Bhagwat Geeta Hindi Pdf / भागवत गीता पीडीएफ फ्री डाउनलोड

मित्रों इस पोस्ट में हम आपको Bhagwat Geeta Hindi Pdf दे रहे हैं। आप यहां से Bhagwat Gita Hindi Pdf Download कर सकते हैं।

 

 

 

 

Bhagwat Geeta Hindi Pdf / गीता सार इन हिंदी पीडीएफ Download

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये

 

 

 

योग के लिए प्रयत्न करना चाहिए – श्री कृष्ण कहते है – भक्ति में संलग्न मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे तथा बुरे कर्मो से अपने को मुक्त कर लेता है। अतः योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य कौशल ही है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवद्गीता के उपदेश से पूर्ण रूप से भगवान श्री कृष्ण के शरण में जाने तथा जन्म जन्मांतर से कर्म फल की श्रृंखला का शिकार बनने से मुक्त होने का मार्ग दिखाती है। अतः अर्जुन को कृष्णभावनामृत में कार्य करने के लिए कहा गया है क्योंकि कर्मफल से शुद्ध होने की यही प्रक्रिया है। बिना इसके कर्मफल से मुक्त नहीं हुआ जा सकता।

 

 

 

 

जीवात्मा अनादि काल से अपने अच्छे तथा बुरे कर्म के फल को संचित करता चला आ रहा है। फलस्वरूप वह अपने स्वरुप से अनभिज्ञ बना हुआ है। इस अज्ञान को भगवद्गीता के उपदेश से दूर किया जा सकता है क्योंकि मनुष्य के जीवन का कठिनतम मार्ग भगवद्गीता के उपदेश को ग्रहण करने से सरल और सहज हो सकता है।

 

 

 

 

 

5- भगवद्भक्ति में लग्न (कर्मफल से मुक्ति) – श्री कृष्ण कहते है – इस तरह से भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि अथवा भक्तगण अपने आप को इस भौतिक संसार में कर्म के फलो से मुक्त कर लेते है। इस प्रकार से वह जन्म मृत्यु के चक्र से छूट जाते है और भगवान के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते है जो समस्त दुखो से परे है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अज्ञान के वशीभूत होकर ही मनुष्य यह समझने में सफल नहीं होता कि यह भौतिक जगत ऐसा दुखमय स्थान है जहां पग-पग पर संकट है। केवल अल्पज्ञानी पुरुष ही यह सोचते है कि कर्मो के द्वारा ही सुखी रह सकते है। सकाम कर्म करते हुए स्थिति को सहन करते रहते है। संसार में सर्वत्र ही जीवन के दुःख- जन्म, मरण, जरा, व्याधि विद्यमान है। अज्ञानी मनुष्यो को ज्ञात नहीं है कि इस संसार में कही भी कोई भी शरीर दुखो से रहित नहीं है।

 

 

 

 

अपने स्वरुप को जानने का अर्थ है कि भगवान की अलौकिक स्थिति को भी जान लेना। जो भ्रम वश यह सोचता है कि जीव की स्थिति तथा भगवान की स्थिति एक समान है। ऐसे पुरुष अंधकार में रहते है और भगवद्भक्ति कदापि नहीं करते है या भगवद्भक्ति करने में असमर्थ है। किन्तु जो अपने वास्तविक स्वरुप को समझ लेता है इस प्रकार वह भगवान की स्थिति को समझ लेता है, वही व्यक्ति भगवान की प्रेमाभक्ति में आसक्त होता है। अतः फलस्वरूप वह बैकुंठ जाने का अधिकारी बन जाता है जहां न तो भौतिक कष्टमय जीवन है न ही काल का प्रभाव तथा मृत्यु है।

 

 

 

 

जो भगवान की भक्ति नहीं करता है या भगवद्गीता में असमर्थ है वह अंधकार में ही रहता है और ऐसा व्यक्ति अपने आप को प्रभु मान लेता है और इस तरह से वह जन्म मृत्यु का पथ स्वयं चुन लेता है। किन्तु जो यह समझते हुए कि उसकी स्थिति सेवक की है अपने आपको भगवान की सेवा में लगा देता है। वह तुरंत ही बैकुंठ जाने का अधिकारी बन जाता है। भगवान की सेवा कर्मयोग या बुद्धियोग कहलाती है जिसे स्पष्ट शब्दों में भगवद्भक्ति कहते है।

 

 

 

 

मुक्त जीवो का संबंध उस स्थान से होता है जहां भौतिक कष्ट नही होते है। भागवत में (10, 14, 58) कहा गया है – “जिसने उन भगवान के चरण कमल रूपी नाव को ग्रहण कर लिया है जो इस भौतिक दृश्य जगत के आश्रय है और मुकुंद नाम से विख्यात है अर्थात मुक्ति के दाता है उसके लिए यह भवसागर गोखुर में समाए जल के समान है। उसका लक्ष्य तो परं पद्म है अर्थात वह स्थान जहां भौतिक कष्ट नहीं है या कि बैकुंठ है। वह स्थान नहीं कि जहां पग-पग पर संकट व्याप्त है।”

 

 

 

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