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Anandmath Pdf Hindi Free Download / आनंदमठ पीडीएफ हिंदी फ्री डाउनलोड

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मित्रों इस पोस्ट में Anandmath Pdf Hindi Free दिया जा रहा है। आप यहां से Anandmath Pdf Hindi Free Download कर सकते हैं।

 

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Anandmath Pdf Hindi Free आनंदमठ पीडीएफ हिंदी फ्री डाउनलोड

 

 

 

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Anandmath PDF Hindi Free
आनंदमठ Pdf Free Download
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आनंदमठ के बारे में 

 

 

 

आनंद मठ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में की थी। यह बांग्ला भाषा का एक बेहद ही चर्चित उपन्यास है। आप एक तरह से इसे क्रन्तिकारी उपन्यास कह सकते है। आज के समय में Anand Math का हिंदी साहित्य अनेको भाषा में रूपांतर हो चुका है।

 

 

 

आनंद मठ का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के क्रांतिकारियों पर बेहद गहरा असर हुआ था। आनंद मठ में उत्तर बंगाल के सन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस उपन्यास में देशभक्ति की भावना है और अंग्रेजो ने इसपर प्रतिबंध लगा दिया था और 1947 के बाद इसपर से प्रतिबंध हटाया गया। अब यह उपन्यास कॉपीराइट फ्री हो चुका है।

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

 

प्रत्येक कार्य में नियमित रहना – श्री कृष्ण कहते है – जो व्यक्ति खाने-सोने, आमोद-प्रमोद तथा कार्य करने की पद्धति में नियमित रहता है। वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशो को नष्ट कर सकता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जहां तक खाने का प्रश्न है इसे तो प्रसादम या पवित्रीकृत भोजन के रूप में नियमित बनाया जा सकता है। भगवद्गीता (9. 26) के अनुसार भगवान कृष्ण को शाक, फूल, फल, अन्न, दुग्ध आदि भेट किए जाते है। इस प्रकार एक कृष्ण भावना भावित व्यक्ति को ऐसा भोजन न करने का स्वतः ही प्रशिक्षण प्राप्त रहता है। जो मनुष्य के खाने योग्य नहीं होता या फिर सतोगुणी नहीं होता।

 

 

 

 

खाने, सोने, रक्षा करने  में जो शरीर की आवश्यकताए है। अति करने से योगाभ्यास की प्रगति मंद होकर रुक जाती है। जहां तक सोने का प्रश्न है कृष्ण भावना भावित व्यक्ति कृष्ण भावनामृत में कर्म करने में निरंतर सतर्क रहता है अतः निद्रा में अपना अमूल्य समय नहीं गवाता है। अव्यर्थ-कालतत्वम – कृष्ण भावना भावित व्यक्ति अपना एक मिनट का समय भी भगवान की सेवा के बिना नहीं बिताना चाहता है। तह वह कम से कम सोता है।

 

 

 

 

जहां तक कार्य का प्रश्न है – कृष्ण भावना भावित व्यक्ति ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता है जो कृष्ण से संबंधित न हो। इस प्रकार उसका कार्य सदैव नियमित रहता है और इन्द्रिय तृप्ति से सदा अदुषित रहता है। इसके आदर्श श्रील गुरु गोस्वामी है जो कृष्ण की सेवा में निरंतर लगे रहते थे और दिनभर में दो घंटे से अधिक निद्रा ग्रहण नहीं करते थे और कभी-कभी तो निद्रा विहीन रह जाते थे। ठाकुर हरिदास तो अपनी माला से तीन लाख नामो का जप किए बिना न तो प्रसाद ग्रहण करते थे और न सोते ही थे।

 

 

 

 

चूंकि कृष्ण भावना भावित व्यक्ति के लिए इन्द्रिय तृप्ति का प्रश्न ही नहीं उठता है। अतः उसे तनिक भी भौतिक अवकाश नहीं मिलता है। चूंकि वह अपने कार्य वचन, निद्रा, जागृति तथा अन्य सारे शारीरिक कार्यो में नियमित रहता है अतः ऐसे व्यक्ति को भौतिक दुख नहीं सताता है।

 

 

 

 

 

18- योग में सुस्थिर (योगी के लिए) – श्री कृष्ण कहते है – जब योगी योगाभ्यास द्वारा अपने मानसिक कार्य कलापो को वश में कर लेता है और अध्यात्म में स्थित हो जाता है अर्थात समस्त भौतिक इच्छाओ से रहित हो जाता है। तब योग में सुस्थिर कहा जाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – साधारण मनुष्य की तुलना में योगी के कार्यो में यह विशेषता होती है कि वह समस्त भौतिक इच्छाओ से मुक्त रहता है जिसमे मैथुन प्रमुख है। एक पूर्ण योगी अपने मानसिक कार्यो में इतना अनुशासित होता है कि उसे कोई भी भौतिक इच्छा विचलित नहीं कर सकती। निर्विशेष वादियों के लिए यह अवस्था अनिवर्चनीय हो सकती है किन्तु कृष्ण भावना भावित व्यक्ति के लिए यह अत्यंत संगम तथा व्यावहारिक है। कोरा विग्रह व्यावहारिक नहीं है। सामान्य लोगो के लिए जो सन्यास आश्रम में नहीं है इन्द्रियों तथा मन का दिव्य कार्य ही दिव्य सफलता की सही विधि है जिसे भगवद्गीता में युक्त कहा गया है।

 

 

 

 

जब तक निरंतर स्मरण द्वारा भगवान के चरण कमलो में मन स्थिर नहीं रहता है। तब ऐसे दिव्य कर्म व्यावहारिक नहीं बन पाते है। अतः भगवान की भक्ति में विहित कार्यो को अर्चन कहते है जिसका अर्थ है – समस्त इन्द्रियों को भगवान की सेवा में लगाना। इन्द्रियों तथा मन को कुछ न कुछ भगवद सेवा का कार्य अवश्य ही चाहिए, अन्यथा इन्द्रिया तथा मन का भटकना स्वाभाविक है।

 

 

 

जैसा कि महाराज अम्बरीश की जीवन चर्या से स्पष्ट हो जाता है – यह सिद्ध अवस्था कृष्ण भावना भावित व्यक्तियों द्वारा स्वतः प्राप्त हो जाती है जैसा कि श्रीमद्भागवत में (9. 4. 18. 20) कहा गया है। “राजा अम्बरीश ने सर्वप्रथम अपने मन को भगवान के चरण कमलो पर स्थिर कर दिया फिर क्रमशः वाणी को कृष्ण के गुणानुवाद में लगाय, आंखो को भगवान के दिव्य रूप का दर्शन करने, ध्राणेन्द्रिय को भगवान पर चढ़ाए गए कमल पुष्प की सुगंध सुघने, हाथो को भगवान के मंदिर स्वच्छ करने, जीभ को भगवान के चरण कमलो पर चढ़ाए गए तुलसी पत्रों का स्वाद लेने, कानो को भगवान के कार्य कलापो को सुनने, शरीर को अन्य भक्तो के शरीरो को स्पर्श करने, पावो को तीर्थ यात्रा करने तथा भगवान के मंदिर तक जाने, सिर को भगवान को प्रणाम करने तथा अपनी इच्छाओ को भगवान की इच्छा पूरी करने लगा दिया।” यह सारे कर्म शुद्ध भक्त के सर्वथा अनुरूप होते है।

 

 

 

 

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