Andhbhakt Kise Kahate Hain? अंधभक्त किसे कहते हैं ? अंधभक्ति के गुण

मित्रों इस पोस्ट में बताया गया है कि Andhbhakt Kise Kahate Hain? यह पोस्ट आपको जरूर ही पसंद आने वाली है। आप इसे पढ़कर बेहतर जान पाएंगे कि अंधभक्त किसे कहते हैं ?

 

 

 

Andhbhakt Kise Kahate Hain? अंधभक्त किसे कहते हैं ? 

 

 

 

 

 

 

 

मित्रो यह बहुत ही मजेदार Topic है और आज के समय में काफी प्रचलित है। अगर अनुवाद के रूप में देखेंगे तो अंधभक्त का अर्थ होता है। “बिना कुछ जाने समझे पूरी श्रद्धा से किसी के ऊपर विश्वास कर लेना।”

 

 

 

अब इसी उदाहरण को राजनीति में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह राजनेताओ द्वारा नहीं बल्कि उनके समर्थको द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। एक तरफ से लोग दूसरे पक्ष को अंधभक्त कहते है तो दूसरा पक्ष उन्हें चमचा या पप्पू जैसे अलंकारों से सुसज्जित कर देता है।

 

 

 

आज हमारे देश की राजनीति का स्तर इन शब्दों से पता चल जाता है। दोनों पक्षों के समर्थक बात-बात पर Hiper हो जाते है और ऐसे-ऐसे शब्दों का उल्लेख करने लगते है जिनका उल्लेख नहीं होना चाहिए।

 

 

 

एक समय में तो Google पर अंधभक्त शेयर करने पर जो वाक्य या जो अर्थ निकलकर आ रहा था उसे Multi Knowledge पर देख सकते है।

 

 

 

राजनीति में कांग्रेस या अन्य विपक्ष के समर्थक भाजपा समर्थको को अंधभक्त कहते है। उनका यह कहना है कि भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) के समर्थक बिना आकड़ो को जाने सरकार की हर बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते है।

 

 

 

वे सच्चाई जानने का प्रयास करना तो दूर सच्चाई के इधर उधर भी नहीं जाते है और इसके उत्तर में भाजपाई अर्थात भाजपा (B.J.P.) के समर्थक विपक्ष के समर्थको को चमचा जैसे शब्दों से शोभित करते है अर्थात B.J.P. वालो का कहना है कि विपक्ष अपनी गलतियों से ना सीखते हुए गलत को भी सही कहता है।

 

 

 

 

Andhbhakt Kise Kahate Hain? एक मजेदार किस्सा

 

 

 

 

आइए आपको इससे जुड़ा एक बेहद मजेदार किस्सा सुनाता हूँ। एक विद्यालय में एक छात्र ने बड़ी ही उत्सुकता से पूछा, “गुरु जी, यह अंधभक्त किसे कहते है ?

 

 

 

प्रश्न सुनते ही गुरु जी चौके और आश्चर्यचकित होते हुए बोले, “बेटा, तुम्हे अंधभक्ति का प्रश्न कैसे सूझा ?

 

 

 

परेशान छात्र ने कहा, “गुरु जी आजकल तो चहुओर अंधभक्त का शोर है। चारो दिशाए “अंधभक्त” से गुंजायमान हो रही है और पूरा का पूरा शोसल मीडिया भी अंधभक्त से पटा हुआ है।”

 

 

 

इसपर गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “किसी भी ग्रंथ में अभी तक “अंधभक्त” की विवेचना नहीं हुई है। यहां तक कि तमाम बड़े से बड़े विचारक “अंधभक्त” पर अपने मत बनाने में अभी तक नाकामयाब हुए है क्योंकि अभी तक वे केवल भक्ति के बारे में जानते थे लेकिन अचानक से प्रकट हुआ यह “महाशब्द” आज इतना प्रसिद्ध हो चुका है कि Google में लोग इसे सर्च कर रहे है।”

 

 

 

आज मैं तुमको “अंधभक्ति और और अंधभक्त” दोनों के बारे में बताऊंगा। गुरु जी ने आगे कहा, “वत्स, जब कोई महापुरुष सत्ता पर आंख मूंद कर विश्वास करने लगे, किसी बात की जांच किए बगैर ही उसे परमात्मा मान ले उसे ही अंधभक्त कहते है।”

 

 

 

 

तभी पीछे से एक छात्र की आवाज आई, “इ बात मोहे कुछ पल्ले ना पड़ रहो है। मास्टर जी।”

 

 

 

तब गुरु जी ने कहा, “मेरी इस बात को पूरी तन्मयता, श्रद्धा और विश्वास के साथ यह मान लो कि तुम्हे मेरे द्वारा कहा हुआ कथन अक्षरशः पूर्णरूप से कंठस्थ हो गया है। बस इसी को अंधभक्त और इस क्रिया को अंधभक्ति कहते है।”

 

 

 

अंधभक्ति के गुण ( सच्चे अंधभक्त ) 

 

 

 

Andhbhakt Kise Kahate Hain

 

 

 

 

अंधभक्ति आसान नहीं है। इसके लिए विशेष गुण चाहिए होता है और यह सिर्फ अंधभक्तो में ही विद्यमान है। अगर आप किसी अंधभक्त को स्वर्ण को स्वर्ण कहने को कहेंगे तो वह अंधभक्त स्वर्ण को सिर्फ इसलिए राख का ढेर या पत्थर कह देगा क्योंकि उसके मालिक अर्थात जिसकी श्रद्धा में वह अंधभक्त उसने उसे पत्थर या राख का ढेर कहा है।

 

 

 

 

अंधभक्ति के सिर्फ इतने ही गुण नहीं है बल्कि वे ऐसे गुणों के भंडार होते है वे उस स्वर्ण को ना सिर्फ पत्थर राख का ढेर कहेंगे बल्कि उसे प्रमाणित करने के लिए ऐसे-ऐसे तर्क प्रस्तुत करेंगे कि आप भी मन ही मन कह उठोगे “वाह ! क्या अंधभक्ति है।”

 

 

 

वे उस स्वर्ण को राख कहने के लिए उसपर पीतल का पानी चढ़े होने से लेकर नकली सोने तक कहेंगे और यदि आप इसपर भी ना माने तो वे कहेंगे कि स्वर्ण रखकर क्या करोगे ? चोरी हो जाएगी और आपकी जान भी तो जा सकती है और अगर चोरी हुई तो भी राख और जान गई तो राख ही।

 

 

 

 

आप इसपर भी ना माने तो शास्त्रों का भी उल्लेख प्रमाण स्वरूप दिया जाएगा। जिसमे राजा परीक्षित और कलयुग के वार्तालाप को सम्मिलित किया जाएगा। आपको उनके तर्क को सुनकर एक बार यह यकीन होने लगेगा कि कही यह सच में राख या पत्थर तो नहीं है।

 

 

 

आज के समय में अंधभक्ति कुछ लोगो के लिए परम सम्मानीय पदवी है और वे इसके आगे बड़ी से बड़ी भी कुर्सी छोड़ सकते है। इतने छीछालेदर होने के बाद भी अंधभक्ति करना क्या खाने का काम है ? ऐसे लोग अंधभक्ति में पूरी तरह से निपुण और और पारंगत होते है।

 

 

 

 

अंधभक्ति और अंधभक्त हिंदी कहानी 

 

 

 

एक बहुत ही खुशहाल राज्य था। वहां के राजा बहुत ही न्यायप्रिय थे। लेकिन उनकी एक सबसे बड़ी कमी कि वे अपने मुख्य सचिव पर बहुत अधिक विश्वास (जिसे आप अंधभक्ति भी कह सकते है ) करते थे और वह मुख्य सचिव इसी बात का फायदा उठाकर अपने काम से लापरवाही करता था।

 

 

 

 

बहुत से मंत्री इस बात से चिंतित थे लेकिन अब राजा से यह बात कहे कौन ? और सबसे बड़ी बात इसे साबित करने की थी। तब एक बद्धिमान मंत्री केशव ने कहा, “मैं इस सचिव की पोल खोलूंगा। मैं अपने राज्य को बर्बाद होते नहीं देख सकता।”

 

 

 

 

इस पर बाकी मंत्रियों ने भी हां में हां मिलाई। वे भी तो परेशान ही थे। बस उन्हें नेतृत्व करने वाला चाहिए था और केशव के रूप में उन्हें नेतृत्व करने वाला मिल गया।

 

 

 

 

गर्मी के दिन आने वाले थे और राज्य के सुदूर गावो में कुओ की खुदाई की जाने वाली थी। केशव और मंत्रियों ने राजा से कहा, “महाराज इस काम को हमारे कुशल रणनीतिकार मुख्य सचिव को दिया जाए। वे एक कुशल रणनीतिकार है और सुदूर गावो में पानी की बड़ी कठिनाई है और अगर इस कार्य की बागडोर इनके हाथ में रहेगी तो कार्य अवश्य पूर्ण होगा।”

 

 

 

 

 

मुख्य सचिव को कुछ शक तो जरूर हुआ कि आखिर सभी ऐसा क्यों बोल रहे है ? लेकिन फिर उसने सोचा राजा को तो मुझ पर अति विश्वास है मैं कुछ भी करता हूँ वे सही मान लेते है और इस कार्य में मुनाफा भी बहुत है।

 

 

 

 

 

यह सोचकर उसने भी हां कह दिया। राजा के आदेश से कार्य शुरू हुआ। कुछ दिनों बाद उसने राज्य दरबार में बताया कुओ की खुदाई का कार्य पूर्ण हो चुका है।

 

 

 

 

राजा ने उसे खूब शाबाशी दी। उसके बाद मंत्रियों ने पता लगाया तो देखा 1-2 कुए छोड़कर कोई कुए बने ही नहीं थे। इसपर राज दरबार में राजा के सामने मंत्री केशव ने कुओ की चोरी की शिकायत की।

 

 

 

 

इसपर राजा ने कहा, “कुओ की चोरी कैसे हो सकती है ?”

 

 

 

मुख्य सचिव भी गुस्से से बोला, “महाराज, मंत्री केशव का दिमाग खराब हो गया है। भला कुओ की चोरी कैसे हो सकती है ?”

 

 

 

इसपर मंत्री केशव ने कहा, “महाराज, अगर आपको विश्वास ना हो तो चलकर आप स्वयं ही देख ले।”

 

 

 

इसपर फिर से मुख्य सचिव ने राजा को रोकना चाहा लेकिन अन्य मंत्रियों के दबाव में राजा निरीक्षण को तैयार हो गए और वहां पर उन्हें मुख्य सचिव के सारे करतूतो का पता चल गया और उन्होंने मुख्य सचिव को जेल में बंद करवा दिया और अंधभक्ति ना करने का फैसला लिया।

 

 

 

 

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