Atomic Habits Pdf in Hindi / अटॉमिक हैबिट्स Pdf Hindi

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Atomic Habits Pdf in Hindi / अटॉमिक हैबिट्स पीडीऍफ़ 

 

 

 

 

 

 

Atomic Habits Pdf फ्री डाउनलोड 

 

 

 

अटॉमिक हैबिट्स बहुत ही बढ़िया बुक है। आपको यह बुक जरूर पढ़नी चाहिए। इस बुक की लिंक ऊपर दी गयी है। अगर आप कोई बढ़िया आदत शुरू करना चाहते हैं या कोई बुरी आदत छोड़ना चाहते हैं तो आपके लिए यह किताब सबसे बेस्ट है।

 

 

 

आप जब किसी चीज का टार्गेट फिक्स करते हैं तो आपको एक आदत डालनी पड़ती है और किसी भी चीज की आदत डालना और वह किसी ख़ास चीज को लेकर वह बड़ा ही मुश्किल होता है, ऐसे में इस बुक के सीक्रेट्स आपको बहुत काम आएंगे।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

श्री कृष्ण कहते है जो त्रय तापो के होने पर भी मन में विचलित नहीं होता है अर्थात सुख में सहज प्रसन्न नहीं होता है और आशक्ति क्रोध तथा भय से सदा ही मुक्त है वह स्थिर मनवाला मुनि कहलाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मुनि शब्द का अर्थ है वह जो शुष्क चिंतन के लिए मन को अनेक प्रकार से उद्वेलित करे किन्तु किसी तथ्य पर पहुंचने में विफल रहे। कहा जाता है कि प्रत्येक मुनि का अपना-अपना दृष्टि कोण होता है और जब तक एक मुनि का दृष्टि कोण दूसरे मुनि के दृष्टि कोण से भिन्न न हो तब तक उसे वास्तविक मुनि नहीं कहा जा सकता है।

 

 

 

न चासा वृषिर्यस्य मंत्रं न भिन्नम (महाभारत वनवर्ष (313, 116) किन्तु जिस स्थितधीः मुनि का यहां भगवान ने उल्लेख किया है। वह सामान्य मुनि से भिन्न होता है। स्थितधीः मुनि सदैव कृष्ण भावनाभावित रहता है क्योंकि वह सारा सृजनात्मक चिंतन पूरा कर चुका होता है।

 

 

 

कृष्ण भावनाभावित मुनि राग या विराग से प्रभावित नहीं होता है। राग का अर्थ होता है अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए वस्तुओ को ग्रहण करना और विराग अर्थ है ऐसी किसी भी ऐंद्रिक आशक्ति का सदा अभाव। किन्तु कृष्ण भावनामृत में स्थिर व्यक्ति में न तो राग होता है न ही विराग होता है क्योंकि उसका सारा जीवन ही भगवत सेवा के लिए समर्पित रहता है। फलतः सारे प्रयास असफल रहने पर भी वह कभी क्रुद्ध नहीं होता है। चाहे विजय हो या न हो कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति अपने संकल्प का पक्का होता है।

 

 

 

 

जिसने शुष्क चिंतन की अवस्था पार कर ली है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है भगवान श्री कृष्ण या वासुदेव ही सब कुछ है (वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सु दुर्लभः) वह स्थिर चित्त मुनि कहलाता है।

 

 

 

 

ऐसा कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति त्रिविध तापो के संघात से तनिक भी विचलित नहीं होता है क्योंकि वह इन तापो को (कष्टों) को भगवत कृपा के रूप में स्वीकार करता है और पूर्व के पापो के कारण अपने को अधिक कष्ट सहन करने के योग्य बनाता है और उसे अनुभव होता है कि उसके सारे दुःख भगवत कृपा से रंच मात्र रह जाते है।

 

 

 

 

ऐसा व्यक्ति सोचता है कि वह भगवत कृपा से ही उसे सुख की ऐसी स्थिति प्राप्त हुई है और भगवान की सेवा करने का उसका प्रयास और दृढ हो जाता है और भगवान की सेवा के लिए तो वह सदैव साहस करने के लिए सन्नद्ध रहता है और इस तरह ही वह अपने सुख के लिए भी या जब वह सुखी रहता है तो अपने को सुख के आयोग्य मानकर इसका भी श्रेय भगवान को देता है।

 

 

 

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