Bhrigu Samhita PDF Hindi / भृगु संहिता पीडीएफ फ्री डाउनलोड

मित्रों इस पोस्ट में Bhrigu Samhita PDF Hindi दी जा रही है।  भृगु संहिता से किसी का भी भूत, भविष्य और वर्तमान जाना जा सकता है, लेकिन भृगु संहिता की सही जानकारी हर किसी के पास नहीं होती है।

 

 

 

भृगु संहिता को महर्षि भृगु ने लिखा है।  इसे ” ज्योतिष संहिता ” भी कहा जाता है। भृगु संहिता की उचित जानकारी होने पर मनुष्य किसी के बारे में कुछ भी बता सकता है। भृगु संहिता की रचना महर्षि भृगु जी ने भगवान विष्णु के आशीर्वाद से  की थी।

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

सर्वव्यापी, अधिकारी, स्थिर तथा एकरस (आत्मा) – श्री कृष्ण कहते है – यह आत्मा अखंडित तथा अघुलनशील है। इसे न तो जलाया जा सकता है न ही सुखाया जा सकता है। यह तो शाश्वत, सर्वव्यापी, अधिकारी, स्थिर तथा एक सा रहने वाला है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य –  सर्वगत शब्द महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कोई संसय नहीं है कि जीव भगवान की समग्र सृष्टि में फैले हुए है।

 

 

 

 

वह जल, थल, वायु, पृथ्वी के भीतर तथा अग्नि के भीतर भी रहते है, जो यह मानते है कि वह (जीव) अग्नि में स्वाहा हो जाता है वह ठीक नहीं है क्योंकि यहां कहा गया है कि आत्मा को अग्नि द्वारा जलाया नहीं जा सकता है। अतः इसमें संदेह नहीं है कि सूर्यलोक में भी उपयुक्त प्राणियों का निवास होता है। यदि सूर्यलोक निर्जन हो तो सर्वगत शब्द निरर्थक हो जाता है।

 

 

 

 

अणु आत्मा के इतने सारे गुण यही सिद्ध करते है कि आत्मा पूर्ण आत्मा का अणु अंश है और बिना किसी परिवर्तन के निरंतर उसी भांति बना रहता है।

 

 

 

 

भौतिक कल्मष से मुक्त होकर अणु आत्मा भगवान के तेज और उसकी किरणों की आध्यात्मिक स्फुलिंग बनकर  सकता है। किन्तु बुद्धिमान जीव तो भगवान की संगति करने के लिए बैकुंठ लोक में प्रवेश करता है। इस प्रसंग में अद्वैतवाद को व्यवहृत करना कठिन है।

 

 

 

 

 

25- शरीर के लिए शोक करना व्यर्थ – श्री कृष्ण कहते है – यह आत्मा शाश्वत, अकल्पनीय तथा अपरिवर्तनीय कहा जाता है। यह जानकर तुम्हे शरीर के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि आत्मा इतना सूक्ष्म है कि इसे सर्वाधिक शक्तिशाली, सूक्ष्मदर्शी यंत्र से भी नहीं देखा जा सकता है अतः यह अदृश्य है।

 

 

 

जहां तक आत्मा के अस्तित्व का संबंध है श्रुति के प्रमाण के अतिरिक्त अन्य किसी प्रयोग के द्वारा उसके (आत्मा) के अस्तित्व को सिद्ध नहीं किया जा सकता है। हमे अनेक बातें केवल उच्च प्रमाण के आधार पर ही माननी पड़ती है।

 

 

 

 

कोई भी अपनी माता के आधार पर अपने पिता के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं कर सकता है। पिता स्वरुप को जानने का साधन या प्रमाण एक मात्र माता है।

 

 

 

 

हमे इस सत्य को स्वीकार करना पड़ता है कि अनुभवगम्य सत्य होते हुए भी आत्मा के अस्तित्व को समझने के लिए कोई अन्य साधन या विकल्प उपलब्ध नहीं है।

 

 

 

 

इसी प्रकार से आत्मा को समझने के लिए वेदाध्ययन ही एकमात्र विकल्प है अन्य दूसरा साधन नहीं है। दूसरे शब्दों में आत्मा मानवीय व्यावहारिक ज्ञान द्वारा अकल्पनीय है।

 

 

 

 

आत्मा में शरीर के जैसा परिवर्तन नहीं होता है। मूलतः अधिकारी रहते हुए आत्मा अनंत परमात्मा की तुलना में अणु रूप है। आत्मा चेतना है और चेतन है। वेदो के इस कथन को हमे स्वीकार करना पड़ेगा।

 

 

 

 

परमात्मा अनंत है और आत्मा अति सूक्ष्म होता है। अतः अतिसूक्ष्म आत्मा अधिकारी होने के कारण अनंत आत्मा भगवान के तुल्य नहीं हो सकता है।

 

 

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