50 + Best Hindi Novel Pdf Free / बेस्ट हिंदी नावेल Pdf Free

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जीव के लिए यह मनुष्य जीवन अत्यंत मूलयवान निधि है जिसका उपयोग वह अपने जीवन की समस्याओ को हल करने में कर सकता है। अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण कहलाता है।

 

 

 

आखिर भौतिक उलझनों में कौन सा व्यक्ति पड़ता है ? वह जो जीवन की समस्याओ को समझने की कोशिस नहीं करता है। वृहदारण्यक उपनिषद में (3. 8. 10) व्याकुल (व्यग्र) मनुष्य का वर्णन इस प्रकार से हुआ है। “कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओ को हल नहीं करता है और आत्मसाक्षात्कार के विज्ञान को बिना कूकर-सूकर की भांति ही इस संसार को त्यागकर चला जाता है।”

 

 

 

 

ब्राह्मण इसके विपरीत होता है। जो इस शरीर का  उपयोग जीवन की समस्त समस्याओ को हल करने में करता है। देहात्म बुद्धि के वशीभूत होकर कृपण या कंजूस लोग अपना सारा समय परिवार समाज देश आदि के अत्यधिक प्रेम में गवां देते है।

 

 

 

 

कृपण यह सोचता है कि वह अपने परिवार को मृत्यु से बचा सकता है या कि समाज या परिवार उसे मृत्यु से बचा सकता है। मनुष्य प्रायः चर्म रोग के आधार पर अपने पारिवारिक जीवन अर्थात पत्नी, बच्चो तथा परिजनों में आसक्त रहता है। ऐसी पारिवारिक आसक्ति निम्न पशुओ में भी पायी जाती है क्योंकि वह भी अपने बच्चो की देखभाल करते है।

 

 

 

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बुद्धिमान होने के कारण अर्जुन यह समझ गया था कि पारिवारिक सदस्यों के प्रति उसका अनुराग तथा मृत्यु से उनकी रक्षा करने की उसकी इच्छा ही उसकी उलझनों का कारण है।

 

 

 

अतः वह परम गुरु भगवान कृष्ण से कोई निश्चित हल निकालने का अनुरोध कर रहा है। वह कृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करता है। यद्यपि वह समझ रहा था कि युद्ध करने का कर्तव्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। किन्तु कृपण दुर्बलता (कार्पण्यदोष) के कारण ही वह अपने कर्तव्य के निर्वहन में विफल हो रहा था।

 

 

 

 

गुरु तथा शिष्य की बातें गंभीर होती है अतः यहां अर्जुन मित्रतापूर्ण बातें बंद करना चाहता है और अब अर्जुन अपने मान्य गुरु के समक्ष गंभीरता पूर्वक बातें करना चाहता है।

 

 

 

 

इसलिए कृष्ण भगवद्गीता के आदि गुरु है और अर्जुन गीता समझने वाला प्रथम शिष्य है। गीता में वर्णित है कि अर्जुन किस तरह भगवद्गीता को समझता है।

 

 

 

 

इतने पर भी मुर्ख संसारी विद्वान बताते है कि किसी को मनुष्य रूप कृष्ण की नहीं “अजन्मा कृष्ण” की शरण ग्रहण करनी चाहिए।

 

 

 

 

कृष्ण के अंतः तथा बाह्य में कोई अंतर नहीं है। इस ज्ञान के बिना जो भगवद्गीता को समझने का प्रयास करता है। उसका प्रयास कदापि सफल नहीं होता है और वह सबसे बड़ा मुर्ख है।

 

 

 

 

 

8- कृष्ण भावना भावित व्यक्ति (प्रामाणिक गुरु) – अर्जुन कहता है – मुझे कोई ऐसा साधन नहीं दिखता है जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके। स्वर्ग पर देवताओ का अधिपत्य की तरह इस धन-धान्य संपन्न सारी पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य प्राप्त करके भी मैं इस शोक को दूर नहीं कर सकूंगा।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अर्जुन समझ गया था कि उसका तथा कथित ज्ञान उसकी उन समस्याओ को दूर करने में व्यर्थ है जो उसके सारे अस्तित्व (शरीर) को सुखाए दे रही है।

 

 

 

 

उसे इस उलझनों को भगवान श्री कृष्ण जैसे आध्यात्मिक गुरु की सहायता के बिना हल कर पाना असंभव लग रहा था। यद्यपि अर्जुन धर्म तथा सदाचार के नियमो पर आधारित अनेक तर्क प्रस्तुत करता है।

 

 

 

 

किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने गुरु भगवान श्री कृष्ण की सहायता के बिना अपनी असली समस्या को हल करने में समर्थ नहीं है।

 

 

 

 

जीवन की समस्याओ को हल करने में शैक्षिक ज्ञान, विद्वता, उच्च पद, सब व्यर्थ होते है। एक मात्र गुरु ही इसमें सहायता कर सकता है।

 

 

 

अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रामाणिक गुरु एक मात्र शत-प्रतिशत कृष्ण भावना भावित होता है और वही जीवन की समस्याओ को हल कर सकता है।

 

 

 

भगवान चैतन्य ने कहा है कि जो कृष्ण भावनामृत के सिद्धांत में दक्ष हो कृष्णतत्व वेत्ता हो चाहे  किसी भी जाति का हो वही वास्तविक गुरु है। “कोई व्यक्ति चाहे चाहे वह विप्र (वैदिक ज्ञान में दक्ष) हो निम्न जाति में जन्म लेने वाला शुद्र हो, या फिर वह सन्यासी हो यदि वह कृष्ण विज्ञान में दक्ष (कृष्णतत्व वेत्ता) है तो यह यथार्थ प्रामाणिक गुरु है।” (चैतन्य-चरितामृत मध्य 8. 128)

 

 

 

 

अतः कृष्णतत्व वेत्ता हुए बिना कोई भी प्रामाणिक गुरु नहीं हो सकता है। वैदिक साहित्य में भी कहा गया है। “विद्वान ब्राह्मण, भले ही सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान में परंपरागत क्यों न हो।

 

 

 

यदि वह वैष्णव नहीं है या कृष्ण भावनामृत में दक्ष नहीं है तो वह गुरु बनने का पात्र नहीं है। किन्तु शुद्र यदि वैष्णव या कृष्णभक्त है तो वह गुरु बन सकता है।” (पदम पुराण)

 

 

 

 

संसार की समस्याओ – जन्म, जरा, व्याधि तथा मृत्यु की निवृत्ति धन-संग्रह तथा आर्थिक विकास से कदापि संभव नहीं है। यदि आर्थिक विकास तथा भौतिक सुख किसी के पारिवारिक, सामाजिक राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय अव्यवस्था से उत्पन्न हुए शोक को दूर कर पाते तब अर्जुन को यह नहीं कहना पड़ता कि पृथ्वी का अप्रतिम राज्य या स्वर्ग लोक में देवताओ की सर्वोच्चता भी उसके शोक का निवारण नहीं कर सकती है।

 

 

 

विश्व के अनेक भागो में ऐसे राज्य है जहां जीवन की सारी सुख सुविधाए उपलब्ध है और आर्थिक विकास से पूरित है। किन्तु फिर भी उनकी सांसारिक जीवन की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

 

 

 

 

वह विभिन्न साधन के द्वारा शांति ढूढ़ने का प्रयास करते है किन्तु वास्तविक सुख उन्हें तभी प्राप्त होगा जब वह कृष्ण भावनामृत से युक्त कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि के माध्यम से कृष्ण या कृष्णतत्वपूरक भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के परामर्श को ग्रहण करेंगे।

 

 

 

 

इसलिए अर्जुन ने कृष्ण भावनामृत का ही आश्रय ग्रहण किया और यही शांति तथा समरसता का उचित मार्ग है यदि हम सदा के लिए शोक का निवारण चाहते है तो हमे कृष्ण की शरण ग्रहण करनी होगी, जिस तरह से अर्जुन ने कृष्ण की शरण ग्रहण किया था।

 

 

 

 

आर्थिक विकास या विश्वआधिपत्य प्राकृतिक प्रलय द्वारा किसी भी क्षण समाप्त हो सकता है। यहां तक कि एक झटके में चंद्रलोक जैसे उच्च लोको की यात्रा भी समाप्त हो सकती है। जिसके लिए मनुष्य प्रयत्नशील है।

 

 

 

जब पुण्यकर्मो के फल क्षीण हो जाते है या समाप्त हो जाते है तो मनुष्य सुख के शिखर से जीवन के निम्नतम स्तर पर गिर जाता है।

 

 

 

अतः हमे (मनुष्य) को ऐसे सुख को पाने का प्रयास करना चाहिए जिसका पुण्य सदैव बना रहे और मनुष्य को नीचे नहीं गिरना पड़े। इसके लिए मनुष्य को कृष्ण भावनामृत की आवश्यकता हैं।

 

 

 

 

इस तरह से विश्व के अनेक राजनीतिज्ञों का पतन हुआ है और ऐसा अधः पतन ही शोक का कारण बनता है। अतः अर्जुन ने कृष्ण से प्रार्थना किया कि वह उसकी समस्या का निश्चित रूप से समाधान कर दे और यही विधि कृष्ण भावनामृत कहलाती है।

 

 

 

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