Ganesh Atharvashirsha in Hindi Pdf / अथर्वशीर्ष हिंदी Pdf

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Atharvashirsha in Hindi Pdf / गणेश अथर्वशीर्ष इन हिंदी Pdf

 

 

 

अथर्वशीर्ष हिंदी Pdf Download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अश्वत्थ वृक्ष के आदि अंत तथा आधार की खोज – भगवान कह रहे है – हे अर्जुन ! इस वृक्ष के वास्तविक स्वरुप का अनुभव इस (भौतिक) जगत में नहीं किया जा सकता।

 

 

 

 

कोई नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहा है अंत कहा है या इसका आधार कहा है? लेकिन मनुष्य को चाहिए कि इस दृढ मूल वाले वृक्ष को विरक्ति के शस्त्र से काट गिराए।

 

 

 

तत्पश्चात उसे उसे ऐसे स्थान की खोज करनी चाहिए जहां जाकर लौटना न पड़े और जहां उस भगवान की शरण ग्रहण कर ली जाय, जिससे अनादि काल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आया है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – इस प्रसंग में ‘असंग’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि विषय भोग की आसक्ति तथा भौतिक प्रकृति पर प्रभुता अत्यंत प्रबल होती है।

 

 

 

 

अतः प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित आत्म-ज्ञान की विवेचना द्वारा विरक्ति सीखनी चाहिए और ज्ञानी पुरुषो से श्रवण करना चाहिए।

 

 

 

 

भक्तो की संगति में रहकर ही ऐसी विवेचना से भगवान की प्राप्ति होती है। मनुष्य को इस (अश्वत्थ) वृक्ष का उद्गम परमेश्वर की खोज ऐसे व्यक्तियों की संगति से करना चाहिए जिन्हे उस परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त है।

 

 

 

 

इस प्रकार के ज्ञान से ही मनुष्य धीरे-धीरे क्रमशः वास्तविकता के इस छद्म प्रतिबिंब से विलग हो जाता है और संबंध विच्छेद होने पर वह वास्तव में उस मूल वृक्ष में स्थित हो जाता है।

 

 

 

 

यहां पर यह स्पस्ष्ट कह दिया गया है कि इस अश्वत्थ वृक्ष के वास्तविक स्वरुप को इस भौतिक जगत में नहीं समझा जा सकता है। जब वृक्ष के भौतिक विस्तार में कोई फस जाता है तो न तो वह इस वृक्ष के शुभारंभ को ही देख पाता है न ही उसे इस वृक्ष के विस्तार का ही ज्ञान हो पाता है।

 

 

 

 

चूँकि इसकी जड़े ऊपर की ओर है अतः वास्तविक वृक्ष का विस्तार विरुद्ध दिशा में होता है। फिर भी मनुष्य को कारण की खोज करनी ही होती है।

 

 

 

 

जैसे मैं अमुक पिता का पुत्र हूँ जो अमुक पुत्र है आदि –  इस प्रकार से अनुसंधान करते हुए उसे ब्रह्मा प्राप्त होते है क्योंकि वही से समस्त जीवो की उत्पत्ति है वह आदि जीव है जिन्हे गर्भोदकशायी विष्णु ने उत्पन्न किया। अंततः इस प्रकार से भगवान तक पहुंचा जा सकता है जहां सारी गवेषणा का अंत हो जाता है।

 

 

 

 

भगवान की शरण ग्रहण करना ही जीव के लिए सर्वप्रथम करणीय है। यहां उस स्थान (पद) का वर्णन किया गया है। जहां पर पहुँच जाने के पश्चात मनुष्य इस छद्म प्रतिबिंब वृक्ष में कभी वापस नहीं लौटता है।

 

 

 

 

भगवान कृष्ण ही वह आदि मूल है जहां से प्रत्येक वस्तु का उद्भव हुआ है। वह ही इस भौतिक जगत के विस्तार कारण है। इसकी व्याख्या भगवान ने पहले ही कर दिया है।

 

 

 

 

अतः मनुष्य को भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए केवल उन्ही की शरण ग्रहण करनी चाहिए जो श्रवण कीर्तन आदि के द्वारा भक्ति करने से प्राप्त होती है।

 

 

 

 

मैं ही प्रत्येक वस्तु का उद्गम हूँ। अतः इस भौतिक जीवन रूपी प्रबल अश्वत्थ वृक्ष के बंधन से छूटने के लिए कृष्ण की शरण ग्रहण करनी ही चाहिए। कृष्ण की शरण ग्रहण करते ही मनुष्य स्वतः इस भौतिक विस्तार से विलग हो जाता है।

 

 

 

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