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Abhigyan Shakuntalam Pdf Hindi / अभिज्ञान शाकुंतलम पीडीऍफ़

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Abhigyan Shakuntalam Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Abhigyan Shakuntalam Pdf Hindi Download कर सकते हैं और आप यहां से Kalidas Book in Hindi Free Pdf Download  कर सकते हैं।

 

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Abhigyan Shakuntalam Pdf Hindi / अभिज्ञान शाकुंतलम Pdf

 

 

 

 

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Abhigyan Shakuntalam Pdf Hindi
अभिज्ञान शाकुंतलम पीडीएफ डाउनलोड यहां से करे।
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Abhigyan Shakuntalam Pdf Hindi
ललिता सहस्रनाम Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

तब भगवान बोले – हे नारद जी सुनो! जिससे तुम्हारा हित होगा मैं वही करूँगा, हमारा वचन झूठा नहीं होगा।

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- भगवान बोले – हे योगी मुन! सुनिए – मैंने तुम्हारा हित करने की ठानी है क्योंकि अगर रोगी वैद्य से कुपथ्य मांगे तो रोग से व्याकुल होने पर भी उसे वैद्य कुपथ्य नहीं देता। इसी तरह मैं भी तुम्हारे हित के लिए ही कार्य करूँगा।

 

 

 

2- नारद जी भगवान की माया के वशीभूत होने के कारण ही उनकी अगूढ़ (स्पष्ट) बातो को भी नहीं समझ सके थे। नारद जी वहां गए जहां स्वयंवर का स्थान बना हुआ था।

 

 

 

3- नारद जी मन में बड़े प्रसन्न थे कि मेरा रूप अतिसुंदर है, यह कन्या मुझे छोड़कर अन्य किसी का वरण नहीं करेगी, वहां राजाओ का समूह भी था जो खूब सज-धजकर बैठा था।

 

 

 

4- भगवान ने नारद के कल्याण हेतु उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया था जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। पर इस चरित्र को कोई नहीं जान सका। सबने उन्हें नारद जानकर ही प्रणाम किया।

 

 

 

133- दोहा का अर्थ-

 

 

 

वहां शिव जी के दो गण उपस्थित थे, उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण किया था। वह सब भेद जानते थे, बड़े मौज के साथ ही सारी लीला देख रहे थे।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- नारद जी को अपने रूप का बड़ा अभिमान था और वह बड़े ही गर्व के साथ जहां बैठे थे वही शिव जी के दोनों गण भी ब्राह्मण वेश में जाकर बैठ गए। ब्राह्मण का वेश होने के कारण ही उनकी इस चालाकी को कोई नहीं जान सका।

 

 

 

 

2- वह दोनों शिवगण नारद को लक्षित करके व्यंग वचन कहते थे कि भगवान ने इनको अच्छी सुंदरता प्रदान की है, हरि (वानर) जानकर इन्हे ही वरेगी क्योंकि इनकी सुंदरता देखकर राजकुमारी इनके ऊपर ही मुग्ध हो जाएगी।

 

 

 

 

3- यद्यपि मुनि उन दोनों शिवगणों की अटपटी बातें सुन रहे थे तो भी उन्हें मोह के कारण ज्ञान नहीं था क्योंकि उनका मन तो मायापति के माया के हाथ में था। दोनों शिवगण हंस रहे थे लेकिन नारद को यह सब अपनी प्रसंसा लग रही थी, भ्रम के कारण उन दोनों के हंसने का अभिप्राय नहीं समझ पा रहे थे।

 

 

 

 

4- इस स्वरुप को सिर्फ राजकन्या ने देखा, उसने नारद को बंदर के मुंह का देखते ही क्रोध में भर गई, यह विशेष चरित्र और कोई नहीं जान सका।

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

राजकुमारी अपने सखियों को साथ लेकर हंस की चाल से चलते हुए हाथ में वरमाला लेकर सब राजाओ को देखते हुए घूमने लगी।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- नारद जी जो अपने रूप के गर्व से तनकर बैठे थे, राजकुमारी ने उधर भूलकर भी नहीं देखा। नारद जी बार-बार राजकुमारी को देखकर उचकते और छटपटाते है, उनकी यह दशा भांपकर शिव जी के दोनों गण मुसकराने लगे।

 

 

 

2- कृपालु हरि भी राजा के वेश में वहां स्वयंवर में आये हुए थे। राजकुमारी ने उनको देखते ही उनके गले में जयमाला डाल दी और सभी राजाओ को निराश करते हुए, लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन ले गए।

 

 

 

3- राजकुमारी को जाते देखकर मुनि नारद की बुद्धि ऐसी हो गयी थी मानो उनकी गांठ से छूटकर मणि गिर गई हो। माया के कारण नारद की बुद्धि नष्ट हो गई थी। तब शिव के दोनों गणों ने हँसते हुए नारद से अपना मुंह दर्पण में देखने के लिए कहा।

 

 

 

 

4- इतना कहते हुए दोनों भयभीत होकर वहां से भाग खड़े हुए। तब नारद जी ने अपना मुंह जल में झांककर देखा और अपना रूप देखकर उन्हें बहुत क्रोध हो गया। उन्होंने दोनों शिवगणों को भयानक शाप दे दिया।

 

 

 

135- दोहा का अर्थ-

 

 

 

नारद जी क्रोध में भरकर बोले तुम दोनों कपटी पापी जाकर राक्षस हो जाओ तुमने हमे देखकर खूब हंसी उड़ाई अब उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनि की हंसी करना।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- नारद जी ने फिर अपना रूप जल में देखा तो उन्हें उनका पहले का स्वरुप प्राप्त हो गया था लेकिन उन्हें संतोष नहीं हुआ। उनके हृदय क्रोध से दहक रहे थे, वह तुरंत ही कमलापति भगवान के पास गए।

 

 

 

2- वह सोचते जाते थे अपने मन में कि – जाकर उन्हें (भगवान) को श्राप दे दूंगा या अपने प्राण दे दूंगा। उन्होंने हमारी जगत में हंसी (उपहास) कराई है। तभी उन्हें बीच रास्ते में ही भगवान दैत्यों के शत्रु मिल गए और साथ में वही राजकुमारी के रूप में लक्ष्मी जी थी।

 

 

 

 

3- तभी देवताओ के स्वामी ने पूछा – हे मुनि! व्याकुल होकर कहा जा रहे है। माया के वश में होने के कारण नारद को बोध नहीं था, भगवान के वचन सुनकर उन्हें बड़ा क्रोध आया।

 

 

 

4- नारद जी बोले – तुम दूसरो की संपदा कदापि नहीं देख सकते हो। समुद्र मथते ही शिव जी को बावला बना दिया तुमने देवताओ की सहायता से (प्रेरित करते हुए) उन्हें विष पान करा दिया क्योंकि तुम्हारे मन में सदैव ईर्ष्या और कपट भरा रहता है।

 

 

 

136- दोहा का अर्थ-

 

 

 

नारद जी क्रोध में विष्णु जी कहने लगे, तुम बड़े मतलबी हो, असुरो को मदिरा देकर और शिव जी को विष दे दिया और स्वयं लक्ष्मी और सुंदर कौस्तुभमणि को ले लिया, तुम सदा कपट का व्यवहार करते हो।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- नारद जी का क्रोध चरम सीमा पर है, वह विष्णु जी से कहते है – तुम भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। तुम्हारे सिरपर तो कोई है नहीं, तुम परम स्वतंत्र हो तथा जब जो भी मन को भाता है वही करते हो। हृदय में हर्ष विषाद कुछ भी नहीं लाते।

 

 

 

 

2- अब तक तुम्हे किसी ने भी साधा नहीं तुम सबको ठग-ठग कर अत्यंत निडर हो गए हो, इसीलिए मन में सदा उत्साह रहता है क्योंकि शुभ-अशुभ कर्म तुम्हे बाधा नहीं देते है।

 

 

 

 

3- अब तुमने हमारे जैसे आदमी से छेड़खानी की है तुम्हे अपने किए हुए का फल अवश्य मिलेगा, जिस तन को धारण करके तुमने हमे धोखा दिया है, तुम्हे भी वही शरीर धारण करना पड़ेगा, यह मेरा शाप है।

 

 

 

 

4- मैं जैसे स्त्री का वियोग सहते हुए दुखी हूँ, उसी प्रकार से तुम भी स्त्री के वियोग में दुःख उठाओगे तुमने हमारा रूप बंदर जैसा बना दिया था वही बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

 

 

 

137- दोहा का अर्थ-

 

 

 

श्री हरि ने नारद के शाप को अंगीकार कर लिया और उसे शीश पर धारण करते हुए, प्रभु ने नारद जी की भली प्रकार से विनती किया फिर कृपानिधान ने अपनी माया की प्रबलता को खींच लिया।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- जब भगवान ने अपनी माया को हटा लिया तब वहां न लक्ष्मी ही रह गई, न राजकुमारी ही थी। भगवान की माया के हटते ही मुनि ने भयभीत होकर श्री हरि के चरण पकड़ लिए और कहने लगे – हे शरणांगतो के दुखो को दूर करने वाले! मेरी रक्षा कीजिए।

 

 

 

 

2- तब नारद मुनि ने कहा – मैंने आपको अनेक प्रकार के दुर्वचन कहे है, मेरे पाप कैसे मिटेंगे? हे कृपालु मेरा शाप मिथ्या हो जाय? तब दीन दयाल भगवान ने कहा, यह सब मेरी इच्छा से हुआ है।

 

 

 

3- तब भगवान ने कहा – तुम जाकर शंकर के शतनाम का जप करो, इससे तुम्हे हृदय में शांति मिलेगी क्योंकि मुझे कोई भी शंकर के समान प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी नहीं छोड़ना।

 

 

 

 

4- हे नारद मुनि! अब मेरी यह माया तुम्हारे निकट नहीं आएगी। शिव जी जिस पर कृपा नहीं करते वही मेरी भक्ति नहीं पाता है। हृदय में ऐसा निश्चय करते हुए जाकर पृथ्वी पर विचरण करो।

 

 

 

 

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