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Ashtanga Yoga Pdf in Hindi / अष्टांग योग Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Ashtanga Yoga Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Ashtanga Yog Pdfa Download कर सकते हैं और आप यहां से  पतंजलि योग बुक इन हिंदी Pdf भी पढ़ सकते हैं।

 

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Ashtanga Yoga Pdf / अष्टांग योग पीडीएफ

 

 

 

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Ashtanga Yoga Pdf in Hindi
यहां से अष्टांग योग पीडीऍफ़ डाउनलोड करे।
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Ashtanga Yoga Pdf in Hindi
यहां से पतंजलि योग बुक इन हिंदी Pdf डाउनलोड करे।
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Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

 

यह मात्र पाठको की सहायता के लिये इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स से लिया गया है। अगर किसी को इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी Pdf Books से कोई भी परेशानी हो तो हमें [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं, हम तुरंत ही उस पोस्ट को अपनी वेबसाइट से हटा देंगे।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

3- फिर हे गोसाई! आप जिसको भी जैसा कहेंगे,वह सब तरह से सेवा में लगकर आज्ञा का पालन करेगा। मुनि वशिष्ठ जी कहने लगे – हे राम! तुमने सच कहा पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया।

 

 

 

 

4- इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरत के भक्ति के वश में हो गयी है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि को रखकर जो कुछ किया जायेगा तो शिव जी साक्षी है, वह सब शुभ ही होगा।

 

 

 

 

 

258- दोहा का अर्थ-

 

 

 

 

पहले भरत की विनती आदर पूर्वक सुन लीजिए, फिर उसपर विचार करिये। तब साधु मत, लोकमत, राजनीती और वेदो का निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही उसके अनुसार ही कीजिए।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- भरत जी के ऊपर गुरु जी का स्नेह देखकर श्री राम जी के हृदय में विशेष आनंद हुआ। भरत जी धर्म धुरंधर और तन, मन, धन से अपना सेवक जानकर।

 

 

 

 

2- श्री राम जी गुरु की आज्ञा के अनुकूल, मनोहर, कोमल और कल्याण के मूल वचन बोले। हे नाथ! आपकी सौगंध और पिता जी के चरणों कि दुहाई है। मैं सत्य कहता हूँ कि विश्व भर में भरत के समान भाई कोई हुआ ही नहीं है।

 

 

 

 

3- जो लोग गुरु के चरण कमलो के अनुरागी है, वह लोक में (लौकिक दृष्टि से भी) और वेदो में (परमार्थ की दृष्टि से) भी बड़भागी होते है। फिर जिसपर आप (गुरु) का स्नेह है, उस भरत के भाग्य को कौन कह सकता है।

 

 

 

 

 

4- छोटा भाई जानकर भरत के मुंह पर उसकी बड़ाई करने में मेरी बुद्धि सकुचा रही है। फिर भी मैं तो वही कहूंगा कि भरत जो कुछ कहे वही करने में भलाई है। ऐसा कहकर श्री राम जी चुप हो गए।

 

 

 

 

259- दोहा का अर्थ-

 

 

 

तब मुनि भरत जी से बोले – हे तात! सब संकोच त्यागकर कृपा के समुद्र अपने प्यारे भाई से अपने हृदय की बात कहो।

 

 

 

 

 

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