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Bharat ka Itihas Book Pdf Hindi / भारत का इतिहास Book Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Bharat ka Itihas Book Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Bharat ka Itihas Book Pdf Hindi Download कर सकते हैं और आप यहां से Adi Shankaracharya books in Hindi Pdf कर सकते हैं।

 

 

 

Bharat ka Itihas Book Pdf Hindi Download

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

मकार बोध्य सर्वव्यापी शिव बीजी है और उकार संज्ञक मुझ ब्रह्मा को बीज कहते है उकार नामधारी श्रीहरि योनि है। प्रधान और पुरुष के भी ईश्वर जो महेश्वर है वे बीजी बीज और योनि भी है। उन्ही को नाद कहा गया है। बीजी अपने इच्छा से ही अपने बीज को अनेक रूपों में विभक्त करके स्थित है।

 

 

 

 

इन बीजी भगवान महेश्वर के लिंग से अकाररूप बीज प्रकट हुआ जो उकार रूप योनि में स्थापित होकर सब ओर बढ़ने लगा। वह सुवर्णमय अंड के रूप में ही बताने योग्य था। उसका और कोई विशेष लक्षण नही लक्षित होता था। वह दिव्य अंड अनेक वर्षो तक जल में स्थित रहा।

 

 

 

 

तदनन्तर एक हजार वर्ष के बाद उस अंड के दो टुकड़े हो गए। जल में स्थित हुआ वह अंड अजन्मा ब्रह्मा जी की उत्पत्ति का स्थान था और साक्षात् महेश्वर के आघात से ही फूटकर दो भागो में बंट गया था। उस अवस्था में उसका ऊपर स्थित हुआ स्वर्णमय कपाल बड़ी शोभा पाने लगा।

 

 

 

 

वही द्युलोक के रूप में प्रकट हुआ तथा जो उसका दूसरा नीचे वाला कपाल था वही यह पांच लक्षणों से युक्त पृथ्वी है। उस अंड से चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए जिनकी ‘क’ संज्ञा है। वे समस्त लोको के स्रष्टा है। इस प्रकार वे भगवान महेश्वर ही ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ इन त्रिविधि रूपों में वर्णित हुए है।

 

 

 

 

इसी अभिप्राय से उन ज्योतिर्लिंग स्वरुप सदाशिव ने ओ३म ओ३म ऐसा कहा यह बात यजुर्वेद के श्रेष्ठ मंत्र कहते है। यजुर्वेद के श्रेष्ठ मंत्रो का यह कथन सुनकर ऋचाओं और साम मंत्रो ने भी हमसे आदरपूर्वक कहा – हे हरे! हे ब्रह्मन! यह बात ऐसी ही है।

 

 

 

 

इस तरह देवेश्वर शिव को जानकर श्री हरि ने शक्तिसंभूत मंत्रो द्वारा उत्तम एवं महान अभ्युदय से शोभित होने वाले उन महेश्वर देव का स्तवन किया। इसी बीच में मेरे साथ विश्वपालक भगवान विष्णु ने एक और अद्भुत एवं सुंदर रूप देखा। मुने! वह रूप पांच मुख्य और दस भुजाओ से अलंकृत था।

 

 

 

 

उसकी कांति कर्पूर के समान गौर थी। वह नाना प्रकार की छटाओं से छविमान और भांति-भांति के आभूषणों से विभूषित था। उस परम उदार महापराक्रमी और महापुरुष के लक्षणों से सम्पन्न अत्यंत उत्कृष्ट रूप का दर्शन करके मैं और श्रीहरि दोनों कृतार्थ हो गए।

 

 

 

 

तत्पश्चात महेश्वर भगवान महेश प्रसन्न हो अपने दिव्य शब्दमय रूप को प्रकट करके हँसते हुए खड़े हो गए। अकार उनका मस्तक और आकार ललाट है। इकार दाहिना और ईकार बायां नेत्र है। उकार को उनका दाहिना और ऊकार को बायां कान बताया जाता है।

 

 

 

 

ऋकार उन परमेश्वर का दायां कपोल है और ऋकार उनका बायां। लृ और लृ ये उनकी नासिका के दोनों छिद्र है। एकार उन सर्वव्यापी प्रभु का ऊपरी ओष्ठ है हुए ऐकार अधर। ओकार तथा औकार ये दोनों क्रमशः उनकी ऊपरी और नीचे की दो दंत पंक्तियाँ है।

 

 

 

 

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