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भगवान कहते है कि मेरे शुद्ध भक्तो के विचार मुझमे बसते है, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते है और वह एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते है और मेरे बिषय में बाते करते हुए परम संतोष तथा आनंद प्राप्त करते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर जिन शुद्ध भक्तो का उल्लेख हुआ है वह निरंतर ही भगवान की प्रेमाभक्ति में लगे रहते है।

 

 

 

उनके मन कृष्ण के चरण कमलो से कभी नहीं हटते है। भगवद्भक्त परमेश्वर के गुणों तथा उनकी लीलाओ के गुणगान में अहर्निश लगे रहते है।

 

 

 

 

वह दिव्य बिषयो की चर्चा करते रहते है। इस श्लोक में शुद्ध भक्तो के गुणों का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है। उनके हृदय तथा आत्मा निरंतर कृष्ण में निमग्न रहती है और वह अन्य भक्तो से भगवान के बिषय में ही बाते करने में आनंद का अनुभव करते है।

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत में भी भगवान तथा उनके भक्तो संबंध के बिषय में ऐसी अनेको कथाए मिलती है। इसलिए श्रीमद्भागवत भक्तो को अत्यंत प्रिय लगता है।

 

 

 

 

जैसा कि भागवत में ही (12,13,18) कहा गया है – (श्रीमद्भागवतं पुराणं अमलं यद्वैष्णवानां प्रियम) श्रीमद्भागवत ही एक मात्र ऐसी कथा है जिसमे भगवान तथा उनके भक्तो की दिव्य प्रकृति का पूर्ण रूप से वर्णन मिलता है। भागवत की कथा में भौतिक कार्यो, आर्थिक विकास, मोक्ष या इन्द्रिय तृप्ति के बिषय में कुछ भी नहीं है।

 

 

 

 

कृष्ण भावनाभावित जीव ऐसे दिव्य साहित्य के श्रवण में दिव्य रूचि दिखाते है, फलस्वरूप तरुण तथा तरुणी को परस्पर मिलने में जो आनंद प्राप्त होता है। उससे भी अवर्णनीय आनंद श्रीमद्भागवत के श्रवण से (कृष्ण) के भक्तो को प्राप्त होता है।

 

 

 

 

ब्रह्माण्ड के असंख्य लोको में विभिन्न प्रकार के जीव विचरण करते है, इनमे से कुछ ही भाग्यशाली होते है जिनकी शुद्ध भक्त से भेंट हो पाती है और जिन्हे भक्ति समझने का अवसर प्राप्त हो पाता है।

 

 

 

यह भक्ति बीज के सदृश्य ही रहता है। यदि इसे जीव के हृदय में बो दिया जाय, जीव हरे कृष्ण मंत्र का श्रवण तथा कीर्तन करता रहे तो बीज अंकुरित होता है।

 

 

 

 

जिस प्रकार सींचते रहने से वृक्ष का बीज फलता है। भक्ति की प्रारंभिक अवस्था में जीव (भक्त) भगवान की सेवा में ही दिव्य आनंद उठाते है और परिपक़्व अवस्था में वह ईश्वर प्रेम को प्राप्त होते है।

 

 

 

 

जब वह इस दिव्य स्थिति को प्राप्त कर लेते है तब वह उस सर्वोच्च सिद्धि का स्वाद लेते है। जो भगवद्धाम में प्राप्त होती है। भगवान चैतन्य दिव्य भक्ति की तुलना जीव के हृदय में बीज बोन से करते है।

 

 

 

 

भक्ति रूपी यह आध्यात्मिक पौधा क्रमशः बढ़ता रहता है। जब तक ब्रह्माण्ड के आवरण को भेदकर ब्रह्मज्योति में प्रवेश नहीं कर जाता है।

 

 

 

 

ब्रह्मज्योति में यह पौधा (आध्यात्मिक) तब तक बढ़ता जाता है। जब तक उस उच्चतम लोक को नहीं प्राप्त कर लेता है जिसे गोलोक वृन्दावन या कृष्ण का परम धाम कहते है। अंततोगत्वा यह पौधा भगवान के चरण कमलो की शरण प्राप्त कर वही विश्राम पाता है।

 

 

 

 

 

चैतन्य चरितामृत मे (भव्य लीला अध्याय 19) भक्ति रूपी पौधे का विस्तार से वर्णन हुआ है। जिस प्रकार पौधे में क्रम से फूल तथा फल आते है।

 

 

 

उसी प्रकार से भक्ति रूपी पौधे में भी फल आते है और कीर्तन तथा श्रवण के रूप में उसका सीचन चलता रहता है। यहां पर यह बताया गया है कि जब पूर्ण पौधा भगवान के चरण कमलो की शरण ग्रहण कर लेता है तो मनुष्य पूर्ण रूप से भगवत प्रेम में लीन हो जाता है।

 

 

 

 

ऐसी अवस्था में भक्त वास्तव में परमेश्वर के संसर्ग से दिव्य गुण प्राप्त कर लेता है। तब वह एक क्षण भी परमेश्वर के बिना नहीं रह पाता है। जैसे मछली बिना पानी के नहीं रह सकती है।

 

 

 

 

 

10- भगवान की प्रेम पूर्वक सेवा (भगवन द्वारा ज्ञान प्रदान) – श्री कृष्ण कहते है – जो प्रेम पूर्वक मेरी सेवा करता है और मेरी सेवा में निरंतर लगा रहता है। उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वह मुझ तक आ सकते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – बुद्धि योग कृष्ण भावनामृत में स्थित रहकर कार्य करने को कहते है। इस श्लोक में बुद्धि योगम शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है, हमे स्मरण हो कि द्वितीय अध्याय में भगवान ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा था कि मैं तुम्हे अनेक बिषयो के बारे में बता चुका हूँ अब तुम्हे बुद्धि योग की शिक्षा दूंगा।

 

 

 

 

 

अब यहां उसी बुद्धियोग की व्याख्या की जा रही है। बुद्धि का अर्थ तो बुद्धि है और योग का अर्थ है यौगिक उन्नति या यौगित गतिविधियां।

 

 

 

 

दूसरे शब्दों में बुद्धि योग वह विधि है जिससे मनुष्य भवबंधन से छूटना चाहता है और भक्ति में कृष्ण भावनामृत को ग्रहण कर लेता है, तो उसका यह कार्य बुद्धियोग कहलाता है।

 

 

 

 

मनुष्य को ज्ञात होना चाहिए कि कृष्ण ही लक्ष्य है लोग इसे नहीं जानते, अतः भक्तो तथा प्रामाणिक गुरु की संगति आवश्यक है और जब लक्ष्य निर्दिष्ट होता है तो पथ पर मंद गति से प्रगति करने पर भी अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति संभव हो जाती है।

 

 

 

 

जब व्यक्ति प्रामाणिक गुरु के होते हुए और आध्यात्मिक संघ से संबद्ध रहकर भी प्रगति नहीं कर पाता है तो उसे बुद्धिमान नहीं समझना चाहिए तब कृष्ण उसके अंतर से उपदेश देते है, जिससे वह सरलता से उन तक पहुंच सके।

 

 

 

 

जब मनुष्य लक्ष्य को जानता है, किन्तु कर्म फल में लिप्त रहता है तो वह कर्म योगी होता है। यह जानते हुए कि लक्ष्य कृष्ण है, जब कोई कृष्ण को समझने के लिए मानसिक चिंतन का सहारा लेता है, तो वह ज्ञान योग में लीन होता है।

 

 

 

 

 

किन्तु जब वह लक्ष्य को जानकर कृष्ण भावनामृत में तथा भक्ति में कृष्ण की खोज करता है तब वह भक्ति योगी या बुद्धि योगी होता है और यही पूर्ण योग है। यह पूर्ण योग ही जीवन की सिद्धावस्था है।

 

 

 

 

यदि भक्त इतना बुद्धिमान नहीं है की आत्मसाक्षात्कार के पथ पर प्रगति कर सके। इसके लिए जिस योग्यता की अपेक्षा होती है वह यह कि कृष्ण भावनामृत में निरंतर रहकर प्रेम तथा भक्ति के साथ के साथ ही सभी प्रकार की सेवा की जाय उसे कृष्ण के लिए कुछ न कुछ कार्य करते रहना चाहिए किन्तु प्रेम पूर्वक। यदि भक्त एकनिष्ठ रहकर भक्ति कार्य में रत रहता है तो भगवान उसे अवसर प्रदान करते है कि वह उन्नति करके अंत में उनके पास पहुंच जाय।

 

 

 

 

 

11- भक्त के हृदय में भगवान ( भगवान के द्वारा भक्त की सहायता) – भगवान कहते है कि – मैं उन पर (अपने भक्तो) पर विशेष कृपा करने हेतु, उनके हृदयो में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञान जन्य अंधकार को दूर करता हूँ।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – आधुनिक दार्शनिको का विचार है कि बिना विवेक के शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उसके लिए भगवान का उत्तर है – जो लोग शुद्ध भक्ति में रत है भले ही वह पर्याप्त रूप से शिक्षा ग्रहण नहीं किए हो तथा वैदिक नियमो से पूर्ण रूप से अवगत न हो किन्तु भगवान उनकी सहायता करते ही है जैसा कि इस श्लोक में बताया गया है।

 

 

 

 

करोडो जन्मो के भौतिक संसर्ग के कल्मष के कारण ही उन मनुष्य का हृदय भौतिकता के मल (धूल) से आच्छादित हो जाता है, किन्तु जब मनुष्य भक्ति में लगता है और निरंतर ही हरे कृष्ण का जप करता है तो वह मल (धूल) तुरंत ही दूर हो जाता है और उसे शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है।

 

 

 

 

जब भगवान चैतन्य बनारस में हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन प्रवर्तन कर रहे थे तो हजारो लोग उनका अनुसरण कर रहे थे। तत्कालीन बनारस के अत्यंत प्रभावशील एवं विद्वान प्रकाशानंद सरस्वती उनको भावुक कहते थे और उनका उपहास उड़ाते थे।

 

 

 

 

 

परम लक्ष्य विष्णु को इसी जप तथा भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है। अन्य किसी प्रकार के मनोधर्म या तर्क द्वारा तो कदापि नहीं? कभी-कभी भक्तो की आलोचना दार्शनिक यह सोचकर करते है कि भक्तगण अंधकार में है और दार्शनिक दृष्टि से भोले-भोले भावुक होते है किन्तु यह तथ्य नहीं है।

 

 

 

 

 

किन्तु यदि कोई भक्त उनके इस साहित्य का या अपने गुरु का न भी उठा पाए और यदि वह अपनी भक्ति में एकनिष्ठ रहे तो उसके अंतर से कृष्ण स्वयं ही उसकी सहायता करते है।

 

 

 

 

 

ऐसे अनेक विद्वान पुरुष है जिन्होंने भक्ति का दर्शन प्रस्तुत किया है। अतः कृष्ण भावनामृत में रत एकनिष्ठ भक्त ज्ञान से रहित नहीं हो सकता है। इसके लिए मात्र इतनी ही योग्यता चाहिए कि वह पूर्णरूप से कृष्ण भावनामृत में रहकर ही भक्ति सम्पन्न कर सके।

 

 

 

 

यहां भगवान अर्जुन को बताते है कि मात्र चिंतन से परम सत्य भगवान को नहीं समझा जा सकता है, यह असंभव है। क्योंकि भगवान इतने महान है कि उन्हें कोरे मानसिक प्रयास से न तो जाना जा सकता है और न ही प्राप्त किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

भले ही कोई लाखो वर्षो तक चिंतन करता रहे, किन्तु वह भक्ति नहीं करता है। यदि वह परम सत्य का प्रेमी नहीं है तो उसे कभी भी कृष्ण या परम सत्य विषयक ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकेगा अर्थात उसे कभी भी कृष्ण या परम सत्य की समझ नहीं हो सकती है। परम सत्य कृष्ण तो केवल भक्ति से ही प्रसन्न होते है और अपनी अचिन्त्य शक्ति से शुद्ध भक्त के हृदय में स्वयं ही प्रकट हो सकते है।

 

 

 

 

शुद्ध भक्त जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की चिंता नहीं करता है। न तो उसे कोई और चिंता करने की आवश्यकता है। क्योंकि हृदय से अंधकार हैट जाने से ही भक्त की प्रेमाभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान स्वतः ही सब कुछ प्रदान कर देते है और यही भगवद्गीता का उपदेश सार है।

 

 

 

 

शुद्ध भक्त के हृदय में तो कृष्ण निरंतर ही रहते है। और कृष्ण की उपस्थिति सूर्य के समान है जिसके द्वारा ही अज्ञान का अंधकार तुरंत ही दूर हो जाता है। शुद्ध भक्त पर भगवान की यही विशेष कृपा होती है।

 

 

 

 

भगवद्गीता के अध्ययन से मनुष्य भगवान के शरणागत होकर शुद्ध भक्ति में लग जाता है और जैसे ही भगवान अपने ऊपर भार ले लेते है (भगवान अपने शुद्ध भक्तो का भार स्वयं ही उठाते  है)तो मनुष्य सारे भौतिक प्रयासों से मुक्त हो जाता है।

 

 

 

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