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Bhrigu Samhita PDF in Hindi / भृगु संहिता इन हिंदी डाउनलोड

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आज इस पोस्ट में हम आपको Bhrigu Samhita Pdf in hindi दे रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Bhrigu Samhita Book PDF Download  कर सकते हैं और आप Bhrigu Samhita pdf in hindi के बारे में विस्तार से जान सकते हैं।

 

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Bhrigu Samhita PDF in Hindi
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वृहत संहिता इन हिंदी Pdf
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Bhrigu Samhita PDF in Hindi / भृगु संहिता फ्री में डाउनलोड

 

 

 

 

 

 

 

भृगु संहिता क्या है ? इसके क्या उपयोग है ? इसे किसने लिखा है ? इन जैसे प्रश्नों के उत्तर आपको आज इस पोस्ट में मिल जायेंगे। आश्चर्य परन्तु एक सत्य है कि भृगु संहिता के माध्यम से आप कई जन्मों के राज और ज्योतिषि  के बारे में पूरी जानकारी पा सकते है। इस ग्रंथ के माध्यम से आप अपने पिछले जन्मों के बारे में जान सकते है।

 

 

 

 

पंजाब के होशियार पुर की ” भृगुवन दी गल्ली ” में 5000 साल पुरानी भृगु संहिता रखी हुई है। जो आपके अनेकों जन्म के बारे में बता देगी। इस पद्धति को Hindu Dharma के हिन्दू ज्योतिषी की सर्वाधिक रहस्यमय और कठिन शाखा माना जाता है। भृगु पद्धति तार्किक ना होकर दैवीय शक्ति और साधना पर आधारित है।

 

 

 

मेरठवाराणसीप्रतापगढ़मध्य प्रदेश के सागर, उड़ीसा के गंजम तथा राजस्थान के करोई में इस पद्धति से भविष्यवाणी करने वाले लोगों के परिवार है।

 

 

 

 

इस पद्धति में जातक के नाम, जन्म कुंडली के ग्रहों की स्थिति से और जातक के प्रश्न पूछने पर अंक तालिका से अंकों के चयन के आधार पर और जातक के हाथ की रेखाओं तथा जन्म कुंडली के ग्रहों की गणना के आधार पर भविष्यवाणी की जाती है। इसके द्वारा की गयी भविष्यवाणी अचूक होती है। भृगु संहिता की रचना महर्षि भृगु ने की थी। कहीं – कही इसे Bhrigu Shastra भी कहा जाता है।

 

 

 

भृगु संहिता से आप कुंडली के बारे में अच्छे से जान सकते हैं। भृगु संहिता एक बहुत वृहत ज्योतिष शास्त्र है। इसे महान ऋषि भृगु ने लिखा है।

 

 

 

अगर आप भृगुसाहिता के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो नीचे की लिंक से आप खरीद सकते हैं और पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं। 

 

 

 

भृगु संहिता के विषय में एक कथा प्रचलित है कि जब त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ कौन ? इसकी परीक्षा लेने के लिए महर्षि भृगु ने श्रीहरि के वक्षस्थल पर प्रहार किया तो पास बैठीं महालक्ष्मी ने महर्षि भृगु को श्राप दे दिया कि अब वह किसी ब्राह्मण के घर निवास नहीं करेंगी और ब्राह्मण सदैव ही गरीब और दरिद्र रहेंगे।

 

 

 

कहा जाता है कि उस समय महर्षि भृगु की रचना ” ज्योतिष संहिता ” अपने अंतिम चरण में थी, इसलिए महर्षि भृगु ने कहा, ” हे देवी, आपके श्राप को यह ग्रन्थ निरर्थक कर देगा।  ” 

 

 

 

इसपर देवी महालक्ष्मी ने कहा, ” हे ब्रह्मर्षि भृगु, आपके इस ग्रन्थ के फलादेश की सत्यता आधी रह जायेगी। ” यह सुनते ही महर्षि भृगु अत्यधिक क्रोधित हो गए और जैसे ही वे महालक्ष्मी को श्राप देने उठे, वैसे ही श्रीहरि ने महर्षि भृगु से कहा, ” हे महर्षि ! आप शांत हो।  आपको क्रोध शोभा नहीं देता है।  आप एक नए ग्रन्थ की रचना करें और इसके लिए मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ  ”

 

 

 

तब तक महालक्ष्मी का क्रोध शांत हो गया था और वह जान चुकी थीं कि महर्षि ने पद प्रहार परीक्षा लेने के लिए किया था और उसके बाद महर्षि भृगु ने जिस ग्रन्थ की रचना की वह ” Bhrigu Samhita ” के रूप में प्रसिद्द हुआ।

 

 

 

 

महर्षि भृगु के प्रसंग Bhrigu Samhita Pdf Free Download

 

 

 

एक बार महर्षि भृगु कई तपस्वियों के साथ मंदराचल पर्वत पर जन कल्याण के लिए यज्ञ कर रहे थे। सभी तपस्वियों के मध्य यह बहस छिड़ गई थी कि त्रिदेवो (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में कौन सबसे श्रेष्ठ है। सभी तपस्वियों ने भृगु जी को इसका निराकरण करने के लिए नियुक्त किया।

 

 

 

 

अब प्रथम बार में भृगु जी ब्रह्मलोक जा पहुंचे और ब्रह्माजी को ही झूठे ही कहने लगे, “आपने हमारा अपमान किया है।”

 

 

 

 

यह बात सुनकर ब्रह्माजी क्रोधित होकर कहने लगे, “भृगु तुम्हे अपने से बड़ो का सम्मान करना भी नहीं आता है क्या, तुम यहां आकर झूठी बात कह रहे हो।”

 

 

 

 

तब भृगु जी ने शांत होकर कहा, “क्षमा करे तात, मैं तो सिर्फ यह देखना चाहता था कि आप क्रोधित होते है या नहीं और हमारी बात सच साबित हो गई। आप क्रोधित हो गए। अब मैं यहां से जाता हूँ।”

 

 

 

 

इतना कहकर भृगु जी कैलाश पर्वत पर आ गए। उस समय शिव जी तपस्या कर रहे थे। द्वार पर नंदी पहरा दे रहा था। भृगु जी ने नंदी से कहा, “जाकर शिव जी से कहो, भृगु जी आए है।”

 

 

 

 

 

तब नंदी ने कहा, “इस समय शिव जी ध्यान में मग्न है, मैं उनका ध्यान भंग करने का साहस नहीं कर सकता ?”

 

 

 

 

भृगु जी ने कहा, “ठीक है। मैं खुद ही जाकर शिव से मिलता हूँ।”

 

 

 

 

भृगु जी वहां गए जहां शिव जी ध्यान लगाए बैठे थे। तब भृगु जी ने कहा, “आशुतोष आप तो जन कल्याण के लिए ध्यान में बैठे है कि अतिथि आगमन भी आपको नहीं मालूम पड़ता है।”

 

 

 

इतना सुनते ही शिव जी का ध्यान भंग हो गया और ध्यान भंग के स्वरूप शिव जी क्रोधित होकर भृगु को ‘भस्म’ करने का दंड देने जा रहे थे तब माता पार्वती बीच में आ गई और भृगु का बचाव किया।

 

 

 

तब भृगु जी ने कहा, “शिव जी मैं तो यह देखना चाहता था कि आप क्रोधित होते है या नही।”

 

 

 

 

तब शिव जी बोले, “क्रोध हमसे बिलग नहीं है।”

 

 

 

इतना सुनते ही भृगु जी अब विष्णु की परीक्षा लेने विष्णुलोक चले गए क्योंकि भृगु जी की परीक्षा में ब्रह्मा और शिव जी दोनों ही अनुत्तीर्ण थे।

 

 

 

 

विष्णु जी शेषनाग की शैया पर निद्रा में लींन थे। उसी समय भृगु जी वहां आए, विष्णु जी को निद्रा मग्न देखकर भृगु की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो गई।

 

 

 

 

उन्होंने बिना कुछ सोचे ही विष्णु के वक्षस्थल पर पर अपने चरण का जोरदार प्रहार किया। चरण प्रहार होते ही विष्णु जी की निद्रा भंग हुई तो देखा सामने मुनि श्रेष्ठ भृगु जी खड़े है।

 

 

 

 

तब विष्णु जी ने भृगु जी के चरण को पकड़कर कहने लगे, “हे मुनि श्रेष्ठ, आपके इन कोमल चरणों को व्यथित तो नहीं होना पड़ा क्योंकि हमारा वक्षस्थल बहुत ही कठोर है। और आपके चरण तो कमल के समान है। आपके चरणों को हमारे कठोर वक्षस्थल से व्यथित होना पड़ा है तो इसके लिए मैं ‘क्षमा’ प्रार्थी हूँ।”

 

 

 

 

इतना सुनते ही भृगु मुनि का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने त्रिदेवो में विष्णु जी को श्रेष्ठ होने का घोष कर दिया।

 

 

 

 

महर्षि भृगु कौन थे? Bhrigu Samhita PDF in Hindi 

 

 

 

महर्षि भृगु एक महान ऋषि थे और ब्रह्मदेव द्वारा निर्मित प्रजापति में से एक थे। इसलिए महर्षि भृगु को ब्रह्मदेव का “मानस पुत्र” भी कहा जाता है।

 

 

 

 

महर्षि भृगु के वंशजो को “भार्गव” कहा जाता है। महर्षि भृगु का विवाह राजा दक्ष की पुत्री ख्याति से हुआ था। महर्षि भृगु को सप्तर्षि का पद प्राप्त है।

 

 

 

 

महर्षि भृगु ने “भृगु संहिता” की रचना की और उन्होंने अपने गुरु मनु की रचना “मनु संहिता” को संचक्षित और संबर्धित किया। भृगु वैदिक ग्रंथो में बहुचर्चित ऋषि है और उन्हें वरुण का पुत्र कहा जाता है।

 

 

 

 

इसलिए “वारुणी” उपाधि धारण करते है। महर्षि च्यवन, उशना (शुक) महर्षि भृगु के पुत्र है। “भृगु संहिता” के अतिरिक्त भृगु ने “भृगु स्मृति, भृगु संहिता (शिल्प), भृगु सूत्र, भृगु उपनिषद, भृगु गीता” की रचना की।

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिये Bhrigu Samhita PDF in Hindi 

 

 

 

श्री कृष्ण कहते है – तुम्हे अपना कर्म करने (कर्तव्य) का अधिकार है किन्तु कर्म के फलो के तुम अधिकारी नहीं हो। तुम न तो कभी अपने आप को अपने कर्म के फलो का कारण मानो, न ही कर्म करने में कभी आसक्त होओ।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर तीन बातें विचारणीय है – कर्म (स्वधर्म) विकर्म तथा अकर्म। स्वधर्म वह कार्य है जिसका आदेश प्रकृति के गुणों के रूप में प्राप्त किया जाता है।

 

 

 

अतएव भगवान ने अर्जुन को फलासक्ति से रहित होकर कर्म (स्वधर्म) के रूप में युद्ध करने की आज्ञा दी है। उसका युद्ध से विमुख होना आसक्ति का दूसरा पहलू है।

 

 

 

 

ऐसी आसक्ति से कभी मुक्ति पथ की प्राप्ति नहीं हो पाती है। आसक्ति चाहे स्वीकारात्मक हो या निषेधात्मक वह सदैव बंधन का कारण बनता है। अकर्म पापमय होता है। अतः कर्तव्य के रूप में युद्ध करना ही अर्जुन के लिए मुक्ति का एकमात्र कल्याणकारी मार्ग था।

 

 

 

 

अधिकारी के सम्मति के बिना किए गए कर्म विकर्म कहलाते है और अकर्म का मतलब है अपने कर्मो को न करना। भगवान ने अर्जुन को उपदेश दिया कि वह निष्क्रिय न बने।

 

 

 

 

अपितु फल के प्रति आसक्त हुए बिना ही अपना कर्म करे। फल से युक्त कर्म ही बंधन का कारण बनते है अतः ऐसे कर्म अशुभ होते है। हर व्यक्ति को अपने कर्म पर अधिकार है किन्तु उसे फल से अनासक्त होकर ही कर्म करना चाहिए।

 

 

 

 

जहां तक निर्धारित कर्म का संबंध है इनकी तीन श्रेणियाँ हो सकती है यथा नित्यकर्म, आपातकालीन कर्म तथा इच्छित कर्म, नित्यकर्म की फल की इच्छा के बिना शास्त्रों के निर्देशानुसार सतोगुण में रहकर किए जाते है। निष्काम कर्म से निःसंदेह मुक्ति का मार्ग प्रसस्त हो जाता है।

 

 

 

 

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