15 + Bedtime Stories in Hindi PDF Free / बच्चों की कहानियां Pdf

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Bedtime Stories in Hindi PDF Download ( बच्चों की कहानियां )

 

 

 

 

 

 

 

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1- विश्वास ही सबसे बड़ी भक्ति है। 

 

2- उपकार

 

3- सच्चाई की जीत 

 

4- परीलोक

 

5- कण-कण में भगवान

 

6- सच्चा विश्वास

 

7- कर्तव्य 

 

8- अवसर 

 

9- मित्रता

 

10- लकीर

 

 

 

निर्दयी राजा और ब्राह्मण 

 

 

 

एक राजा बहुत ही निर्दयी था। वह अपने प्रजा के ऊपर बहुत अत्याचार करता था। उसके राज्य में एक ब्राह्मण बच्चों को अच्छी शिक्षा दे रहा था।

 

 

 

 

प्रजा के बीच उस ब्राह्मण का बहुत नाम हो चुका था। यह बात निर्दयी राजा को मालूम हुई तो उसने ब्राह्मण को अपने राज्य में बुलाया और कहा, “तुम हमारे राज्य में बच्चों को गलत शिक्षा देते हो।”

 

 

 

 

 

ब्राह्मण ने कहा, “महाराज, मैं बच्चों को गलत शिक्षा नहीं देता। उन्हें अच्छे मार्ग पर चलने की शिक्षा देता हूँ।” निर्दयी राजा ने कहा, “ठीक है, लेकिन तुम हमारे तीन प्रश्नों का उत्तर दो नहीं तो मारे जाओगे। 1. हमारे सिर का मुकुट कैसा है ? 2. हमें दुनिया की सैर करने में कितना समय लगेगा ? 3. तुमसे प्रश्न पूछते समय हमारे मन में क्या चल रहा है ?”

 

 

 

 

 

 

ब्राह्मण राजा का प्रश्न सुनकर चौंक गया। उसने राजा से एक सप्ताह का समय माँगा। निर्दयी राजा ने उसे एक सप्ताह का समय दे दिया।

 

 

 

 

वह ब्राह्मण सभी लोगों से तीनों प्रश्नों का उत्तर पूछा, लेकिन कोई नहीं बता सका। किसी किताब में भी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं था। अब तो ब्राह्मण को अपनी मौत निश्चित लग रही थी।

 

 

 

 

 

 

उसी समय एक किसान का लड़का ब्राह्मण के पास आया। ब्राह्मण को चिंतित देखकर पूछा, “क्या बात है पंडित जी आप उदास क्यों है ?”

 

 

 

 

 

ब्राह्मण ने सारी बात उस लड़के को बता दी। वह लड़का बोला, “मैं राजा के प्रश्नों का उत्तर दूंगा। आप हमें अपने शिष्य के रूप में राजा के पास भेज दीजिये।”

 

 

 

 

 

ब्राह्मण ने एक पात्र के साथ किसान के लड़के को राजा के पास भेज दिया। लड़का राजा के पास गया और बोला, “ब्राह्मण ने हमे आपके पास भेजा है। मैं आपके प्रश्न का उत्तर दूंगा।” यह सुनकर राजा हसने लगा और बोला, “गुरु उत्तर नहीं दे सका तो चेला क्या उत्तर देगा।”

 

 

 

 

 

लेकिन लड़के ने राजा के प्रश्न का उत्तर दिया। लड़के ने राजा से कहा, ” 1.आपका मुकुट विक्रमादित्य के सामान है। यह सुनकर राजा खुश हो गया। 2. सूरज उगने से पहले उठ जाइये, जितना समय सूरज को लगता है। उससे कम समय आपको लगेगा। 3. आपके मन में यह चल रहा है कि मैं ब्राह्मण का चेला हूँ और आपके प्रश्नों का उत्तर दे रहा हूँ। लेकिन यह गलत है, मैं ब्राह्मण का चेला नहीं हूँ, मैं एक किसान का बेटा हूँ।”

 

 

 

 

 

निर्दयी राजा उसके उत्तर से खुश होकर उसे कीमती उपहार दिया। किसान का लड़का ब्राह्मण के पास जाकर सारी बातें बताया। ब्राह्मण ने उस लड़के को अपना शिष्य बना लिया और शिक्षा दी।

 

 

 

 

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Bedtime Stories in Hindi PDF Free

 

 

 

2-  एक राज्य में में एक लड़का रहता था। वह बहुत ही Poor था। उसके घर पर उसके अलावा और कोई भी नहीं था। वह बिल्कुल alone था।  किसी तरह से मजदूरी करके वह अपना घर चलाता था और वह  Good-natured और honest भी  था।

 

 

 

एक दिन की बात है।  सर्दियों का मौसम शुरू हो गया था और बर्फ गिर रही थी। उस लडके को कई दिनों से काम नहीं मिला था और वह कई दिनों से  Hungry था।

 

 

 

Snow के बीच वह काम ढूढने  के लिए निकला।  उसने सोचा कि कि बर्फबारी के कारण मजदूर बहुत ही कम आएंगे और ऐसे में उसे काम जरूर मिलेगा, जिससे वह कुछ भोजन खरीद सकेगा।

 

 

 

 

 

अभी कुछ दूर ही चला था कि उसे एक पक्षी नजर आया। वह सड़क किनारे गिरा हुआ था और उड़ नहीं पा रहा था।  उसने सोचा चलो अच्छा हुआ आज इसी पक्षी को पकाया जाएगा और भूख शांत की जाएगी।

 

 

 

जब वह  नजदीक गया तो उसने देखा कि वह एक सारस था सफेद और बेहद सुन्दर।  लडके ने  देखा कि उसके पंख में चोट लगी हुई थी। उस लड़के को दया आ गई।

 

 

 

वह उसे अपने घर लाया और जंगल की जड़ी बूटियों से बनाया हुआ मरहम लगाया।  कुछ ही मिनटों में वह सारस  ठीक हो गया और वहां से उड़ गया।

 

 

 

उसके बाद वह लड़का काम की तलाश में बाहर गया लेकिन उसे कुछ काम नहीं मिला। भूख से तड़पता हुआ परेशान लड़का घर लौटा  और पानी पीकर सो गया।

 

 

 

 

रात के ३ बजे  उसके दरवाजे पर एक आवाज सुनाई दी।  कोई उसके दरवाजे को पीट रहा था  और खोलने के लिए कह रहा था। उस लड़के ने सोचा इतनी रात को इतनी ठंडी में कौन हो सकता है?

 

 

 

 

वह दरवाजे के करीब गया और  पूछा, ” कौन है ? ” दरवाजे के बाहर से  कोई आवाज नहीं आई। तब उसने दरवाजे के होल  से देखा तो  एक लड़की नजर आई।

 

 

 

उसने दरवाजा खोला और पूछा, ” क्या काम है ? ‘ लड़की ठंड से कांप रही थी और उसके बगल में एक छोटा थैला रखा हुआ था।  वह  कुछ जवाब देने की हालत में नहीं थी।

 

 

 

 

लड़का और कुछ समझ पाता तब तक वह बेहोश हो गई। वह लड़का उस लड़की को  अपने बिस्तर पर सुला दिया और कंबल भी डाल  दिया। उसने उसका थैला बगल में रखा और खुद नीचे सो गया।

 

 

 

सुबह हुई तो उसने देखा कि वह लड़की उसके बगल में बैठी हुई थी।  उस लड़के ने उससे पूछा, ” क्या हाल है ?  रात को और अधिक ठंडी तो नहीं लगी ना तुम्हे ? ” उस लड़की ने कहा, ” नहीं,  मदद के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। ”

 

 

 

उस लड़के ने पूछा, ” आप कहां रहती हैं और यहां कहा जा रही थी? ‘ तब उस लड़की ने कहा, ” मैं यहां से दूर एक गांव में रहती थी और मेरे माता-पिता ठंड की वजह से मर गए।  मेरा कोई नहीं है नहीं है। बिल्कुल अकेली हूँ। क्या आप मुझे ठंड के मौसम तक यहां रहने दे सकते हैं ? ”

 

 

 

तब उस लड़के ने कहा, ” मैं भी अकेला हूं।  मेरा भी कोई नहीं है।  तुम यहाँ रह सकती हो लेकिन एक दिक्कत है। मेरे पास इस समय खाने के लिए कुछ नहीं है।  ”

 

 

 

तब उस लड़की ने कहा इसकी चिंता की कोई बात नहीं है।  उस थैले में चावल और दाल है।  तुम उसे पकाओ।   उस लड़के ने चावल और दाल पकाई और दोनों ने मिलकर खाया।

 

 

 

धीरे-धीरे ठंडी का मौसम गुजर गया और चावल और दाल भी ….. उस लड़के ने हिम्मत करके उस लड़की से कहा, ” बुरा ना मानो तो मैं आपसे एक बात कहूं… मुझे आपसे प्रेम हो गया है।  क्या आप मुझसे शादी करेंगी ? लेकिन आप चाहो तो।  ”

 

 

 

उस पर  उस लड़की ने कहा, ” मुझे भी आपसे प्रेम हो गया है।  मैं यह बात आपसे कह नहीं पा रही  थी।  ” उसके बाद उन्होंने शादी कर ली और उनकी पत्नी के रूप में रहने लगे।

 

 

 

उस लड़के ने फिर से अपना काम शुरू किया लेकिन उसे अधिक मजदूरी नहीं मिल पाती थी।  एक दिन इससे वह बहुत निराश था। उसकी पत्नी अर्थात उस लड़की ने कहा, ” मुझे बाजार से कुछ कपड़े लाकर  दो।  मैं उस कपड़े का ऐसा पोशाक बनाऊंगी जिससे तुम्हें बाजार में बहुत अच्छी कीमत मिलेगी। ”

 

 

 

 

उस लड़के ने किसी तरह से कुछ पैसे का जुगाड़ और कुछ कपड़े लेकर आया।  उसके बाद उस लड़की ने कहा, ” मुझे इस कपड़े को बनाने के लिए एकांत की आवश्यकता होगी।  तीन  दिनों तक मैं तुमसे नहीं मिलूंगी और खुद को कमरे में बंद कर लूंगी।  ”

 

 

 

 

लड़का बहुत ही आश्चर्य में पड़ गया।  तब उस लड़की ने कहा, “क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है ? ” उस लड़के ने कहा, ” मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।  तुम तीन दिनों के लिए खुद को कमरे में बंद कर सकती हो।  ”

 

 

 

तीन दिन गुजरे और उस लड़की ने बहुत ही सुंदर पोशाक बनाई। जब वह लड़का उसे  बेचने के लिए लेकर गया तो उसे उस पोशाक की  बहुत भारी कीमत मिली।

 

 

 

उस पोशाक पर चिड़ियों के पंख की आकृति बनी हुई थी।  वह  बहुत ही सुंदर दिख रहा था।  उसके पास बाद  लड़के  ने और भी कपड़े  लाये।  समय-समय पर लड़की तीन  दिन के लिए कमरे में जाती और पोशाक बनाती है और लड़का उसे बेच  देता,  साथ ही वह मजदूरी भी करता था।

 

 

 

धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी होने लगी।  एक  दिन की बात है वह लड़की कमरे में कपड़ा बना रही थी  और उसी समय लड़के  का एक पुराना मित्र वहां पर आया।

 

 

 

लड़के ने उसका स्वागत किया।  चाय – पानी के बाद दोनों बातों में मशगूल  हो गए।  तभी लड़के ने अपने दोस्त से कहा, ” अभी मेरी पत्नी कुछ कपड़े बनाने के लिए व्यस्त है और तीन  दिन बाद ही निकलेगी नहीं तो मैं तुम्हें उससे तुम्हें मिलाता और इससे मुझे बहुत खुशी होती।  ”

 

 

 

इसपर दोस्त ने बड़े ही आश्चर्य में कहा, ” क्या बात कर रहे हों ? वह तीन दिन तक खुद को कमरे में बंद कर लेती है और तुम देखने भी जाते हो ? कैसे पति हो तुम ? ”

 

 

यह कहकर  मित्र तो चला गया लेकिन लड़के  के दिमाग में यह बात खटक गई।  वह धीरे से कमरे केदरवाजे को खोला चूँकि अब लड़की को पूरा विश्वास हो गया था कि लड़का कमरे में नहीं आएगा इसलिए उसने दरवाजा बंद नहीं किया था और  जैसे ही लड़का कमरे में दाखिल हुआ उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

 

 

 

 

उसने देखा यह तो वही सारस  हैजो उस दिन घायल सड़क किनारे मिला था।   वह अपने पंखों को तोड़कर उस कपड़े में लगा रहा था।  सारस उसे देखते ही चौंका  और बोला, ” तुमने अपना वादा तोड़ा है। अब मैं जा रही हूं। अब मैं दोबारा कभी नहीं आऊंगी।  ” लड़के  को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।  वह  उसे तो बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन वह नहीं रुका और चला गया।

Top Bedtime Stories in Hindi PDF ( बेहतरीन बच्चों की कहानियां ) 

 

 

3- अगर आदमी के अंदर देखने के जैसी प्रवित्ति होगी उसे उसी तरह दिखता है। एक सच्चे आदमी को अपने चारो तरफ सच्चाई और अच्छाई ही दिखती है। लेकिन एक चोर और बेईमान आदमी को अगर सच्चाई और ईमानदारी का चष्मा पहना दिया जाए और उसके नंबर बदलते भी जाए तो भी बेईमान को सदैव बेईमानी ही नजर आएगी। जब तक अंदर के चष्मे को स्वच्छ और साफ नहीं किया जाएगा तब तक नंबर बदलने पर भी कोई फायदा नहीं होगा।

 

 

 

 

 

 

 

रहीम और करीम दोनों बहुत ही बढ़िया दोस्त थे लेकिन दोनों की आदत में बहुत ही फर्क था। एक दयालु था ( रहीम ) एक कपटी था ( करीम ) एक बार एक फ़क़ीर आकर एक गांव में कई लोगो के मध्य परोपकार की बातें कर रहे थे। वहां रहीम और करीम भी बैठे थे।

 

 

 

 

 

रहीम ने उस फ़क़ीर के कहे वाक्यों को आत्मसात करने की कोशिश किया और काफी हद तक उसके जीवन में बदलाव भी आया था। लेकिन करीम के समझ में किछ नहीं आया उल्टे वह रहीम से कहने लगा, देखा तूने वह फ़क़ीर कैसे लोगो को बहकाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। यानी अपनी कमाई कर रहा है।”

 

 

 

 

 

 

इसपर रहीम ने करीम से कहा, “तेरे चष्मे का नंबर बदलना पड़ेगा तभी तुझे सही ढंग से दिखेगा।”

 

 

 

 

करीम बोला, “हमारा चष्मा ठीक है और वह अपना चष्मा ठीक करने लगा। रहीम ने हसते हुए कहा, ” अंदर के चष्मे को ठीक कर।”

 

 

 

 

 

करीम के अंदर यह बात बैठ गई और वह अपने अंदर सुधार लाने की कोशिश करने लगा।

 

 

 

Best Bedtime Stories in Hindi PDF अनमोल पत्थर 

 

 

 

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4  किशोर एक बहुत बड़े धनी आदमी के पास काम करता था। किशोर अपने काम को अच्छे ढंग से निपटाता था। लेकिन उसका मालिक वह धनी आदमी उसे 50 रुपये से ज्यादा कभी नहीं देता था।

 

 

 

किशोर कई बार उस धनी आदमी से अपने पारिश्रमिक के बारे में बात करना चाहा तो वह धनी आदमी किशोर को डपट देता था और कहता था कि तुम्हारी कीमत 50 रुपये से ज्यादा नहीं है। मैं तो तुम्हे 50 रुपये दे रहा हूँ, दूसरी जगह तुम्हे 20 रुपये से अधिक नहीं मिलेंगे। किशोर मनमसोस कर रह जाता था।

 

 

 

 

 

वह हमेशा अपने मन में सोचता था कि हमारी कीमत बस 50 रुपये है। एक दिन वह उदास होकर जंगल में जा रहा था। एक पेड़ के नीचे उसे एक महात्मा ध्यान लगाए हुए बैठे मिले।

 

 

 

 

किशोर उनके सामने जाकर बैठ गया कुछ समय के उपरांत महात्मा जी ध्यान से बाहर निकले तो देखा उनके सामने एक युवक दीन अवस्था में बैठा है।

 

 

 

 

उन्होंने उस युवक से पूछा, “तुम कौन हो और तुम्हारा क्या नाम है और तुम परेशान लग रहे हो तुम्हरी परेशानी का कारण क्या है ?”

 

 

 

युवक बोला, “महाराज, हमारा नाम किशोर है। मैं आपके सामने अपनी कीमत जानने के लिए आया हूँ।”

 

 

 

महात्मा जी पहुंचे हुए संत थे। उन्होंने किशोर की समस्या जान लिया था। महात्मा ने अपने पास से एक रक्ताभ पत्थर किशोर को देते हुए कहा, “किशोर यह पत्थर लेकर जाओ बाजार में इसकी कीमत पता लगाकर हमारे पास आकर बताओ। इसी में तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। याद रखना यह पत्थर बेचना नहीं है।”

 

 

 

 

 

किशोर वह पत्थर लेकर बाजार की तरफ चला गया। बाजार में उसे एक आम बेचने वाला दिखा उसकी दुकान पर जाकर किशोर ने वह पत्थर दिखाकर पूछा, “तुम इस पत्थर के मूल्य के बराबर हमें कितने आम दे सकते हो ?”

 

 

 

आम वाला बोला, “मैं तुम्हे इस पत्थर के बदले में 10 आम दे सकता हूँ।”

 

 

 

आम वाले की बात सुनकर किशोर वहां से चला गया। वह एक आलू बेचने वाले के पास जाकर वह पत्थर दिखाया और पूछा, “आप हमें इस पत्थर के मूल्य के बराबर कितना आलू दोगे ?”

 

 

 

 

आलू बेचने वाला बोला, “मैं तुम्हे इस पत्थर के मूल्य के बराबर सिर्फ दो किलो आलू दे दूंगा। उससे अधिक मूल्य का यह पत्थर नहीं है।”

 

 

 

 

किशोर वहां से भी चला गया। उसे बाजार में एक स्वर्णकार की दुकान दिखाई पड़ी। वह स्वर्णकार के पास जाकर बोला, “सेठ जी हमारे पास एक पत्थर है। आप उसे देख लीजिए और बताइए आप उस पत्थर का कितना मूल्य दे सकते है ?”

 

 

 

 

पत्थर देखकर स्वर्णकार की आँखे फटी ही रह गयी क्योंकि वह ‘माणिक्य’ पत्थर था, जो अनमोल था। उसकी कीमत लगाना सूर्य को दीपक दिखाने के समान था। क्योंकि वह बहुत ही मूल्यवान पत्थर था।

 

 

 

 

 

स्वर्णकार ने किशोर से कहा, “मैं तुम्हे इस पत्थर के 50 हजार रुपये दे सकता हूँ।”

 

 

 

किशोर बोला, “सिर्फ 50 हजार रुपये ?”

 

 

 

स्वर्णकार बोला, “अगर 50 हजार रुपये कम हो तो मैं इस पत्थर के 70 हजार रुपये दे दूंगा।”

 

 

 

किशोर वह पत्थर लेकर जाने लगा तो स्वर्णकार को लगा कि इतना कीमती पत्थर हाथ से निकल जाएगा तो वह किशोर से बोला, “मैं इस पत्थर का मूल्य एक करोड़ रुपये दे सकता हूँ।” लेकिन किशोर चला गया।

 

 

 

 

उसे बाजार में एक जौहरी की दुकान दिखाई पड़ी। वह बाजार का सबसे बड़ा हीरे का व्यापारी था। किशोर उसके पास जाकर वह पत्थर दिखाया।

 

 

 

 

जौहरी पत्थर देखते ही एक लाल कपड़ा बिछाकर उस पर अनमोल ‘माणिक्य’ पत्थर को रखा और सिर झुकाया फिर प्रणाम करने के बाद किशोर से पूछा, “तुम्हे यह पत्थर कहां से मिला ?”

 

 

 

किशोर बोला, “हमें यह पत्थर एक महात्मा ने दिया है। आप इस पत्थर के कितने मूल्य दे सकते है ?”

 

 

 

जौहरी बोला, “यह पत्थर तो अनमोल है। पूरी दुनिया की दौलत इस पत्थर के मूल्य के सामने कम पड़ जाएगी। जौहरी ने पूछा क्या तुम इसे बेचना चाहते हो ?”

 

 

 

 

किशोर ने कहा, “महात्मा ने इसे बेचने के लिए मना किया है।”

 

 

 

वह वहां से चलते हुए सीधे महात्मा के पास आया और कहने लगा, “महाराज, मैं इस पत्थर को लेकर पहले आम वाले के पास गया। वह हमें इसके बदले 10 आम देने को तैयार था। फिर मैं आलू बेचने वाले के पास गया वह हमें दो किलो आलू इस पत्थर के बदले दे रहा था। मैं फिर स्वर्णकार के पास गया तो वह हमें इस पत्थर के बदले एक करोड़ रुपये देने को तैयार था तो मैं इसे एक जौहरी के पास दिखाया। उसने इस पत्थर को अनमोल बताया और कहा इसके बदले में पूरी दुनिया की दौलत कम है।”

 

 

 

 

 

किशोर की बात सुनकर महात्मा जी मुस्कुराने लगे और बोले, “तुम भी उसी पत्थर की तरह हो। जो अपनी कीमत नहीं जानता वह किसी जौहरी के पास पहुंच जाता तो उसे अपनी कीमत मालूम होती है।”

 

 

 

 

किशोर को अपनी कीमत मालूम हो गई थी। वह दूसरे दिन बड़े धनी के यहां 800 रुपये में काम करने लगा।

 

 

 

 

गरीब बालिका की दीपावली 

 

 

 

5- मदन एक मध्यम वर्गीय मनुष्य था। वह एक कम्पनी में कार्यरत था। उसके परिवार में उसकी पत्नी और एक बेटी थी। मदन का परिवार हसी ख़ुशी चल रहा था।

 

 

 

 

लेकिन कालचक्र की ऐसी काली छाया पड़ी कि मदन का हसता हुआ परिवार तबाह हो गया था। उसकी पत्नी का देहांत हो गया उसके बाद उसकी कंपनी बंद हो गई मदन बेरोजगार हो गया।

 

 

 

 

माँ की मौत को उसकी बेटी बर्दास्त नहीं कर सकी उसे लकवा मार गया था वह अपंग हो गई थी। सारी मुसीबत एक साथ ही मदन के ऊपर टूट पड़ी थी।

 

 

 

 

मुसीबतो से मदन बहुत टूट गया था। लेकिन उस अपंग बेटी के लिए ही साहस करते हुए जिन्दा था। वह अब दिहाड़ी पर मजदूरी करता था। किसी तरह से अपना और बेटी का पेट भरता था।

 

 

 

 

हालात इतने खराब हो गए थे कि जिस दिन उसे दिहाड़ी नहीं मिलती थी तब वह भूखा रह जाता था लेकिन अपनी बेटी के लिए किसी तरह से खाने की व्यवस्था अवश्य ही करता था।

 

 

 

 

एक बार मदन की अपंग बेटी ने जलेबी खाने की इच्छा प्रकट किया था। लेकिन किस्मत का मारा मदन अपनी बेटी की यह इच्छा भी पूरी करने में समर्थ नहीं था।

 

 

 

 

वह अपनी बेटी को झूठा ही दिलासा देता था कि दिवाली का जब बोनस मिलेगा तब उसे जलेबी के साथ ही एक सुंदर सा फ्राक भी लाकर देगा।

 

 

 

 

 

लेकिन उसकी बेटी इतनी समझदार थी कि वह कभी किसी बात के लिए जिद नहीं करती थी। छोटी होते हुए भी अपने पिता को साहस अवश्य देती थी कि उसके भी अच्छे समय आएगे।

 

 

 

 

 

एक दिन मदन दिहाड़ी करके घर जा रहा था। उसके पास 20 रुपये ही थे। एक बड़ी दुकान के सामने एक पुतले को सुंदर फ्राक में देखकर मदन वहां रुक गया।

 

 

 

 

 

उसी क्षण दुकान का मालिक बाहर आकर मदन से बोला, “ऐ इतनी तल्लीनता से क्या देख रहा है। कही चोरी का इरादा तो नहीं है।”

 

 

 

 

मदन दुकान मालिक से बोला, “मैं गरीब जरूर हूँ पर चोर नहीं हूँ। मैं इस फ्राक को अपनी बेटी के लिए देख रहा था क्या कीमत है इसकी ?”

 

 

 

 

 

दुकान का मालिक क्रोधित होकर बोला, “इसकी कीमत तुम्हारे बस की बाहर की बात है।”

 

 

 

 

इतना कहते हुए दुकान मालिक ने मदन को झिड़क दिया ना जाने कहां से चले आते है भाग जा यहां से। मदन अपना मन मसोस कर वहां से चला गया था।

 

 

 

 

दो दिन बाद ही दिवाली थी। समय का चक्र घूमा दुकान के मालिक के लड़के का एक्सीडेंट हो गया था। एक दिन जब मदन दिहाड़ी करने गया था तब उसकी अपंग बेटी ‘महालक्ष्मी’ के मंदिर में जाकर अपने पिता के लिए माता लक्ष्मी से प्रार्थना कर रही थी कि उसके पिता की नौकरी लग जाए जिससे उसकी भी दीपावली अच्छी तरह से बीत जाए।

 

 

 

 

 

मदन अपने घर की तरफ जा रहा था। तब रास्ते में ही वह उस बड़ी दुकान पर मदन कुछ देर के लिए रुका था। दुकान मालिक बाहर निकला लेकिन उसने पहले की तरह मदन की तरफ देखा तक नहीं और अपनी कार लेकर आगे बढ़ गया था।

 

 

 

 

 

दुकान मालिक इतनी जल्दी में था कि उसका रुपयों से भरा बैग कब गिर गया उसे पता ही नहीं लगा। वह बैग मदन के हाथ लग गया। मदन ने उस बैग को खोलकर देखा तो उसकी आंखो को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि वह बैग रुपयों से ठसा-ठस भरा हुआ था।

 

 

 

 

 

एक बार तो मदन खुश हो गया कि उसकी दीपावली अच्छे से बीत जाएगी। लेकिन तभी उसे ख्याल आया कि इतना रुपया दुकान का मालिक न जाने किस उद्देश्य से लेकर जा रहा था।

 

 

 

 

 

पैसा नहीं रहने पर दुकान मालिक का काम बिगड़ जाएगा। इतना सोचते हुए मदन उस तरफ दौड़ पड़ा जिधर दुकान मालिक कार से गया हुआ था।

 

 

 

 

 

लेकिन मदन निराश हो गया क्योंकि उसे न ही वह कार मिली न ही दुकान मालिक दिखाई पड़ा। यह सोचते हुए मदन जा रहा था कि दूसरे दिन आकर दुकान मालिक को उसका रुपयों से भरा हुआ बैग लौटा देगा।

 

 

 

 

 

तभी एक तरफ दुकान मालिक की वह कार खड़ी हुई दिखी। मदन उधर ही बढ़ गया, वह एक अस्पताल था। दुकान मालिक और उसकी औरत दोनों रोते हुए बाहर आ रहे थे।

 

 

 

 

मदन दौड़कर उसके पास गया और बोला, “आप अपने रुपयों से भरे बैग के लिए रो रहे है तो यह लीजिए आपका बैग इसमें आपके सारे रुपये सुरक्षित है। हां मैंने इस बैग को चुराया नहीं है। यह आपकी गाडी से गिर गया था।”

 

 

 

 

 

तब दुकान का मालिक कहने लगा, “मैं इन रुपयों के लिए नहीं रो रहा हूँ। हमारे लड़के का एक्सीडेंट हो गया है, उसे रक्त की जरूरत है। हम दोनों में से किसी का भी रक्त उसके रक्त से मेल नहीं खाता है। एक आदमी अपना रक्त देने वाला था। लेकिन वह पहले पैसा मांग रहा था और मैंने उसे पैसा देने के लिए कहा तो यह बैग गायब था। पैसे के अभाव में वह आदमी चला गया। अब हमारा लड़का रक्त के अभाव में नहीं बचेगा।”

 

 

 

 

 

 

इतना सुनकर मदन बोला, “आप घबड़ाइए नहीं मैं आपके लड़के को अपना रक्त दूंगा।”

 

 

 

 

 

मदन का रक्त उसके लड़के के रक्त से मेल खा गया और दुकान मालिक के लड़के की जान बच गई। मदन वह रुपयों से भरा बैग दुकान मालिक को सौपना चाहा।

 

 

 

 

 

तब दुकान मालिक ने कहा, “आपने हमारे ऊपर इतना कर्ज लाद दिया है कि इस बैग के रुपयों के साथ ही दस बैग रुपयों से भरा कम पड़ जाएगा, इसे आप रख लो।”

 

 

 

 

 

लेकिन मदन ने यह कहते हुए कि भगवान के पास क्या जवाब दूंगा। रुपयों से भरा बैग दुकान मालिक को वापस कर दिया और अपने घर की तरफ चल दिया।

 

 

 

 

उसका मन उदास था क्योंकि वह अपनी अपंग लड़की के लिए न ही जलेबी और न ही फ्राक खरीद पाया था। लेकिन किसी की सहायता करके उसके मन में संतोष का भाव अवश्य ही था।

 

 

 

 

 

मदन जब घर पहुंचा तब देखा कि उसके घर में भी दीपावली के दीप जल रहे थे और उसकी बेटी ने वही फ्राक पहन रखा है जो मदन ने उस दुकान पर देखा था।

 

 

 

 

मदन सोच ही रहा था। तभी दुकान मालिक अपनी पत्नी के साथ ही आया और कहने लगा, “मैं बहुत ही शर्मिंदा हूँ। आपके एहसान के बदले में यह छोटा सा उपहार है।”

 

 

 

 

मदन बोला, “तो यह सब आपने किया है।”

 

 

 

 

दुकान मालिक कहने लगा, “मैं भगवान के पास जाकर क्या जवाब देता।”

 

 

 

 

मदन बोला, “लेकिन मैं यह सब ऋण कैसे चुकाऊंगा ?”

 

 

 

 

तब दुकान मालिक ने कहा, “यह ऋण नहीं है। जब आप हमारे लड़के को जीवन दे सकते है तब मैं आपको इतनी छोटी ख़ुशी भी नहीं दे सकता हूँ क्या ?”

 

 

 

 

मदन को चुप देखकर दुकान मालिक बोला, “कल से दुकान पर आ जाना। नौकरी करने के लिए नहीं, भागीदारी करने के लिए।”

 

 

 

असफल होने पर निराश क्यू ? 

 

 

 

6- मनोज पढ़ने में बहुत ही अग्रणी था। उसे खुद पर भरोसा था और वह कभी भी निराश नहीं हुआ था। लेकिन दाग तो आखिर दाग ही है चाहे वह कम हो या ज्यादा।

 

 

 

 

यही मनोज के साथ भी हुआ था। हमेशा पढ़ाई में अग्रणी रहने वाला मनोज इस बार एक सेकेण्ड से दौड़ में पीछे हो गया यानी कि वह बहुत थोड़े से अंतर से फेल हो गया था।

 

 

 

 

मनोज बहुत निराश हो गया था। परीक्षाफल वाले दिन मनोज ने जब पेपर में अपना नंबर नहीं देखा तब ही वह समझ गया था कि वह फेल है।

 

 

 

 

लेकिन उसके पड़ोस वालो को विश्वास था कि हर बार की तरह इस बार भी मनोज प्रथम ही आएगा। मनोज की व्यथा उसकी मां से नहीं छिप सकी थी।

 

 

 

 

मनोज एक कमरे में मुंह छुपाए हुए बैठा था। पड़ोस के सभी लोग आकर मनोज के विषय में पूछते थे। तब मनोज की मां कहती थी हर बार की तरह इस बार भी मनोज प्रथम ही आया है।

 

 

 

 

सभी पड़ोस वालो ने विश्वास कर लिया था क्योंकि जब मनोज की मां खुद ही कह रही है तो सभी को विश्वास करना ही पड़ा। सबके जाने के बाद ही मनोज कमरे से बाहर आकर अपने मां के ऊपर गुस्सा हो गया और कहने लगा, “कि तुमने सबके सामने हमारी बात क्यू छुपाई। अगर सबको मालूम हो गया कि ‘मनोज’ फेल हो गया है तब सभी लोग तुम्हे और हमे ताना मारेंगे।”

 

 

 

 

 

तब  मनोज की मां ने कहा, “मैं ऐसे तानो की परवाह नहीं करती। मैं तो सबको देखकर जिन्दा नहीं हूँ मैं सिर्फ तुम्हे देखकर जिन्दा हूँ और तुम्हारे लिए ही जीवित हूँ। इसलिए मैं तुम्हारे हौसले को तोडना नहीं बल्कि तुम्हारे हौसले को आगे बढ़ते हुए देखना चाहती हूँ।”

 

 

 

 

 

अब मनोज की समझ में आ गया था कि असफलता से निराश नहीं होना चाहिए और असफल होने पर लोग बातो ही बातो में तोड़ने की कोशिश करते है।

 

 

 

 

लेकिन वह कितना भाग्यवान है कि असफल होने पर उसे हिम्मत देने के लिए उसकी ‘मां’ है। मां की कही बातो से मनोज को बहुत संबल मिला और वह पिछली यादो को छोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास करने लगा।

 

 

 

 

 

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