Agni Ki Udaan in Hindi Pdf / अग्नि की उड़ान हिंदी पीडीएफ

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Agni Ki Udaan in Hindi Pdf / अग्नि की उड़ान हिंदी Pdf

 

 

 

अग्नि की उड़ान हिंदी Pdf Free Download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्री कृष्ण यहां रजोगुण तथा तमोगुण की व्याख्या करते हुए अर्जुन से कहते है – कि जब कोई रजोगुण में मरता है तो वह सकाम कर्मियों के बीच जन्म लेता है और जब कोई तमोगुण में मरता है तो वह पशु में जन्म धारण करता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – इस श्लोक के अनुसार कोई तमोगुणी बन जाता है तो उसे मृत्यु के बाद पशु ग्रहण करनी पड़ती है। वहां से क्रमानुसार विकास करते हुए ज्ञान के प्रक्रम द्वारा पुनः मनुष्य जीवन तक आना पड़ता है।

 

 

 

 

कुछ लोगो का विचार है कि एक बार मनुष्य जीवन को प्राप्त करके आत्मा कभी नीचे नहीं गिर सकता है। यह ठीक नहीं है क्योंकि मनुष्य शरीर प्राप्त करने के बाद अगर कर्म अच्छा नहीं है तो उसका फल तो आत्मा को ही दूसरी  में भुगतना पड़ेगा।

 

 

 

 

यद्यपि आत्मा सदैव ही शुद्ध होता है। अच्छी संगति से ही अच्छे गुणों का विकास अपने अंदर करना चाहिए जिससे अधम योनि में जाने से बचा जा सके।

 

 

 

 

अतः जो लोग मनुष्य जीवन के विषय में सचमुच चिंतित है। उन्हें सतोगुणी बनना चाहिए और अच्छी संगति में रहकर गुणों को लांघकर कृष्ण भावनामृत में स्थित होना चाहिए। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है अन्यथा इसकी कोई गारंटी (निश्चितता) नहीं है कि मनुष्य को फिर मनुष्य की प्राप्ति होगी।

 

 

 

 

16- पुण्य कर्म का फल (शुद्ध सात्विक) – श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे है – कि पुण्य कर्मो का फल शुद्ध होता है और सात्विक कहलाता है। लेकिन रजोगुण में संपन्न कर्म का फल दुःख होता है और तमोगुण में किये गए कर्म मूर्खता में प्रतिफलित होते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – वह मुनिगण जो समस्त प्रकार के मोह से मुक्त है सुखी रहते है क्योंकि सतोगुण में किये गए कर्मो का फल शुद्ध होता है लेकिन रजोगुण में किये गए कर्म दुःख का कारण बनते है।

 

 

 

 

यदि कोई मांसाहार करता है तो यह समझना चाहिए कि वह अज्ञान वश ही ऐसा करता है और अपने भविष्य को अंधकारमय बना रहा है।

 

 

 

 

अतः भगवद्गीता का कथन है कि रजोगुण के अधीन होकर जो भी कर्म किया जाता है उसमे निश्चित रूप से महान कष्ट होते है। उदाहरण के लिए – यदि कोई भी गगनचुम्बी अट्ठालिका बनवाना चाहता है तो उसके बनवाने के पूर्व ही अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ता है।

 

 

 

 

धन का संग्रह करने के लिए मालिक को श्रम करते हुए भी कष्ट उठाना पड़ता है और अट्ठालिका (भवन कई मंजिल वाला) बनाने वाले श्रमिकों को बहुत शारीरिक श्रम करना पड़ता है।

 

 

 

 

इस प्रकार कष्ट तो होते ही है लेकिन इससे यह मानसिक तुष्टि हो सकती है कि मैंने यह मकान बनवाया या इतना धन कमाया लेकिन यह कोई वास्तविक सुख नहीं है।

 

 

 

 

पशु का जीवन तो सदैव दुखमय होता है। यद्यपि वह (जीव) माया के वशीभूत होकर इसे समझ नहीं पाते है। जहां तक तमोगुण का संबंध है, तमोगुण में स्थित होने के कारण ही कर्ता को कुछ ज्ञान नहीं रहता है।

 

 

 

 

अतः उसके कार्य उस समय दुःख दायक होते है। बाद में उसे कर्ता (जीव) को पशु जीवन में जाना पड़ता है। अज्ञान के कारण ही लोग यह नहीं जान पाते है कि परमेश्वर के नियंत्रण वाला एक पूरा राज्य है।

 

 

 

 

प्रत्येक जीवित प्राणी परमेश्वर की संतान है और परमेश्वर को एक छोटी सी चींटी का भी मारा जाना कदापि सह्य नहीं होता है। इसके लिए उन्हें दंड भोगना ही पड़ता है। यही प्रकृति का नियम है। मानव समाज में यदि कोई किसी का वध कर दे तो उसे प्राणदंड मिलता है यह राज्य का नियम है।

 

 

 

 

वैदिक साहित्य में (ऋग्वेद 9,4,64) सूचित करता है कि जो व्यक्ति गाय का दूध पीकर गाय को ही मारना चाहता है। वह सबसे बड़े अज्ञान में रहता है। वैदिक ग्रंथो में (विष्णु-पुराण 1,19,65) एक प्रार्थना भी है जो इस प्रकार है – “हे प्रभु आप गायो तथा ब्राह्मणो के हितैषी है और आप समस्त मानव समाज तथा विश्व के हितैषी है।”

 

 

 

 

तात्पर्य यह है कि इस प्रार्थना में गायो तथा ब्राह्मणो की रक्षा का विशेष उल्लेख है। ब्राह्मण आध्यात्मिक शिक्षा के प्रतीक है और गाये महत्वपूर्ण भोजन प्रदान करती है।

 

 

 

 

जबकि ब्राह्मणो और गायो को सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। इससे यही ज्ञात होता है कि मानव समाज विपरीत दिशा में जा रहा है और अपनी भर्तस्ना का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। निःसंदेह ही यह आधुनिक मानव सभ्यता रजोगुण तथा तमोगुण के कारण ही कुमार्ग पर जा रही है। अतः जो सभ्यता अपने नागरिको को अगले जन्म में पशु बनने के लिए मार्ग दर्शन कर रही हो वह निश्चित रूप से मानव सभ्यता नहीं है।

 

 

 

 

मनुष्य के पशुओ के वध की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ईश्वर ने अनेक प्रकार की अच्छी वस्तुए खाद्य पदार्थ के रूप में प्रदान कर रखी है और समस्त राष्ट्रों को चाहिए कि मानवता को महानतम कष्ट से बचाने के लिए कृष्ण भावनामृत की सरलतम विधि प्रदान करे क्योंकि यह अत्यंत घातक युग है।

 

 

 

 

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