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Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf / अपरा एकादशी Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से सुंदरकांड पाठ हिंदी में Pdf Download कर सकते हैं।

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Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf Download

 

 

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Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf
Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf यहां से डाउनलोड करे।
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अपरा (अचला) एकादशी Pdf

 

 

 

यह अपरा एकादशी ज्येष्ठ महीने में पड़ने वाले कृष्णपक्ष में इसका व्रत रखा जाता है। इसका व्रत रखने से अपार धन संपदा की प्राप्ति के साथ सभी पाप नष्ट होकर मुक्ति की प्राप्ति होती है। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को अपरा एकादशी का महात्म बताते हुए कहा – हे राजन! यह एकादशी अपरा तथा अचला दो नामो से विख्यात है। इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा करने का विधान है।

 

 

 

जो मनुष्य इस व्रत को करता है वह संसार में प्रसिद्ध प्राप्त करता है। तीनो पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है वही फल अपरा एकादशी के व्रत करने से प्राप्त होता है। यह व्रत जीवन में व्याप्त अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान है। अपरा एकादशी का व्रत करने से और भगवान का पूजन करने से मनुष्य सभी पापो से छूटकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

अध्वर्यु आदि याज्ञिकों में से जिनकी भुजाये टूट गयी है वे अश्विनी कुमारो की भुजाओ से और जिनके हाथ नष्ट हो गए है वे पूषा के हाथो से अपने काम चलाये। यह मैंने आप लोगो के प्रेम वश कहा है। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! ऐसा कहकर वेद का अनुसरण करने वाले सुरसम्राट चराचरपति दयालु परमेश्वर महादेव जी चुप हो गए।

 

 

 

 

भगवान शंकर का वह भाषण सुनकर विष्णु और ब्रह्मा सहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो उन्हें तत्काल साधुवाद देने लगे। तदनन्तर भगवान शंभु को आमंत्रित करके मुझ ब्रह्मा और देवर्षियों के साथ श्रीविष्णु अत्यंत हर्षपूर्वक पुनः दक्ष की यज्ञशाला की ओर चले।

 

 

 

 

इस प्रकार उनकी प्रार्थना से भगवान शंभु विष्णु आदि देवताओ के साथ कनखल में स्थित प्रजापति दक्ष की यज्ञशाला में पधारे। उस रुद्रदेव ने वहां यज्ञ का और विशेषतः देवताओ तथा ऋषियों का जो वीरभद्र के द्वारा विध्वंस किया गया था उसे देखा।

 

 

 

 

स्वाहा, स्वधा, पूषा, तुष्टि, धृति, सरस्वती अन्य समस्त ऋषि पितर अग्नि तथा अन्यान्य बहुत से यक्ष गंधर्व और राक्षस वहां पड़े थे। उनमे से कुछ लोगो के अंग तोड़ डाले गए थे कुछ लोगो के बाल नोच लिए गए थे और कितने ही उस समरांगण में अपने प्राणो से हाथ धो बैठे थे।

 

 

 

 

उस यज्ञ की वैसी दुरवस्था देखकर भगवान शंकर ने अपने गणनायक महापराक्रमी वीरभद्र को बुलाकर हँसते हुए कहा – महाबाहु वीरभद्र! यह तुमने कैसा काम किया? तात! तुमने थोड़ो ही देर में देवता तथा ऋषि आदि को बड़ा भारी दंड दे दिया।

 

 

 

 

वत्स! जिसने ऐसा द्रोहपूर्ण कार्य किया इस विलक्षण यज्ञ का आयोजन किया जिसे ऐसा फल मिला उस दक्ष को तुम शीघ्र यहां ले आओ। भगवान शंकर के ऐसा कहने पर वीरभद्र ने बड़ी उतावली के साथ दक्ष का धड़ लाकर उनके सामने डाल दिया।

 

 

 

दक्ष के उस शरीर को सिर से रहित देख लोक कल्याणकारी भगवान शंकर ने आगे खड़े हुए वीरभद्र से हंसकर पूछा – दक्ष का सिर कहाँ है? तब प्रभावशाली वीरभद्र ने कहा – प्रभो शंकर! मैंने तो उसी समय दक्ष के सिर को आग में होम दिया था।

 

 

 

 

वीरभद्र की यह बात सुनकर भगवान शंकर ने देवताओ को प्रसन्नता पूर्वक वैसी ही आज्ञा दी जो पहले दे रखी थी। भगवान भव ने उस समय जो कुछ कहा उसकी मेरे द्वारा पूर्ति कराकर श्रीहरि आदि सब देवताओ ने भृगु आदि सबको शीघ्र ही ठीक कर दिया।

 

 

 

 

तदनन्तर शंभु के आदेश से प्रजापति के धड़ के साथ यज्ञपशु बकरे का सिर जोड़ दिया गया। उस सिर के जोड़े जाते ही शंभु की शुभ दृष्टि पड़ने से प्रजापति के शरीर में प्राण आ गए वे तत्काल सो कर जगे हुए पुरुष की भांति उठकर खड़े हो गए। उठते ही उन्होंने अपने सामने करूणानिधि भगवान शंकर को देखा।

 

 

 

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