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Biswaroop Roy Chowdhury Books Pdf / बिस्वरूप रॉय चौधरी बुक्स Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Biswaroop Roy Chowdhury Books Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Biswaroop Roy Chowdhury Books Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Dr. Bhimarao Ambedkar Biography Pdf Hindi Download कर सकते हैं।

 

 

 

Biswaroop Roy Chowdhury Books Pdf Download

 

 

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हॉस्पिटल से जिन्दा कैसे लौटे Pdf यहां से डाउनलोड करे।
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डाइनैमिक मेमोरी मेथड्स Pdf यहां से डाउनलोड करे।
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यह पुस्तक यहां से डाउनलोड करे।
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कहानी खत्म हो गयी नॉवेल Pdf यहां से डाउनलोड करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

द्विजो! जिन्होंने बाह्य अग्नि को विसर्जित करके अपने आत्मा में ही अग्नि का आरोप कर लिया है ऐसे वानप्रस्थियों और सन्यासियों के लिए यही हवन या अग्नि यज्ञ है। कि वे विहित समय पर परिमित, हितकर और पवित्र अन्न का भोजन कर ले। ब्राह्मणो! सायंकाल अग्नि के लिए दी हुई आहुति सम्पत्ति प्रदान करने वाली होती है।

 

 

 

 

ऐसा जानना चाहिए और प्रातःकाल सूर्य देव को दी हुई आहुति आयु की वृद्धि करने वाली होती है यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। दिन में अग्नि देव सूर्य में ही प्रविष्ट हो जाते है अतः प्रातःकाल सूर्य को दी हुई आहुति भी अग्नि यज्ञ के ही अंतर्गत है। इस प्रकार यह अग्नियज्ञ का वर्णन किया गया है।

 

 

 

 

इंद्र आदि समस्त देवताओ के उद्देश्य से अग्नि में जो आहुति दी जाती है उसे देव यज्ञ समझना चाहिए। स्थालीपाक आदि यज्ञो को देव यज्ञ ही मानना चाहिए। लौकिक अग्नि में प्रतिष्ठित चूड़ाकरण आदि संस्कार निमित्तक हवन कर्म है। उन्हें भी देव यज्ञ के ही अंतर्गत जानना चाहिए।

 

 

 

 

अब ब्रह्म यज्ञ का वर्णन सुनो। द्विज को चाहिए कि वह देवताओ की तृप्ति के लिए लगातार ब्रह्म यज्ञ करे। वेदो का जो नित्य अध्ययन या स्वाध्याय होता है उसी को ब्रह्म यज्ञ कहा गया है। प्रातः नित्य कर्म के अनन्तर सायं काल तक ब्रह्म यज्ञ किया जा सकता है। उसके बाद रात में इसका विधान नहीं है।

 

 

 

 

अग्नि के बिना देव यज्ञ कैसे सम्पन्न होता है इसे तुम लोग श्रद्धा से और आदरपूर्वक सुनो। सृष्टि के आरंभ में सर्वज्ञ, सर्व समर्थ और दयालु महादेव जी ने समस्त लोको के उपकार के लिए वारो की कल्पना की। वे भगवान शंकर संसार रूपी रोग को दूर करने के लिए वैद्य है। इसके ज्ञाता तथा समस्त औषधो के भी औषध है।

 

 

 

 

उन भगवान ने पहले अपने वार की कल्पना की जो आरोग्य प्रदान करने वाला है। जन्म काल में दुर्गति ग्रस्त बालक की रक्षा के लिए उन्होंने कुमार के वार की कल्पना की। तत्पश्चात सर्व समर्थ महादेव जी ने आलस्य और पाप की निवृत्ति तथा समस्त लोको का हित करने की इच्छा से लोक रक्षक भगवान विष्णु का वार बनाया।

 

 

 

 

इसके बाद सबके स्वामी भगवान शंकर ने पुष्टि और रक्षा के लिए आयुः कर्ता त्रिलोक स्रष्टा परमेष्ठी ब्रह्मा का आयुष्यकारक वार बनाया जिससे सम्पूर्ण जगत के आयुष्य की सिद्धि हो सके। इसके बाद तीनो लोको की वृद्धि के लिए पहले पुण्य पाप की रचना हो जाने पर उनके करने वाले लोगो की शुभाशुभ फल देने के लिए भगवान शंकर ने इंद्र और यम के वारो का निर्माण किया।

 

 

 

 

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