Bhagwat Puran Pdf In Hindi / भागवत पुराण हिंदी PDF

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Bhagwat Puran Pdf In Hindi / श्रीमद् भागवत कथा हिंदी में Book Online

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान कहते है कि जीव दो प्रकार के है – च्युत तथा अच्युत। भौतिक जगत में प्रत्येक जीव च्युत (क्षर) होता है और आध्यात्मिक जगत में प्रत्येक जीव अच्युत (अक्षर) कहलाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – पहले ही बताया गया है कि भगवान अपने व्यासदेव के अवतार में ब्रह्मसूत्र का संकलन किया भगवान ने यहां पर वेदान्तसूत्र की विषय वस्तु का सार-संक्षेप दिया है।

 

 

 

 

भगवान कृष्ण के कथनानुसार जीव की दो श्रेणियाँ है इसके प्रमाण वेदो में भी मिलते है अतः इसमें संदेह करने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

 

 

 

 

सारे जीव इस संसार में संघर्षरत है। मन तथा पांच इन्द्रियों से युक्त उनका शरीर परिवर्तनशील है। आध्यात्मिक जगत में परिवर्तन नही होता है क्योंकि वहां पर आध्यात्मिक शरीर पदार्थ से नही बना रहता है।

 

 

 

 

जब तक जीव बद्ध रहता है उसका शरीर पदार्थ के संसर्ग से बदलता रहता है। चूँकि पदार्थ में बदलाव होते रहते है और पदार्थ के बदलने से जीव भी बदलते प्रतीत होते है।

 

 

 

 

भगवान का कहना है कि जीव जिनकी संख्या अनंत है उन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है। 1 च्युत (क्षर) 2 अच्युत (अक्षर) जीव भगवान के सनातन पृथक्कीकृत अंश (विभिन्नांश) है।

 

 

 

 

जब उनका संसर्ग इस भौतिक जगत से होता है तब उन्हें जीवभूत कहा जाता है। यहां पर क्षरः सर्वाणि भूतानि पद प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है कि जीव च्युत है।

 

 

 

 

 

इस भौतिक जगत में जीव छः परिवर्तनों से गुजरता है – जन्म, वृद्धि, अस्तित्व, प्रजनन, क्षय तथा विनाश। यह इस भौतिक शरीर के परिवर्तन है। लेकिन आध्यात्मिक जगत में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है। वहां जरा, जन्म, मृत्यु जैसा कुछ भी नहीं है।

 

 

 

 

वहां सब एकावस्था में रहते है। क्षरः सर्वाणि भूतानि – जो भी जीव, आदि जीव ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र जीव चींटी तक जो इस भौतिक प्रकृति के संसर्ग में आता है।

 

 

 

 

उसे अपना शरीर बदलना ही पड़ता है। अतः वह सब जीव क्षर तथा च्युत होते है – लेकिन आध्यात्मिक जगत में वह मुक्त जीव सदा एकावस्था में ही रहते है।

 

 

 

 

जिस जीव का परमेश्वर से एकत्व स्थापित हो जाता है वह अच्युत (अक्षर) कहलाता है। एकत्व का यह अर्थ नहीं है कि उनकी अपनी सत्ता नहीं है। बल्कि यहां पर एकत्व का अर्थ है कि दोनों में (जीव तथा परमात्मा में) भिन्नता नहीं है।

 

 

 

 

वह सब शृजन के प्रयोजन को मानते है। निःसंदेह ही आध्यात्मिक जगत में शृजन जैसी कोई वस्तु नहीं है। लेकिन चूँकि जैसा वेदांत सूत्र में कहा गया है कि आध्यात्मिक जगत में शृजन जैसी कोई वस्तु नहीं है।

 

 

 

 

 

लेकिन चूँकि जैसा वेदांत सूत्र में कहा गया है कि भगवान ही समस्त प्रकार के उद्भव के श्रोत है अतः यहां पर इसी विचार धारा की व्याख्या का वर्णन हुआ है।

 

 

 

 

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