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Asli Prachin Lal Kitab Pdf / असली प्राचीन लाल किताब pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Asli Prachin Lal Kitab Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Asli Prachin Lal Kitab Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Lal Kitab Pdf Hindi  भी पढ़ सकते हैं।

 

 

 

Asli Prachin Lal Kitab Pdf 

 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

तब सब चारो कुमार बंधुओ सहित पिता जी के पास आये, ऐसा मालूम होता था मानो शोभा, मंगल और आनंद से ओत-प्रोत होकर जनवासा उमड़ पड़ा हो।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- फिर अनेको प्रकार रसोई बनाई गई, जनक जी सभी बारातियो को बुलाया। राजा दशरथ जी ने सब पुत्रो को साथ लेकर गमन किया, अनुपम वस्त्रो के पावड़े पड़ रहे है।

 

 

 

2- आदर के साथ सबके चरणों को धोकर उचित आसन पर यथा योग्य बैठाया गया, तब जनक जी ने अवधपति दशरथ जी के चरण धोए। उनका शील और स्नेह वर्णित नहीं हो सकता है।

 

 

 

3- फिर श्री राम जी के चरण कमल को धोया, जो सदा ही शिव जी के हृदय-कमल में छिपे रहते है। तीनो भाइयो को श्री रामचंद्र जी के समान जानकर ही जनक जी ने उनके भी चरण अपने हाथो से धोए।

 

 

 

4- राजा जनक जी ने सभी को उचित आसन दिए और सब परसने वालो को बुला लिया। आदर के साथ पत्तले पड़ रही है जो मणियों के पत्तो से सोने की कील लगाकर बनाई गयी थी।

 

 

 

328- दोहा का अर्थ-

 

 

 

चतुर और विनीत रसोइये सुंदर, स्वादिष्ट और पवित्र भोजन (दाल-भात) और गाय का सुगंधित घी के साथ ही सबके सामने परस दिए गए।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- सब लोगो ने पहले पंच कौर क्रिया करते हुए भोजन करने लगे – पंच कौर की विधि में – “प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा इन मंत्रो का उच्चारण करते हुए पहले पांच ग्रास लेने की क्रिया करना होता है।” भोजन करते समय प्रेम भरी गाली की रीति का गाना सुनकर वह सभी आनंद में डूब गए। अनेको प्रकार के अमृत के समान स्वादिष्ट पकवान परसे गए जो अतुलनीय थे।

 

 

 

2- चतुर रसोइये भांति-भांति के व्यंजन परसने लगे। उनका नाम कोई नहीं जान सकता है। चार प्रकार के भोजन की “चर्व्य, चबाकर खाने योग्य, चौष्य चूसकर, लेह्य चाटकर, पेय पीकर खाने योग्य” विधि कही गई है। उनमे से प्रत्येक विधि के इतने पदार्थ बने थे जिनका वर्णन ही नहीं किया जा सकता है।

 

 

 

3- छहो रसो के बहुत सुंदर और स्वादिष्ट व्यंजन बनाये गए है। एक-एक रस के अगनित प्रकार के भोजन बनाये गये है। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम लेकर, जनक पुर की स्त्रियां मधुर ध्वनि से गाली दे रही है अर्थात गाली के रूप में ही मधुर गान कर रही है।

 

 

 

 

4- समय के अनुसार ही सुहावनी गाली से शोभा बढ़ रही है। उसे सुनकर अपने समाज के साथ राजा दशरथ जी हंस रहे है। इस रीति से सब लोगो ने भोजन किया, फिर सबको आदर सहित आचमन के लिए जल दिया गया।

 

 

 

 

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