Brahman Gotravali Pdf Hindi / ब्राह्मण गोत्रावली Pdf

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Brahman Gotravali Pdf / ब्राह्मण गोत्रावली पीडीएफ 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

नहीं तो विवाह न होने पर इनके दर्शन तो दुर्लभ ही है। हे सखी सुनो! यह संयोग तभी हो सकता है, जब हमारे पूर्व जन्मो के बहुत पुण्य हो।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- तभी दूसरी ने कहा – हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाह से तो सभी का परम हित है। किसी ने कहा – शंकर जी का धनु तो बहुत ही कठोर है और वह सांवले राजकुमार कोमल शरीर के बालक है।

 

 

 

 

2- हे सयानी! सब असमंजस ही है, यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणी से कहने लगी – हे सखी! इनके संबंध में कोई-कोई ऐसा कहते है कि यह तो देखने में ही छोटे है लेकिन इनका प्रभाव बहुत बड़ा है।

 

 

 

 

3- जिनके चरण कमलो की धूलि का स्पर्श पाकर अहल्या तर गई, जिसने बड़ा भारी पाप किया था, तो क्या वह शिव जी का धनुष बिना तोड़े ही रहेंगे, इस विश्वास को भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिए।

 

 

 

 

सभी बारातियो ने जब अपने ठहरने का स्थान देखा तो वहां सब प्रकार के देवताओ वाले सुख सुलभ थे। इस ऐश्वर्य को भेद को कोई भी नहीं जान सका, सभी लोग जनक जी की बड़ाई कर रहे थे।

 

 

 

 

2- श्री राम जी यह सब सीता की महिमा को जानकर और उनका प्रेम पहचानते हुए हृदय में हर्षित हुए। पिता दशरथ के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयो के हृदय में महान आनंद हुआ।

 

 

 

 

3- लेकिन विश्वामित्र जी से कहने में संकोच का अनुभव कर रहे थे। परन्तु मन में पिता जी के दर्शन की लालसा थी। दोनों भाइयो की नम्रता देखकर गुरु विश्वामित्र के हृदय में बहुत संतोष उत्पन्न हुआ।

 

 

 

 

4- प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयो को हृदय से लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्रों में प्रेम के आंसू भर गए। जहां दशरथ जी का जनवासा था वहां विश्वामित्र जी राम-लक्ष्मण को साथ लेकर चले, मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्षित होकर चला हो।

 

 

 

307- दोहा का अर्थ-

 

 

 

जब राजा दशरथ ने पुत्रो के साथ मुनि को आते हुए देखा तो वह उठे और सुख के समुद्र में थाह सी लाते हुए चले।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

1- पृथ्वीपति दशरथ जी ने मुनि विश्वामित्र जी के चरण रज अपने सिर पर रखते हुए उन्हें दंडवत प्रणाम किया। मुनि ने राजा दशरथ को उठाकर हृदय से लगाते हुए कुशल पूछी और आशीर्वाद दिया।

 

 

 

 

2- फिर दोनों भाइयो को दंडवत प्रणाम करते देखकर राजा को इतना सुख प्राप्त हुआ जो उनके हृदय में समाता ही नहीं था। पुत्रो को उठाकर उन्होंने हृदय से लगाते हुए अपने वियोग जनित दुःसह दुःख को मिटाया, मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गए हो।

 

 

 

 

3- फिर उन्होंने वशिष्ठ जी के चरणों में सिर नवाया, मुनि श्रेष्ठ ने प्रेम के आनंद में उन्हें हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयो ने बाह्मणो की वंदना करते हुए मनभावने आशीर्वाद पाए।

 

 

 

 

4- भरत जी ने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित श्री राम जी को प्रणाम किया, श्री राम जी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया, लक्ष्मण जी दोनों भाइयो को देखकर हर्षित हुए और प्रेम से पूरित शरीर से उनसे मिले।

 

 

 

 

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