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Bhagat Singh Ke Sampurn Dastavej Pdf Free Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Bhagat Singh Ke Sampurn Dastavej Pdf के बारे में बताने जा रहे है। आप नीचे की लिंक से भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज pdf Free Download कर सकते हैं।

 

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Bhagat Singh Ke Sampurn Dastavej Pdf

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

इन दो श्लोको में आधुनिक दार्शनिक को अवसर प्रदान करते है क्योंकि यहां पर स्पष्ट है कि परमेश्वर जीवात्मा से भिन्न है। इस अध्याय के इन चार महत्वपूर्ण श्लोको को सुनकर अर्जुन की सारी शंका समाप्त हो गई और उसने कृष्ण को भगवान स्वीकार कर लिया।

 

 

 

उसने तुरंत ही उद्घोष किया, “आप परम ब्रह्म है, ” कृष्ण भगवान है और मनुष्य को चाहिए कि वह निरंतर ही उनका ध्यान करते हुए उनसे दिव्य संबंध स्थापित करे।

 

 

 

वह परम अस्तित्व है। वह समस्त शारीरिक आवश्यकताओं तथा जन्म-मरण से सदैव ही मुक्त रहते है। इसकी पुष्टि अर्जुन ही नहीं, अपितु सारे वेद पुराण इतिहास ग्रंथ करते है।

 

 

 

इसके पूर्व कृष्ण कह चुके है कि वह प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक प्राणी के आदि कारण स्वरुप है। प्रत्येक देवता तथा प्रत्येक मनुष्य उनपर ही आश्रित है।

 

 

 

वह अज्ञान के वशीभूत होकर ही अपने को भगवान से परम स्वतंत्र मानते है और ऐसा अज्ञान भक्ति करने से ही पूरी तरह मिट जाता है, भगवान ने पिछले श्लोक में पूरी तरह से इसकी व्याख्या किया है। अब भगवत्कृपा से अर्जुन उन्हें परम सत्य के रूप में स्वीकार कर रहा है। जो वैदिक आदेशों के सर्वथा अनुरूप है।

 

 

 

केन उपनिषद में कहा गया है कि परम ब्रह्म प्रत्येक वस्तु के आश्रय है और  ही कह चुके है कि सारी वस्तुए उन्ही पर आश्रित है। सारे वैदिक साहित्य में कृष्ण का ऐसा वर्णन मिलता है और भगवान स्वयं भी चौथे अध्याय में कहते है “यद्यपि मैं अजन्मा हूँ” किन्तु मैं धर्म की स्थापना के लिए ही इस पृथ्वी पर प्रकट होता हूँ।”

 

 

 

इन दो श्लोको में अर्जुन जो भी कहता है, उसकी पुष्टि वैदिक सत्य के द्वारा होती है। वैदिक आदेश इसकी पुष्टि करते है कि जो कोई परमेश्वर की भक्ति करता है वही उन्हें भली-भांति समझ सकता है अन्य कोई भी नहीं।

 

 

 

इन श्लोको में अर्जुन द्वारा कहे शब्द वैदिक आदेशों द्वारा पुष्ट होते है। ऐसा नहीं कि परम सखा होने के कारण ही अर्जुन कृष्ण का चाटुकारी करते हुए उन्हें परम सत्य भगवान कह रहा है।

 

 

 

वह (कृष्ण) परम पुरुष है, उनका कोई कारण नहीं है क्योंकि वही समस्त कारणों के कारण है और सब कुछ उन्ही से उद्भूत है और ऐसा पूर्ण ज्ञान केवल भगवत्कृपा से ही प्राप्त होता है।

 

 

 

मुंडक उपनिषद में पुष्टि की गई है कि जिन परमेश्वर पर सब कुछ आश्रित है। उन्हें उनके चिंतन में रत रहकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

 

 

 

कृष्ण का यह निरंतर चिंतन ही स्मरणम है, जो नव विधियों में से एक है। भक्ति के द्वारा ही मनुष्य कृष्ण की स्थिति को समझ सकता है और इस भौतिक देह से छुटकारा पा सकता है।

 

 

 

उसी पल नीली कोठी से रचना निकल कर आ गयी और कुत्ते की मरहम पट्टी करने लगी। कुछ उम्रदराज लोग भी उस नीली कोठी से निकल आये थे जो कह रहे थे कि कितनी बार कहा कि शेरू को इस समय मत छोड़ा करो क्योंकि इस  समय सड़क पर चलने वालो की संख्या अधिक होती है?

 

 

 

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