा ।

अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ ६॥

इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥

॥ इति श्रीब्रह्मयामलोक्तं बृहस्पतिकवचं सम्पूर्णम् ॥

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

चौदह वर्ष वन में रहकर, पिता जी के वचन को प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणों का दर्शन करूँगा। तू मन को दुखी न कर।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- रघुकुल में श्रेष्ठ श्री राम जी के बहुत ही नम्र और मीठे वचन माता के हृदय में कांटा के समान कसकने लगे। उस शीतल वाणी को सुनकर सहम कर सूख गई जैसे जवास पर बर्षा का पानी पड़ने से वह सूख जाता है।

 

 

 

 

2- कौशल्या के हृदय का विषाद कहने योग्य नहीं है। मानो सिंह की गर्जना से हिरनी विकल हो गई, नेत्र में जल भर आया सारा शरीर थर-थर कांपने लगा। मानो पहली वर्षा का फेन (मांजा) खाकर मछली बदहवास हो गई हो।

 

 

 

 

3- धीरज रखते हुए पुत्र का मुख देखकर माता गदगद वचन कहने लगी। हे तात! तुम तो पिताजी को प्राणो के समान ही प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रों को देखकर वह नित्य प्रसन्न होते थे।

 

 

 

4- राज्य देने के लिए उन्होंने ही शुभ दिन का शोध कराया था फिर अब किस अपराध से वन जाने को कह दिया? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ। सूर्यवंश रूपी वन को अग्नि बनकर कौन जला रहा है।

 

 

 

 

54- दोहा का अर्थ-

 

 

 

 

तब श्री राम जी का रुख देखकर मंत्री के पुत्र ने सब कारण समझाते हुए कहा। उस प्रसंग को सुनकर वह (कौशल्या) गूंगी की भांति चुप रह गई। उनकी दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

1- कौशल्या राम को वन जाने के लिए ही कह सकती है और नहीं उन्हें रुकने के लिए कह सकती है। दोनों प्रकार से ही उनके हृदय में भारी संताप हो रहा है और सोचते हुए कहती है कि देखो विधाता की चाल सदा सबके लिए ही टेढ़ी होती है। जैसे विधाता को चन्द्रमा लिखना था लेकिन राहू लिख दिए।

 

 

 

 

2- धर्म और स्नेह में दोनों तरफ से कौशल्या जी की बुद्धि घिर गई। उनकी दशा सांप छछूंदर के जैसे हो गई। वह सोचने लगी यदि अनुरोध (हठ) करके पुत्र को रख लेती हूँ यो धर्म जाता है और भाइयो में विरोध भी होगा।

 

 

 

 

3- और यदि वन जाने को कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकार के धर्म संकट में पड़ कर रानी विशेष रूप से सोचने के लिए विवश हो गई है। फिर बुद्धिमती कौशल्या जी स्त्री धर्म (पतिव्रत धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रो को समान जानकर।

 

 

 

 

4- सरल स्वभाव वाली श्री राम जी की माता बहुत धीरज के साथ बोली। हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ तुमने अच्छा किया। पिताजी की आज्ञा का पालन करना ही धर्म शिरोमणि है।

 

 

 

 

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