Bhagwat Geeta In Hindi PDF Download / भगवद्गीता PDF फ्री डाउनलोड

Bhagwat Geeta In Hindi PDF मित्रों इस पोस्ट में  Bhagwat Geeta PDF के बारे में बताया गया है।  आप यहां से Bhagvad Gita in Hindi PDF Download कर सकते हैं।

 

 

 

Bhagwat Geeta In Hindi PDF भगवद्गीता PDF फ्री डाउनलोड

 

 

 

 

 

 

भागवत गीता हिंदी Pdf Free Download

 

 

 

प्रायः हिन्दू धर्म के विषय में अधिकांश लोगों की जानकारी नहीं के बराबर है। अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव के कारण ही कालकूटों का अपने धर्म ग्रंथों के विषय में सिर्फ इतना याद रहता है कि “पूजा गृह में कोई धर्म ग्रंथ है।” इसलिए गीता का महत्व और भी बढ़ जाता है और सभी मनुष्यों को गीता का पठन पाठन एक बार ही सही अवश्य ही करना चाहिए, ताकी उन्हें मानव होने की उपयोगिता समझ में आ जाये, क्योंकि ” भगवद्गीता ” में वह सब कुछ वर्णित है जो मानव जीवन के लिए उचित है, क्योंकि ” भगवद्गीता ” भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकला हुआ उच्चतम शब्द वाक्य है।

 

 

 

 

जो आज युवा है वह कल वृद्ध अवश्य होंगे। अगर आज की युवा पीढ़ी को अपने सद ग्रंथो के बारे में जानकारी नहीं होगी तो वह अपनी आने वाली भावी पीढ़ी को क्या बताएंगे। इसलिए अपने धर्म ग्रंथों के बारे में जानने का दायित्व आज की युवा पीढ़ी पर है।

 

 

 

 

श्री मद भगवद गीता ( Geeta Book in Hindi ) मानव जीवन के लिए अनमोल है क्योंकि इसमें जीवन से संबंध रखने वाली बातों को सविस्तार बताया गया है। यह जीवन को सही ढंग से यापन करने की विद्या का संकलन है। जो मानव को धर्म अधर्म के बारे में बताकर जीवन यापन की प्रेरणा देता है।

 

 

 

 

धर्म ग्रंथों की मान्यतानुसार 7000 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य गीता के उपदेश से उपदेशित किया था।

 

 

 

 

 

आलोचकों द्वारा ‘भगवद्गीता यथा रूप’ की प्रशंसा करना 

 

 

 

विश्व में कोई भी महान ग्रंथ हो या महान कार्य आलोचकों के द्वारा उन ग्रंथो या कार्यो पर अवश्य ही ऊँगली उठाई जाती है, लेकिन जैसा कि दर्पण खुद राज खोल देता है यथा अपने सम्मुख खड़े व्यक्ति को उसकी कमी बता देता है।

 

 

 

तब वह व्यक्ति या आलोचक भी उस ग्रंथ या कार्य की प्रशंसा किए बिना नहीं रहता है। यो कहे कि आलोचकों को उस महान ग्रंथ या कार्य की प्रशंसा अवश्य ही करनी पड़ती है।

 

 

 

उसी तरह डा. थामस एच. हापकिंस भी गीता के विषय में अपने विचार व्यक्त किए बिना नहीं रह सके ? डा. थामस एच हापकिंस के विचार से ‘इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि यह संस्करण गीता तथा भक्ति के विषय में प्राप्त समस्त ग्रंथो में सर्वश्रेष्ठ है। प्रभुपाद द्वारा किया गया यह अनुवाद शाब्दिक यथार्थता तथा धार्मिक अंतर्दृष्टि का आदर्श मिश्रण है।’

 

डा. थामस एच हापकिंस

अध्यक्ष धार्मिक विभाग

फ्रेंकलिन तथा मार्शल कालेज

 

 

 

गीता के विषय में थामस मर्टन के विचार – “गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। प्रस्तुत अनुवाद तथा टीका गीता चिरस्थायित्व की अन्य अभिव्यक्ति है। स्वामी भक्ति वेदांत पाश्चात्य जगत को स्मरण दिलाते है कि हमारी अत्यधिक क्रियाशील तथा एकांगी संस्कृति के समक्ष ऐसा संकट उपस्थित है जिससे आत्मविनाश हो सकता है क्योंकि इसमें मौलिक आध्यात्मिक चेतना की गहराई का अभाव है। ऐसी गहराई के बिना हमारे चारित्रिक तथा राजनितिक विरोध शब्दजाल बनकर रह जाते है।”

 

 

थामस मर्टन

लेट कैथालिक थियोलॉजियन मंडल लेखक 

 

 

 

गीता के विषय में डा. गेड्डीज मैकग्रेगर के विचार – “पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रंथ इतना अधिक उद्धरित नहीं होता जितना कि भगवद्गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय है। ऐसे ग्रंथ के अनुवाद के लिए न केवल संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है, अपितु विषय वस्तु के प्रति आंतरिक सहानुभूति तथा शब्दचातुरी भी चाहिए। श्रील भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद निश्चित रूप से विषय वस्तु के प्रति अतीव सहानुभूति पूर्ण है। उन्होंने भक्ति परंपरा को एक नवीन तार्किक शक्ति प्रदान की है। इस भारतीय महाकाव्य को नया अर्थ प्रदान करके स्वामी जी ने विद्यार्थियों के लिए असली सेवा कार्य किया है। उन्होंने जो श्रम किया है उसके लिए हमे उनका कृतज्ञ होना चाहिए।”

 

 

डा. गेड्डीज मैकग्रेगर

दर्शन के विख्यात प्रतिष्ठित प्रोफेसर

दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय

 

 

 

भगवद्गीता की पृष्ठभूमि Bhagwat Gita Pdf

 

 

 

यद्यपि भगवद्गीता का व्यापक पठन पाठन होता रहा है किन्तु मूलतः यह संस्कृत महाकाव्य महाभारत की एक घटना रूप में प्राप्त है। महाभारत में वर्तमान कलयुग तक की घटनाओ का विवरण मिलता है। इसी युग के प्रारंभ में आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने अपने मित्र तथा भक्त अर्जुन को भगवद्गीता सुनाई थी।

 

 

 

 

उनकी यह वार्ता जो मानव इतिहास की सबसे महान दार्शनिक तथा धार्मिक वार्ता है। उस महायुद्ध के शुभारंभ के पूर्व हुई, जो धृतराष्ट्र के सौ पुत्रो तथा उनके चचेरे भाई पांडवो के मध्य होने वाला था।

 

 

 

कृष्ण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं अपितु साक्षात् पर ईश्वर है जिन्होंने इन धरा-धाम में अवतार लिया था और अब एक राजकुमार की भूमिका निभा रहे थे। वे पाण्डु की पत्नी कुंती या पृथा के भतीजे थे। इस तरह संबंधी के रूप में तथा धर्म के पालक होने के कारण वे पाण्डु पुत्रों का पक्ष लेते रहे और उनकी रक्षा करते रहे।

 

 

 

 

धृतराष्ट्र तथा पाण्डु भाई-भाई थे। जिनका जन्म कुरुवंश में हुआ था, जो राजा भरत के वंशज थे, जिनके नाम पर ही महाभारत नाम पड़ा। धृतराष्ट्र जन्मांध था इसलिए धृतराष्ट्र के छोटे भाई पाण्डु को राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त हुआ था।

 

 

 

 

पाण्डु के पांच पुत्रो को जिनके नाम युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव थे, उन्हें जन्मांध धृतराष्ट्र की देख-रेख में रखा गया था कारण कि पाण्डु की अल्पायु में मृत्यु हो गयी थी। उस समय कुछ कालावधि के लिए जन्मांध धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का राजा बना दिया गया था। पाण्डु और धृतराष्ट्र के पुत्रो की परवरिश एक साथ ही हुई थी। सैन्य कला का प्रशिक्षण गुरु द्रोण के द्वारा पाण्डु पुत्रों और धृतराष्ट्र के पुत्रो को समान रूप से दिया गया था और पूज्य पितामह भीष्म उन्हें सलाह देते रहते थे।

 

 

 

लेकिन धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र दुर्योधन पाण्डु के पुत्रो से सदैव ही घृणा करता था और सदैव ही ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता था। धृतराष्ट्र अपने पुत्रो को राज्य का उत्तराधिकार देना चाहता था। धृतराष्ट्र के परामर्श से ही दुर्योधन ने पांडवो को मार डालने का षडयंत्र रचा था, लेकिन पांडव अपने चाचा विदुर और ममेरे भाई कृष्ण की संरक्षण में रहने के कारण अपने प्राणो की रक्षा करते थे।

 

 

 

 

अपने प्रयास में विफल होने के कारण दुर्योधन ने पांडवो को द्यूत (जुआ) क्रीड़ा के लिए ललकारा, उस निर्णायक स्पर्धा में दुर्योधन और उसके भाइयो ने छल से पांडवो की सती पत्नी द्रोपदी पर अधिकार प्राप्त कर लिया और सभी राजाओ के समक्ष उसका चीर हरण करके उसे अपमानित करने का बहुत ही घिनौना प्रयास किया, लेकिन श्री कृष्ण के दैवी हस्तक्षेप से उसकी मर्यादा की रक्षा हो सकी, लेकिन द्यूत क्रीड़ा में परास्त होने के कारण पांडव अपने राज्य से वंचित रह गए थे और उन्हें तेरह वर्ष तक वनवास झेलना पड़ा।

 

 

 

 

वनवास से लौटने पर पांडवो ने दुर्योधन से अपने राज्य की मांग की लेकिन दुर्योधन के मना करने पर पांडवो ने उससे अपने लिए केवल पांच गावो की मांग किया, लेकिन दुर्योधन सुई की नोक भर जगह देने के लिए तैयार नहीं था।

 

 

 

अभी तक पांडव सहनशील बने रहे, लेकिन अब उनके लिए युद्ध अनिवार्य हो गया था। अत्यंत सचरित्र पाण्डु पुत्रो ने श्री कृष्ण को भगवान के रूप में पहचान लिया था लेकिन दुष्टात्मा कौरव उन्हें नहीं पहचान सके और श्री कृष्ण को एक साधारण मनुष्य समझकर ही व्यवहार करते रहे। फिर भी श्री कृष्ण ने विपक्षियों की इच्छानुसार ही युद्ध में सम्मिलित होने का प्रस्ताव रखा था। ईश्वर के रूप में श्री कृष्ण युद्ध नहीं कर सकते थे। किन्तु जो भी उनकी सेवा का उपयोग करना चाहे कर सकता था। दुर्योधन एक कुशल राजनीतिज्ञ की भांति उनकी सेना को झपट लिया जबकि पांडवो ने श्री कृष्ण को ले लिया था।

 

 

 

 

 

विश्वभर में राजकुमारों और राजाओ में कुछ अनाचारी दुर्योधन के पक्ष में गए और कुछ सदाचारी पांडवो के पक्ष में गए थे। उस समय श्री कृष्ण पांडव पक्ष की तरफ से शांति का प्रस्ताव लेकर संदेश वाहक के रूप में गए, लेकिन धृतराष्ट्र के दरबार में उनका शांति संदेश स्वीकार नहीं किया गया, अतः युद्ध निश्चित था।

 

 

 

 

इस तरह श्री कृष्ण सारथी बने और उस सुप्रसिद्ध धनुर्धर का रथ हांकना स्वीकार किया। इस तरह हम इस बिंदु तक पहुंच जाते है जहां से भगवद्गीता का शुभारंभ होता है। —-

 

 

 

दोनों ओर की सेनाए तैयार खड़ी है। धृतराष्ट्र अपने सचिव संजय से पूछ रहा है कि सेनाओ ने क्या किया ? इस तरह सारी पृष्ठभूमि तैयार है। आवश्यकता है केवल इस अनुवाद तथा भाष्य के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी की।

 

 

 

भगवद्गीता के अंग्रेजी अनुवादको में यह सामान्य प्रवृत्ति पाई जाती है कि वे अपनी विचारधारा और दर्शन को स्थान देने के लिए श्री कृष्ण को महत्व नहीं देते है। वे महाभारत को पौराणिक कथा मानकर कृष्ण को निमित्त बनाते है, किसी अज्ञात प्रतिभाशाली व्यक्ति के विचारो को पद्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए या फिर ज्यादा से ज्यादा कृष्ण को एक गौण ऐतिहासिक पुरुष बना दिया जाता है। जैसा कि गीता स्वयं अपने विषय में स्पष्ट करती है।

 

 

 

 

अतः यह अनुवाद इसी के साथ दिया हुआ भाष्य पाठक को कृष्ण की ओर इंगित और निर्देशित करता है। न कि कृष्ण से दूर ले जाता है। इस दृष्टि से भगवद्गीता यथा रूप अनुपम है। साथ ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस तरह यह पूर्णतया ग्राह्य तथा संगत बन जाती है। चूंकि गीता के वक्ता और उसी के साथ चरम लक्ष्य भी स्वयं कृष्ण है। अतएव यही एक मात्र ऐसा अनुवाद है, जो इस महान शास्त्र को सही रूप से प्रस्तुत करता है।

 

 

 

गीता सार Bhagavad Gita as it is in Hindi Pdf

 

 

 

श्री कृष्ण कहते है – यह आध्यात्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता है। यदि कोई जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह से स्थित हो तो वह भगवद्धाम में प्रवेश कर सकता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मनुष्य कृष्ण भावनामृत या दिव्य जीवन को एक क्षण में प्राप्त कर सकता है और हो सकता है लाखो जन्मो के बाद भी प्राप्त न हो। यह तो सत्य को समझने और स्वीकार करने की बात है। खटवांग महाराज ने अपनी मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व ही कृष्ण के शरणांगत होकर ऐसी जीवन अवस्था प्राप्त कर ली थी। निर्वाण का अर्थ है – भौतिकतावादी जीवन शैली का अंत। इस जीवन अंत होने से पूर्व कोई कृष्ण भावना भावित हो जाता है तब उसे तुरंत ही ब्रह्म-निर्माण अवस्था प्राप्त हो जाती है। भगवद्धाम और भगवद्भक्ति के बीच कोई भी अंतर नहीं होता है।

 

 

 

जीवन दर्शन के अनुसार इस भौतिक जीवन के पूरा होने पर केवल शून्य ही शेष रहता है। किन्तु भगवद्गीता की शिक्षा इससे भिन्न शिक्षा प्रदान करती है। वास्तविक जीवन का शुभारंभ इस भौतिक जीवन के पूरा होने के बाद ही शुरू होता है। स्थूल भौतिकतावादी के लिए यह जानना पर्याप्त होगा कि इस भौतिक जीवन का अंत निश्चित है। किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नतशील व्यक्तियों के लिए इस जीवन के बाद ही अन्य जीवन प्रारंभ होता है।

 

 

 

भगवद्धाम और भगवद्भक्ति दोनों ही परम पद है अतः भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहने का अर्थ है – भगवद्धाम को प्राप्त करना। भौतिक जगत में इन्द्रिय विषयक कार्य होते है और आध्यात्मिक जगत में कृष्ण भावनामृत विषयक कार्य को प्राथमिकता प्रदान की जाती है। इसी जीवन में ही कृष्ण भावनामृत की प्राप्ति तत्काल ब्रह्म प्राप्ति जैसी है और जो भी कृष्ण भावनामृत में स्थित होता है वह निश्चित ही पहले से ही भगवद्धाम में प्रवेश कर चुका होता है।

 

 

 

भगवद्गीता में भगवद्भक्ति को मुक्त अवस्था माना गया है। (सगुणान्समती त्यैतान ब्रह्म भूयाय कल्पते) ब्रह्म और भौतिक पदार्थ दोनों एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते है। अतः ब्राह्मी स्थिति का अर्थ है – “भौतिक कार्यो के पद पर न होना” अतः ब्राह्मी स्थिति भौतिक कार्यो से मुक्ति है।

 

 

 

 

स्थिर मन के बिना शांति की संभावना नहीं – श्री कृष्ण कहते है – जो कृष्ण भावनामृत में स्थिर हुए बिना शान्ति की कोई भी संभावना नगण्य रहती है। मनुष्य को कृष्ण भावना भावित होना ही पड़ेगा जिससे वह परम शांति प्राप्त सके। अतः पांचवे अध्याय में (5. 29) इसकी पुष्टि की गई है कि जब मनुष्य यह समझ लेता है कि कृष्ण ही यज्ञ तथा तपस्या के एकमात्र उत्तम फलो के भोक्ता है और समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी है तथा वही समस्त जीवो के असली मित्र है तभी उसे वास्तविक शांति मिल सकती है।

 

 

 

 

मन की चंचलता का एकमात्र कारण अंतिम लक्ष्य का अभाव है अतः मनुष्य (जीव) को अपने परम लक्ष्य (श्री कृष्ण) पर ही ध्यान देने से उसका कल्याण संभव है। अतएव गौर करने वाला तथ्य यह है कि जो कृष्ण से संबंधित न होकर एक मात्र अपने कार्य सिद्धि में लगा रहता है वह निश्चय ही दुखी और सदा ही अशांत रहता है। भले ही वह जीवन में आध्यात्मिकता और शांति की उन्नति का कितना भी दिखावा क्यों न करे। कृष्ण भावनामृत स्वयं ही प्रकट होने वाली शांतिमयी अवस्था है। जिसकी प्राप्ति कृष्ण के संबंध से ही संभव है।

 

 

 

 

67- विचरणशील इन्द्रिया – बुद्धि हरण का कारण -श्री कृष्ण कहते है – जिस प्रकार पानी में तैरती नाव को प्रचंड वायु दूर बहा ले जाती है। उसी प्रकार विचरणशील इन्द्रियों में से कोई एक जिसपर मन निरंतर लगा रहता है मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यदि समस्त इन्द्रिया भगवान की सेवा में न लगी रहे (जैसा कि महाराज अम्बरीष के जीवन में बताया गया है।) इनमे से एक भी अपनी तृप्ति में लगी रहती है तो भक्त को दिव्य प्रगति पथ से विपथ कर सकती है। अतः समस्त इन्द्रियों को कृष्ण भावनामृत में लगा रहना ही चाहिए क्योंकि मन को वश में करने की यही सही एवं सरलतम विधि है।

 

 

 

 

68- विषयो से विरत इन्द्रिया – स्थिर बुद्धि – श्री कृष्ण कहते है – अतः हे महाबाहु ! जिस पुरुष की इन्द्रिया अपने-अपने विषयो से सब प्रकार से विरत होकर उसके वश में है उसी की बुद्धि निःसंदेह स्थिर है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावनामृत के द्वारा या सारी इन्द्रियों को भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगाकर इन्द्रिय तृप्ति की बलवती शक्तियों को दमित किया जा सकता है। जो व्यक्ति यह हृदयंगम कर लेता है कि कृष्ण भावनामृत के द्वारा बुद्धि स्थिर होती है और इस कला का अभ्यास प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में करता है वह साधक अथवा मोक्ष का अधिकारी कहलाता है। जिस प्रकार शत्रुओ का दमन श्रेष्ठ सेना द्वारा किया जाता है उसी प्रकार इन्द्रियों का दमन किसी मानवीय प्रयासों के द्वारा नहीं अपितु उन्हें भगवान की सेवा में लगाए रखकर किया जा सकता है।

 

 

 

 

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