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Ashadh Ka Ek Din Pdf / आषाढ़ का एक दिन Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Ashadh Ka Ek Din Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Ashadh Ka Ek Din Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Nagraj And Dhruv Comics Hindi Pdf कर सकते हैं।

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Ashadh Ka Ek Din Pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम  Ashadh Ka Ek Din Pdf
पुस्तक के लेखक  मोहन राकेश 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
साइज  8.8 Mb 
पृष्ठ  214 
श्रेणी  नाटक 

 

 

 

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Ashadh Ka Ek Din Pdf
Ashadh Ka Ek Din Pdf डाउनलोड यहां से करे।
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आषाढ़ का एक दिन

 

 

 

इस नाटक को लिपिबद्ध करने वाले नाटककार का नाम मोहन राकेश है। इनके द्वारा लिखित नाटक को आधुनिक युग का प्रथम नाटक होने का सम्मान प्राप्त है। उन्होंने प्रथम बार हिंदी नाटक को अखिल भारतीय मंच प्रदान करते हुए उसके अलग-थलग प्रवाह को विश्व नाटक की सामान्य धारा की तरफ अग्रसर कर दिया।

 

 

 

1959 मे मोहन राकेश के लिखे हुए नाटक को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक का ‘संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ में ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि होने पर भी आधुनिक मनुष्य के भीतर के अन्तर्द्वन्द की झलक मिलती है।

 

 

 

इस नाटक के लेखन में वास्तविक रूप से ‘आषाढ़ का एक दिन’ का प्रदर्शन इसे व्यापक स्तर पर सफलता प्रदान करते है। पिछले तीस-बत्तीस वर्षो में ‘आषाढ़ का एक दिन‘ का मंचन भारत की अनेक भाषाओ में किया गया है जो उसकी सफलता को स्वयं ही बयान करता है और अभी भी इस नाटक का आकर्षण कम नहीं हुआ है। इसकी सफलता में निःसंदेह उसकी बेहद सधी हुई संयमित तथा सुचिंतित पात्र योजना का पूर्ण रूप सहयोग है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

इस समय यही उचित जान पड़ता है। तुम निश्चय समझो यही मेरा विचार है। ब्रह्मा जी कहते है – मुनीश्वर नारद! ऐसा कहकर गिरिराज हिमवान और मेनका शुद्ध हृदय से उस स्वप्न के फल की प्रतीक्षा करने लगे। देवर्षे! शिव भक्त शिरोमणे! भगवान शंकर का यश परम पावन, मंगलकारी, भक्तिवर्धक और उत्तम है।

 

 

 

तुम इसे आदर पूर्वक सुनो। दक्ष यज्ञ से अपने निवास स्थान कैलास पर्वत पर आकर भगवान शंभु ने प्रियाविरह से कातर हो गए और प्राणो से भी अधिक प्यारी सती देवी का हृदय से चिंतन करने लगे। अपने पार्षदों को बुलाकर सती के लिए शोक करते हुए उनके प्रेम वर्धक गुणों का अत्यंत प्रीति पूर्वक वर्णन करने लगे।

 

 

 

यह सब उन्होंने सांसारिक गति को दिखाने के लिए किया। फिर गृहस्थ आश्रम की सुंदर स्थिति तथा नीति रीति का परित्याग करके वे दिगंबर हो गए और सब लोको में उन्मत्त की भांति भ्रमण करने लगे। लीलाकुशल होने के कारण विरही की अवस्था का प्रदर्शन करने लगे।

 

 

 

सती के विरह से दुखित हो कही भी उनका दर्शन न पाकर भक्त कल्याणकारी भगवान शंकर पुनः कैलास गिरि पर लौट आये और मन को यत्नपूर्वक एकाग्र करके उन्होंने समाधि लगा ली जो समस्त दुखो का नाश करने वाली है। समाधियों में अविनाशी स्वरुप का दर्शन करने लगे।

 

 

 

इस तरह तीनो गुणों से रहित हो वे भगवान शिव चिरकाल तक सुस्थिर भाव से समाधि लगाए बैठे रहे। वे प्रभु स्वयं ही माया के अधिपति निर्विकार परब्रह्म है। तदनन्तर जब असंख्य वर्ष व्यतीत हो गए तब उन्होंने समाधि छोड़ी। उसके बाद तुरंत ही जो चरित्र हुआ उसे मैं तुम्हे बताता हूँ।

 

 

 

भगवान शिव के ललाट से उस समय श्रम जनित पसीने की एक बून्द पृथ्वी पर गिरी और तत्काल एक शिशु के रूप में परिणत हो गयी। मुने! उस बालक के चार भुजाये थी और आकार मनोहर था। दिव्य द्युति से दीप्तिमान वह शोभाशाली बालक अत्यंत दुस्सह तेज से सम्पन्न था।

 

 

 

तथापि उस समय लोकाचार परायण परमेश्वर शिव के आगे वह साधारण शिशु की भांति रोने लगा। यह देख पृथ्वी भगवान शंकर से भय मान उत्तम बुद्धि से विचार करने के पश्चात सुंदर स्त्री का रूप धारण करके वही प्रकट हो गयी। उन्होंने उस सुंदर बालक को तुरंत उठाकर अपनी गोद में रख लिया और अपने ऊपर प्रकट होने वाले दूध को ही स्तन्य के रूप में उसे पिलाने लगी।

 

 

 

उन्होंने स्नेह से उसका मुंह चूमा और अपना ही बालक मान हंस-हंसकर उसे खेलाने लगी। परमेश्वर शिव का हित साधन करने वाली पृथ्वी देवी सच्चे भाव से स्वयं उसकी माता बन गयी। संसार की सृष्टि करने वाली परम कौतुकी एवं विद्वान अन्तर्यामी शंभु वह चरित्र देखकर हंस पड़े और पृथ्वी को पहचानकर उनसे बोले।

 

 

 

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