7 + Amrita Pritam Books Hindi Free Download / अमृता प्रीतम बुक्स पीडीएफ फ्री

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Amrita Pritam Books Hindi Free अमृता प्रीतम बुक्स पीडीएफ फ्री 

 

 

 

 

 

 

1- रशीदी टिकट की आत्मकथा 

 

2- मुहब्बतनामा 

 

3- कोरे कागज़ 

 

4-उधड़ी हुई कहानियां 

 

5- 7 सवाल अमृता प्रीतम की कहानी 

 

6- एक खाली जगह 

 

7- यह सच है 

 

 

 

 

ज्ञान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

Amrita Pritam Books Hindi Free
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अंतःकरण में (भगवान के) विषय में सोचना – श्री कृष्ण कहते है। समस्त योगियों में से जो योगी अत्यंत श्रद्धा पूर्वक मेरे परायण है। अपने अंतःकरण में मेरे विषय में सोचता है और मेरी दिव्य प्रेमाभक्ति करता है। वह योग में मुझसे अंतरंग रूप से युक्त रहता है और सभी में सर्वोच्च है ऐसा मेरा मत (भगवान का) है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर भजते शब्द महत्वपूर्ण है। भजते भज धातु धातु से बना है जिसका अर्थ है – सेवा करना। जबकि अंग्रेजी शब्द वर्शिव (पूजन) से यह भाव कदापि व्यक्त नहीं होता है क्योंकि इसमें पूआज करना, सम्मान दिखाना तथा योग्य का सम्मान करना सूचित होता है। किसी सम्माननीय व्यक्ति या देवता की पूजा न करने वाले को अशिष्ट कहा जाता है। किन्तु प्रेम तथा श्रद्धा पूर्वक सेवा तो केवल भगवान के निमित्त होता है।

 

 

 

किन्तु भगवान की सेवा न करने वाले की भर्त्सना की जाती है। प्रत्येक जीव भगवान का अंश स्वरुप है। इस तरह प्रत्येक जीव को अपने स्वभाव के अनुसार भगवान की सेवा अवश्य करनी चाहिए। ऐसा नहीं करने से जीव नीचे गिर जाता है। भागवत पुराण में (11. 53) इसकी पुष्टि इस प्रकार से हुई है। “जो मनुष्य अपने जीवन दाता आद्य भगवान की सेवा नहीं करता और अपने कर्तव्य में शिथिलता वरतता है वह निश्चित रूप से अपनी स्वभाविक स्थिति से नीचे गिर जाता है।”

 

 

 

भागवत पुराण के इस श्लोक में भजंति शब्द व्यवहृत हुआ है। भजंति शब्द का प्रयोग परमेश्वर के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है जबकि वार्शिव (पूजन) का प्रयोग देवताओ या अन्य किसी सामान्य जीव के लिए किया जाता है।

 

 

 

 

भक्तियोग समस्त योगो की परिणति है। अन्य योग तो भक्ति योग में भक्ति तक पहुंचने के साधन मात्र होते है। इसमें पाए जाने वाले शब्द “अवजानन्ति” भगवद्गीता के श्लोको में पाए जाते है। अवजानन्ति मा मूढ़ा – केवल मुर्ख तथा धूर्त भगवान कृष्ण का उपहास करते है। योग का वास्तविक अर्थ भक्तियोग है। अन्य सारे योग भक्ति योग रूपी गंतव्य की दिशा में अग्रसर होते है। ऐसे मुर्ख भगवद भक्ति की प्रवृत्ति न होने पर भी भगवद्गीता का भाष्य कर बैठते है। फलतः वह भजंति तथा वार्शिव (पूजन) शब्दों के अंतर को नहीं समझ पाते है।

 

 

 

कर्म योग से लेकर भक्ति योग तक लम्बा रास्ता आत्म-साक्षात्कार तक जाता है। निष्काम कर्म योग इस रास्ते (मार्ग) का आरम्भ है। जब ज्ञान योग में अनेक भौतिक विधियों से परमात्मा के ध्यान में वृद्धि होने लगती है और मन उनपर लगा रहता है तो उसे अष्टांग योग कहते है। जब कर्म योग में ज्ञान तथा वैराग्य की वृद्धि होती है तो इसे ज्ञान योग कहा जाता है।

 

 

 

भक्ति योग का सूक्ष्म विश्लेषण करने के लिए अन्य योगो को समझने की आवश्यकता होती है। अष्टांग योग को पार करने पर जब मनुष्य भगवान के सन्निकट पहुंचता है तो यह भक्तियोग कहलाता है। यथार्थ में चरम लक्ष्य तो भक्ति योग ही होता है। अतः प्रगतिशील योगी के लिए कल्याण के शाश्वत मार्ग पर चलना ही श्रेयष्कर होता है। जो किसी एक बिंदु पर दृढ रहता है और आगे प्रगति नहीं करता है उसे कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, राजयोगी, हठयोगी आदि नामो से पुकारा जाता है।

 

 

 

यदि कोई इतना भाग्यशाली होता है कि भक्ति योग प्राप्त कर सके तो यह समझना चाहिए उसने सभी योग को पार कर लिया है। कोई विरला ही इतना भाग्यशाली होता है कि वैदिक विधान के अनुसार भक्ति योग के पथ को स्वीकार करके कृष्ण भावना भावित में स्थित हो पाता है। ठीक उसी तरह जैसे कि हम यह कहते है कि विश्वभर के पर्वतो में हिमालय सबसे ऊंचा है और जिसकी सर्वोच्च चोटी एवरेस्ट है। अतः कृष्ण भावना भावित होना योग की सर्वोच्च अवस्था है।

 

 

 

आदर्श योगी श्याम सुंदर कृष्ण पर अपना ध्यान एकाग्र करता है जो बादल के समान (मेघवर्ण) सुंदर रूप वाले है। जिनका वस्त्र रत्नो से की प्रभा से पूर्ण रहता है और जिनका शरीर फूलो की माला से शोभायमान है। जिनका मुख कमल सूर्य की आभा के समान ही तेजवान है। उनके अंगो को सुशोभित करने वाली ज्योति ब्रह्मज्योति कहलाती अथवा ब्रह्मज्योति से उनका पूरा शरीर शोभायमान उद्दीप्त रहता है। वह राम, नृसिंह, वाराह तथा श्री भगवान कृष्ण जैसे नामो से तथ्य रूपों में अवतरित होते है।

 

 

 

वह पूर्ण बालक, पूर्ण पति, पूर्ण सखा तथा पूर्ण स्वामी है। वह सामान्य व्यक्ति की तरह ही माता यशोदा के पुत्र रूप में जन्म ग्रहण करते है और कृष्ण, गोविन्द, वासुदेव के नाम से जाने जाते है और वह समस्त ऐश्वर्याो तथा दिव्य गुणों से ओत-प्रोत रहते है जो श्री भगवान के इन गुणों से भिज्ञ (जानता) है वह सर्वोच्च योगी कहलाता है।

 

 

 

योगी की यह दशा सिर्फ भक्ति योग से ही संभव हो पाती है। उसकी पुष्टि वैदिक साहित्य से भी होती है। (श्वेताश्वर उपनिषद 6. 23)

यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।

तश्यैत कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।। 

 

“जिन महात्माओ के हृदय में श्री भगवान तथा गुरु में परम श्रद्धा होती है। उनमे वैदिक ज्ञान का तात्पर्य सम्पूर्ण रूप से स्वतः ही प्रकाशित हो उठता है।”

 

भक्ति रस्य भजनं तदिहा मूत्रोपाधि नैरास्येना मुष्मिन मनः कल्पन मेतदेव नैष्कमर्यम

 

भक्ति का अर्थ है भगवान की सेवा जो इस जीवन में या अगले  जीवन में भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होती है। ऐसी प्रवृत्तियों से मुक्त होकर मनुष्य को अपना मन परमेश्वर में लीन करना चाहिए। नैष्कमर्य का यही प्रयोजन है। (गोपाल तापनी उपनिषद 1. 5)

 

 

 

यह सभी कुछ ऐसे साधन है जिसमे योग की परम संसिद्धमयी अवस्था भक्ति या कृष्ण भावनामृत को सम्पन्न किया जा सकता है।

 

 

 

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