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Alha-Udal Pdf Hindi Download / आल्हा ऊदल की वीर गाथा Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Alha-Udal Pdf Hindi Download देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Alha-Udal Pdf Hindi download कर सकते हैं और आप यहां से Jamin Agreement Likhne Ka Tarika Pdf कर सकते हैं।

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Alha-Udal Pdf Hindi Download

 

 

पुस्तक का नाम  Alha-Udal Pdf Hindi
पुस्तक के लेखक  महर्षि वेद व्यास 
भाषा  हिंदी 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  5.29 Mb 
पृष्ठ  208 
श्रेणी  इतिहास 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अतः सदा आपकी आज्ञा के अनुसार सेवा करूँगा। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय तुरंत अपने घर को लौट आये। उन्होंने अपनी प्रिया मेना को बड़े आदर से वह सारा वृतांत कह सुनाया। तत्पश्चात शैलराज ने साथ जाने वाले परिजनों तथा समस्त सेवक गणो को बुलाकर उन्हें ठीक-ठीक समझाया।

 

 

 

हिमालय बोले – आज से कोई भी गंगावतरण नामक स्थान में जो मेरे पृष्ठ भाग में ही है। मेरी आज्ञा मानकर न जाय। यह मैं सच्ची बात कहता हूँ। यदि कोई वहां जायेगा तो उस महादुष्ट को मैं विशेष दंड दूंगा। मुने! इस प्रकार अपने समस्त गणो को शीघ्र ही नियंत्रित करके हिमवान ने विघ्न निवारण के लिए जो सुंदर प्रयत्न किया वह तुम्हे बताता हूँ सुनो।

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – नारद! तदनन्तर शैलराज हिमालय उत्तम फल फूल लेकर अपनी पुत्री के साथ हर्ष पूर्वक भगवान हर के समीप गए। वहां जाकर उन्होंने ध्यान परायण त्रिलोकीनाथ शिव को प्रणाम किया और अपनी अद्भुत कन्या काली को हृदय से उनकी सेवा में अर्पित कर दिया।

 

 

 

फल-फूल आदि सारी सामग्री उनके सामने रखकर पुत्री को आगे करके शैलराज ने शंभु से कहा – भगवन! मेरी पुत्री आप भगवान चंद्रशेखर की सेवा करने के लिए उत्सुक है। अतः आपकी आराधन की इच्छा से इसको साथ लाया हूँ। यह अपनी दो सखियों के साथ सदा आप शंकर की ही सेवा में रहे।

 

 

 

नाथ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो इस कन्या को सेवा के लिए आज्ञा दीजिए। तब भगवान शंकर ने उस परम मनोहर कामरुपिणी कन्या को देखकर आँखे मूंद ली और अपने त्रिगुणातीत, अविनाशी, परमतत्वमय उत्तम रूप का ध्यान आरंभ किया।

 

 

 

उस समय सर्वेश्वर एवं सर्वव्यापी जटाजूटधारी वेदांत वेद्य चंद्रकलाविभूषण शंभु उत्तम आसन पर बैठकर नेत्र बंद किए तप में ही लग गए। यह देख हिमाचल ने मस्तक झुकाकर पुनः उनके चरणों में प्रणाम किया। यद्यपि उनके हृदय में दीनता नहीं थी।

 

 

 

तो भी वे उस समय इस संशय में पड़ गए कि न जाने भगवान मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे या नहीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ गिरिराज हिमवान ने जगत के एकमात्र बंधु भगवान शिव से इस प्रकार कहा – देवदेव! महादेव! करुणाकर! शंकर! विभो! मैं आपकी शरण में आया हूँ। आँखे खोलकर मेरी ओर देखिए।

 

 

 

शिव! शर्व! महेशान! जगत को आनंद प्रदान करने वाले प्रभो! महादेव! आप सम्पूर्ण आपत्तियों का निवारण करने वाले है। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। स्वामिन! प्रभो! मैं अपनी इस पुत्री के साथ प्रतिदिन आपका दर्शन करने के लिए आऊंगा। इसके लिए आदेश दीजिए।

 

 

 

महेश्वर की ऐसी बात सुनकर शिवा के पिता हिमवान मस्तक झुकाकर उन भगवान शिव से बोले – प्रभो! यह तो बताइये किस कारण से मैं इस कन्या के साथ आपके दर्शन के लिए आ सकता हूँ। क्या यह आपकी सेवा के योग्य नहीं है ? फिर इसे नहीं लाने का क्या कारण है यह मेरी समझ में नहीं आता।

 

 

 

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