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Bhagat Singh Jail Diary Hindi Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Bhagat Singh Jail Diary Hindi Pdf देने जा रहे हैं। आप नीचे की लिंक से भगत सिंह जेल डायरी हिंदी पीडीएफ फ्री डाउनलोड कर सकते हैं और आप यहां से भगत सिंह बुक्स पीडीएफ फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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Bhagat Singh Jail Diary Hindi Pdf Free / भगत सिंह जेल डायरी हिंदी पीडीएफ Download

 

 

 

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भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज pdf
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मैं नास्तिक क्यों हूँ भगत सिंह pdf download
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भारत के महान सपूत भगत सिंह की शहीदी के बाद उनकी जेल डायरी को उनके पिता सरदार किशन सिंह को सौंप दिया गया।

 

 

 

सरदार किशन सिंह की मृत्यु के बाद यह सब सामान उनके एक बेटे कुलबीर सिंह के पास रखा गया और उनकी मृत्यु के बाद सारा सामान उनके पुत्र बाबर सिंह को दिया गया।

 

 

 

 

आप भगत सिंह की जेल डायरी ऊपर की लिंक से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं और भगत सिंह जी के विचारों को अच्छे से समझ सकते हैं।

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

भगवान कहते है – बुद्धि, ज्ञान, संसय तथा मोह से मुक्ति, क्षमा भाव, सत्यता, इन्द्रिय निग्रह, मन निग्रह, सुख तथा दुःख, जन्म-मृत्यु, भय-अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश तथा अपयश जीवो के ये विभिन्न गुण मेरे द्वारा ही उत्पन्न है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – बुद्धि का अर्थ है नीर, क्षीर, विवेक करने वाली शक्ति और ज्ञान का अर्थ है आत्मा तथा पदार्थ को जान लेना।

 

 

 

आधुनिक शिक्षा में आत्मा के विषय में कोई ज्ञान नहीं केवल भौतिक तत्वों तथा शारीरिक आवश्यकताओ पर ही ध्यान दिया जाता है। ज्ञान का अर्थ है – आत्मा तथा भौतिक पदार्थ के अंतर को जानना। फलस्वरूप शैक्षिक ज्ञान पूर्ण नहीं होता है। वह ज्ञान अपूर्ण रहता है।

 

 

 

 

भव अर्थात जन्म का संबंध शरीर से है। जहां तक आत्मा का प्रश्न है वह न तो उत्पन्न होता है न मरता है। इसकी व्याख्या हम भगवद्गीता के प्रारंभ में ही कर चुके है।

 

 

 

 

कृष्ण भावनामृत में रहने वाला व्यक्ति कभी भयभीत नहीं होता है क्योंकि वह अपने कर्मो के द्वारा भगवद्धाम जाने के प्रति आश्वस्त रहता है।

 

 

 

 

जन्म तथा मृत्यु का संबंध इस भौतिक जगत में शरीर धारण करने से है। भय तो भविष्य की चिंता से उद्भूत है। अन्य लोगो को अपने भविष्य के विषय में कुछ भी नहीं मालूम रहता है कि अगले जीवन में क्या होगा। इसके फलस्वरूप वह चिंताग्रस्त रहते है।

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत में (11,2,37) कहा गया है – भयं द्वितीया भीनिवेशतः स्यात – भय तो हमारे माया पास में फस जाने से उत्पन्न होता है। अभयम तभी संभव है जब कृष्ण भावनामृत में रहा जाय।

 

 

 

 

यदि हम चिंता मुक्त होना चाहते है तो सर्वोत्तम उपाय यह है कि हम कृष्ण को जाने तथा कृष्ण भावनामृत में निरंतर स्थित रहे। इस प्रकार से हम समस्त प्रकार के भय से मुक्त रहेंगे और ऐसे मनुष्यो का जीवन उज्जवल रहता है।

 

 

 

 

जो माया के जाल से मुक्त रहता है। जो आश्वस्त रहता है कि वह शरीर नहीं है अपितु भगवान के आध्यात्मिक अंश है। तथा भगवद्भक्ति में लगे हुए है उन्हें भी भय नहीं रहता है उनका भविष्य सदा ही उज्जवल रहता है। यह भय तो उन व्यक्तियों की अवस्था है जो कृष्ण भावनामृत में विरत रहते है।

 

 

 

 

असम्मोह अर्थात संसय तथा मोह से मुक्ति – यह तभी संभव है, जब मनुष्य झिझकता नहीं और दिव्य दर्शन को समझता है तो वह निश्चित रूप से धीरे-धीरे मोह से मुक्त हो जाता है।

 

 

 

 

मनुष्य को सहिष्णु होना चाहिए और दूसरे व्यक्तियों के छोटे-छोटे अपराध क्षमा कर देना चाहिए। ऐसा तभी संभव होता है जब क्षमा का अभ्यास किया जाय, अतः क्षमा का अभ्यास करना चाहिए। हर बात को सतर्कता पूर्वक ग्रहण करना चाहिए।

 

 

 

 

सामाजिक प्रथा के अनुसार कहा जाता है कि वही सत्य बोलना चाहिए जो अन्य लोगो को प्रिय लगे। किन्तु यह सत्य नहीं है। सत्य को सही-सही रूप में ही बोलना चाहिए जिससे दूसरे लोग समझ सके कि सच्चाई क्या है।

 

 

 

 

सत्यम का अर्थ है कि तथ्यों को सही रूप में प्रस्तुत किया जाय जिससे अन्य लोग भी लाभ उठा सके। तथ्यों को तोडना मड़ोरना नहीं चाहिए जिससे सत्यम का अर्थ परिभाषित हो सके। उदाहरण के लिए – यदि कोई मनुष्य चोर है और लोगो को सावधान कर दिया जाय कि अमुक व्यक्ति चोर है। तो वह सत्य है।

 

 

 

 

यदि सत्य कभी-कभी अप्रिय होता है किन्तु सत्य कहने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। सत्य की मांग है – कि तथ्यों को यथा रूप में लोक हित के लिए प्रस्तुत किया जाय, यही सत्य की परिभाषा है।

 

 

 

 

दमः का अर्थ है कि इन्द्रियों को व्यर्थ के विषय भोग में न लगाया जाय। इन्द्रियों की समुचित आवश्यकताओ की पूर्ति का निषेध नहीं है। किन्तु अनावश्यक इन्द्रिय भोग आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होता है।

 

 

 

 

 

फलतः इन्द्रियों के अनावश्यक उपयोग पर नियंत्रण रखना चाहिए। मन का उपयोग मनुष्यो की मूल आवश्यकताओं को समझने के लिए किया जाना चाहिए और उसे सही प्रमाण पूर्वक प्रस्तुत करना चाहिए।

 

 

 

 

जिस प्रकार से कृष्ण भावनामृत के आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन में सुविधा उसे ही सुखम कहा गया है। इसी प्रकार दुखम वह है जिससे कृष्ण भावनामृत के अनुशीलन में असुविधा हो।

 

 

 

 

इसी प्रकार मन पर भी अनावश्यक विचारो के विरुद्ध संयम रखना चाहिए। इसे ही शम कहते है। मनुष्य को चाहिए कि धन के अर्जन में ही सारा समय न बर्बाद करे यह चिंतन शक्ति का दुरुपयोग है।

 

 

 

 

 

शास्त्र मर्मज्ञों, साधु पुरुषो, गुरुओ तथा महान विचारको की संगति में रहकर विचार शक्ति का विकास करना चाहिए। जो कुछ भी कृष्ण भावनामृत के अनुकूल हो उसे स्वीकार करे और जो प्रतिकूल हो उसका परित्याग अवश्य करना चाहिए।

 

 

 

 

अहिंसा का अर्थ होता है। कि अन्यो को कष्ट न पहुँचाया जाय। राजनीतिज्ञों तथा परोपकारियों में दिव्य दृष्टि नहीं होती है। उन्हें यह नहीं मालूम रहता है कि मानव समाज के लिए क्या लाभप्रद है। जो भौतिक कार्य अनेकानेक राजनीतिज्ञों, समाजशास्त्रियों, परोपकारियों आदि के द्वारा किए जाते है उनके परिणाम अच्छे नहीं निकलते है।

 

 

 

 

 

अहिंसा का अर्थ है कि मनुष्यो को इस प्रकार से प्रशिक्षित किया जाय कि इस मानव देह का पूरा-पूरा उपयोग हो सके, यह महान देह आत्मसाक्षात्कार के लिए मिली हुई है।

 

 

 

 

 

अतः कोई ऐसा संघ या संस्था जिससे उद्देश्य की पूर्ति में प्रोत्साहन न हो, मानव देह के प्रति हिंसा करने वाला है। जिससे मनुष्यो को भावी आध्यात्मिक सुख में वृद्धि हो, वही अहिंसा है।

 

 

 

 

जहां तक दान का संबंध है, मनुष्य को चाहिए कि अपनी आय का पच्चास प्रतिशत किसी शुभ कार्य में लगाए और यह शुभ कार्य है क्या? यह है कृष्ण भावनामृत में किया गया कार्य।

 

 

 

 

ऐसा कार्य शुभ ही नहीं सर्वोत्तम होता है। चूँकि कृष्ण अच्छे है इसलिए उनका कार्य (निमित्त) भी अच्छा है। अतः दान उसे दिया जाना चाहिए जो कृष्ण भावनामृत में लगा हुआ हो।

 

 

 

 

ब्राह्मण से यह आशा की जाती है कि वह अपना सारा जीवन ब्रह्म जिज्ञासा में लगा दे। “ब्रह्म जानतीत ब्राह्मणः” – जो ब्रह्म को जाने वही ब्राह्मण है।

 

 

 

 

वेदो के अनुसार दान ब्राह्मणो को ही दिया जाना चाहिए, यह प्रथा आज भी चालू है, यद्यपि उसका स्वरुप वह नहीं है। जैसा कि वेदो का उपदेश है, फिर भी आदेश यही है कि दान ब्राह्मणो को दिया जाय। वह क्यों? क्योंकि वह आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन में लगे रहते है।

 

 

 

 

ब्राह्मण सदैव आध्यात्मिक कार्य में लगे रहते है अतः उन्हें जीवकोपार्जन के लिए समय नहीं मिल पाता है। इसलिए दान ब्राह्मणो को दिया जाता है कि उनके जीवन निर्वाह में थोड़ी सहायता मिल जाय।

 

 

 

 

सन्यासी द्वार-द्वार जाकर भिक्षा माँगते है, वह धनार्जन के लिए नहीं वह कृष्ण भावनामृत के प्रचारार्थ ही ऐसा करते है। वैदिक साहित्य में सन्यासियों को भी दान देने का आदेश है।

 

 

 

 

वह द्वार-द्वार जाकर गृहस्थों को अज्ञान की निद्रा से जगाते है। वेदो का कथन है कि मनुष्य जागे और मानव जीवन में जो प्राप्त करना है उसे प्राप्त करे।

 

 

 

 

 

सन्यासियों द्वारा यह ज्ञान तथा विधि वितरित की जाती है। चूँकि गृहस्थ अपने गृह कार्य में इतना व्यस्त रहते है कि अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य (कृष्ण भावनामृत) को भूल जाते है अतः सन्यासियों का कर्तव्य है कि वह भिखारी बनकर मनुष्यो के पास जाय और कृष्ण भावनाभावित होने के लिए उन्हें प्रेरित करे, अतः सन्यासी को ब्राह्मणो को तथा इसी प्रकार के उत्तम कार्यो के लिए दान देना चाहिए किसी सनक के कारण नहीं।

 

 

 

 

तुष्टि का अर्थ है कि मनुष्य को चाहिए कार्य करके अधिकाधिक वस्तुए एकत्रित करने के लिए उत्सुक न रहे। उसे तो जो ईश्वर की कृपा से जो प्राप्त हो जाय उसी में प्रसन्न रहना चाहिए। यही तुष्टि है।

 

 

 

 

तपस के अंतर्गत वेदो में वर्णित अनेक विधि-विधानों का पालन करना होता है। तपस का अर्थ है तपस्या। यथा प्रातः काल उठना और स्नान करना, कभी-कभी प्रातः काल उठकर स्नान करना अति कष्टकारक होता है। किन्तु इस प्रकार स्वेच्छा से जो भी कष्ट सहे जाते है वह तपस्या कहलाते है।

 

 

 

 

लेकिन कृष्ण भावनामृत के विज्ञान में प्रगति करने के संकल्प के कारण उसे ऐसे शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते है। किन्तु उसे व्यर्थ की अथवा वैदिक आदेशों के प्रतिकूल उपवास करने की कदापि आवश्यकता नहीं है।

 

 

 

 

 

भगवद्गीता में इसे तामसी उपवास कहा गया है, तथा किसी भी ऐसे कार्य जो तमोगुण या रजोगुण में किया जाता है उससे आध्यात्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न होती है। किन्तु वैदिक आदेशों के अनुसार किया गया उपवास आध्यात्मिक ज्ञान को सर्वथा ही उन्नत बनाता है। अतः कोई भी कार्य सतोगुण में रहकर (कृष्ण भावनामृत) करना चाहिए।

 

 

 

 

 

यशस भगवान चैतन्य के अनुसार होना चाहिए। उनका कथन है कि मनुष्य को प्रसिद्ध तभी प्राप्त होती है जब वह महान भक्त के रूप में जाना जाता हो। यही वास्तविक यश है।

 

 

 

 

हम जो कुछ भी अच्छा या बुरा देखते है उन सभी का मूल श्री कृष्ण है। इस संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो कृष्ण में स्थित न हो। यही ज्ञान है।

 

 

 

 

 

यद्यपि हम जानते है कि वस्तुए भिन्न रूप में स्थित है किन्तु हमे यह अनुभव करना चाहिए कि सारी वस्तुए कृष्ण से ही उत्पन्न है। यदि कोई कृष्ण भावनामृत में महान बनता है और विख्यात हो जाता है तो वही वास्तव में प्रसिद्ध है जिसे ऐसा यश प्राप्त न हो वह अप्रसिद्ध है।

 

 

 

 

 

जो व्यक्ति कृष्ण भावनामृत मे प्रगति करना चाहता है उसमे कृष्ण वह सारे गुण उत्पन्न कर देते है। जो व्यक्ति भगवान की सेवा में लग जाता है वह भगवान की योजना के अनुसार इन सारे गुणों को विकसित कर लेता है।

 

 

 

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