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Agama Shastra Pdf in Hindi Free / आगम शास्त्र Pdf Free Download

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मित्रों इस पोस्ट में Agama Shastra Pdf in Hindi दिया गया है। आप नीचे की लिंक से आगम शास्त्र Pdf Free Download कर सकते हैं।

 

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Agama Shastra Pdf in Hindi आगम शास्त्र Pdf Free Download 

 

 

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Agama Shastra Pdf in Hindi
आगम शास्त्र यहाँ से डाउनलोड करें। 
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आगम शास्त्र (मंदिर बनाने का विज्ञान)

 

 

 

यह एक अत्यंत गूढ़ विज्ञान है। लेकिन अन्य लोगो ने अपनी सोच के कारण इसे बहुत ही बढ़ा कर बताया है। कुछ खास तरह के स्थानों के निर्माण को आगम शास्त्र कहा जाता है। इसे सही तरीके से करने पर ही पत्थर जैसी स्थूल वस्तु को भी एक सूक्ष्म ऊर्जा में रूपांतरित किया जा सकता है।

 

 

 

 

इस विज्ञान में ‘अपवित्र को पवित्र’ बनाने के बिषय में बताया गया है। आध्यात्म और तंत्र-मंत्र की विद्या में अंतर होता है। तंत्र-मंत्र भौतिक ऊर्जा के साथ काम करने की कला है। केदारनाथ मंदिर की ऊर्जा बहुत ही आध्यात्मिक है।

 

 

 

 

आध्यात्म उसे कहते है जहां जाने पर आपके मन को शांति का आभास हो और आपके अंदर फिर से अच्छी भावनाओ का उदय हो और आपके अंदर अच्छे विचार की और अच्छे कार्य के लिए प्रेरणा मिले उसे ही आध्यात्म कहते है।

 

 

 

 

दिव्यज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

बंधन का कारण – श्री कृष्ण कहते है – इस संसार में दिव्यज्ञान के समान कुछ भी उदात्त तथा शुद्ध नहीं है। ऐसा ज्ञान समस्त योग का परिपक़्व फल है। जो व्यक्ति भक्ति में सिद्ध हो जाता है यथा समय अपने अंतर में इस ज्ञान का आस्वादन करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जब हम दिव्यज्ञान की बात करते है तो हमारा प्रयोजन आध्यात्मिक ज्ञान से होता है। इसमें कोई भी शंका नहीं है कि दिव्यज्ञान सर्वथा उदात्त तथा शुद्ध है। जब कोई दिव्यज्ञान की अवस्था प्राप्त कर लेता है तो उसे अन्यत्र शंति खोजने की आवश्यकता नहीं रहती है।

 

 

 

अज्ञान ही भौतिक जगत में हमारे बंधन का कारण है और ज्ञान से ही मनुष्य की मुक्ति संभव है। यह ज्ञान भक्ति का परिपक़्व फल है क्योंकि वह ज्ञान मन ही मन शांति का आनंद लेता रहता है। दूसरे शब्दों में ज्ञान तथा शक्ति का पर्यवसान कृष्ण भावनामृत में होता है। भगवद्गीता के संदेश की यही चरम परिणति है।

 

 

 

 

39- इन्द्रिय शमन से ज्ञान प्राप्त की योग्यता – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है – जो श्रद्धालु दिव्यज्ञान में समर्पित है और जो इन्द्रिय निग्रह में प्रवीण है अर्थात जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है वह इस ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है और इसे प्राप्त करते ही तुरंत आध्यात्मिक शांति को प्राप्त होता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – श्री कृष्ण में दृढ विश्वास रखने वाला व्यक्ति ही इस तरह का कृष्ण भावना भावित ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों पर संयम रखे, वही पुरुष श्रद्धावान कहलाता है। जो यह सोचता है कि कृष्ण भावना भावित होकर कर्म करने से वह परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

 

 

 

जो व्यक्ति कृष्ण के प्रति श्रद्धावान है और जो इन्द्रियों को संयमित रखता है। वह शीघ्र ही कृष्ण भावनामृत के ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करता है। यह श्रद्धा भक्ति के द्वारा तथा हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। मंत्र के जाप द्वारा प्राप्त की जाती है क्योंकि इससे हृदय की सारी भौतिक मलिनता स्वतः दूर हो जाती है।

 

 

 

 

40-  श्रद्धा विहीन तथा संदेह से पतन – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है – जो अज्ञानी तथा श्रद्धा विहीन व्यक्ति शास्त्रो में संदेह व्यक्त करते है। वह भगवद भावनामृत प्राप्त करने में सदैव ही असफल रहते है और पतन के गर्त में गिर जाते है। संशयात्मा के लिए न तो इस लोक में न ही परलोक में कोई सुख है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवद्गीता सभी प्रामाणिक एवं मान्य शास्त्रों में सर्वोत्तम है। जो लोग पशुतुल्य है उनमे न तो प्रामाणिक शास्त्रों के प्रति कोई श्रद्धा होती है और न उनका ज्ञान होता है और कुछ लोगो को यद्यपि उनका ज्ञान नहीं होता है और उनमे से वह उद्धरण देते रहते है किन्तु उनमे वास्तविक रूप से विश्वास नहीं करते है।

 

 

 

ऐसे लोगो को कृष्ण भावनामृत का कोई ज्ञान नहीं होता वह नीचे गिरते रहते है। जो लोग ईश्वर तथा उनके वचन में श्रद्धा नहीं रखते उन्हें न तो संसार में और न ही भावी लोक में कुछ हाथ लगता है। उनके लिए किसी प्रकार का सुख नहीं है।

 

 

 

यहां तक कि कुछ लोग जिनमे भगवद्गीता जैसे शास्त्रों में श्रद्धा होती भी है, फिर भी न तो भगवान कृष्ण में विश्वास करते है न उनकी पूजा ही करते है। अतः मनुष्य को चाहिए कि श्रद्धा भाव से शास्त्रों के सिद्धांतो का पालन करे और ज्ञान प्राप्त करे। दूसरे शब्दों में आध्यात्मिक उत्थान में संसयग्रस्त मनुष्यो के लिए कोई स्थान नहीं रहता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि परंपरा से चले आ रहे महान आचार्यो के पद चिन्हो का अनुसरण करे और सफलता प्राप्त करे। इसी परंपरा के द्वारा प्राप्त ज्ञान से मनुष्य आध्यात्मिक अनुभूति के दिव्य पद तक पहुंच सकता है।

 

 

 

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