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Brahman Vanshavali in Hindi Pdf / ब्राह्मण वंशावली पीडीएफ

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Brahman Vanshavali in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Brahman Vanshavali in Hindi Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Brahman Vanshavali in Hindi Pdf
यहां से कान्यकुब्ज ब्राह्मण वंशावली पीडीएफ डाउनलोड करें।
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सरयूपारीण ब्राह्मण वंशावली पीडीएफ
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Brahman Vanshavali in Hindi Pdf
यहां से गोत्र प्रवर मंजरी पीडीएफ डाउनलोड करें।
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Brahman Vanshavali in Hindi Pdf
यहां से ब्राह्मण वंशावली पीडीएफ डाउनलोड करें।
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Brahmin Gotravali Pdf Download
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शूरता का वाना धरण किए हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आकर खड़े हो गए। वह चतुर अपने घोड़ो को तरह-तरह की चालो से नचा रहे है और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुनकर प्रसन्न हो रहे है।

 

 

 

2- सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथो को बहुत ही विलक्षण स्वरुप प्रदान कर दिया है। उसमे सुंदर चंवर लगे है और उसमे लगी हुई घंटियां सुंदर शब्द कर रही है। वह रथ इतने सुंदर है कि उनके सामने सूर्य के रथ की शोभा फीकी पड़ रही है।

 

 

 

3- अगणित श्याम कर्ण घोड़ो को सारथियों ने उन रथो में जोत दिया है जो देखने में सुंदर है और खूब सुंदर गहनों से सजाये गए है जो मुनियो के मन को भी मोह लेते है।

 

 

 

4- जिनकी ताप वेग की अधिकता से पानी में भी नहीं डूबती है जो पानी में भी जमीन की भांति ही चलते है। अस्त्र-शस्त्र और सभी तरह के साज को सजाकर सारथियों ने रथियो को बुलाया।

 

 

 

राजा ने देखा कि रोग असाध्य हो चुका है तो वह अपनी अत्यंत आर्त वाणी से “हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!” कहते अपना सिर पीटकर जमीन पर गिर पड़े।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- राजा व्याकुल हो गए, उनका शरीर शिथिल पड़ गया। मानो हथिनी ने कल्पवृक्ष को उखाड़कर फेक दिया हो। राजा के मुख से बात नहीं निकल रही है मानो पहिना नामक मछली पानी के अभाव में तड़प रही हो।

 

 

 

जिनके प्रेम और संकोच (शील) के वश में होकर स्वयं (सच्चिदानंद धन) भगवान श्री राम आकर प्रकट हुए, जिन्हे महादेव जी अपने हृदय के नेत्र से देखते हुए कभी नहीं अघाते (तृप्त) होते है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- परन्तु उनसे भी बढ़कर तुमने कीर्ति रूपी चन्द्रमा को उत्पन्न किया, जिसमे श्री राम प्रेम हिरन के (चिन्ह) के रूप में बसता है। हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदय में ग्लानि कर रहे हो, पारस मिलने पर भी तुम दरिद्रता से डर रहे हो।

 

 

 

 

2- हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते, हम उदासीन है किसी का पक्ष नहीं लेते, तपस्वी है किसी की मुंह देखी बात नहीं कहते है। हम वन में रहते है किसी से कोई भी प्रयोजन नहीं रखते है। सब साधनो का उत्तम फल तो हमे, लक्ष्मण जी, सीता जी और श्री राम जी के दर्शन रूप में प्राप्त हुआ।

 

 

 

 

3- सीता-लक्ष्मण सहित श्री राम दर्शन रूप उस महान फल का परम फल तो यह तुम्हारा दर्शन है। प्रयाग राज समेत हमारा बड़ा ही भाग्य है। हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यश से इस जगत को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेम में मग्न हो गए।

 

 

 

 

4- भरद्वाज मुनि के वचन सुनकर सभासद हर्षित हो गए। साधु, साधु कहकर सराहना करते हुए देवताओ ने फूल बरसाए। आकाश में और प्रयाग राज में ‘धन्य, धन्य’ की ध्वनि सुनकर भरत जी प्रेम में मग्न हो गए।

 

 

 

210- दोहा का अर्थ-

 

 

 

 

भरत जी का शरीर पुलकित है, उनके हृदय में सीता राम जी है और उनके कमल के समान नेत्र प्रेमाश्रु के जल से भरे हुए है। वह मुनि की मंडली को प्रणाम करके गदगद वचन बोले।

 

 

 

 

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