Aapke Avchetan Man Ki Shakti Pdf / आपके अवचेतन मन की शक्ति Pdf

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Aapke Avchetan Man Ki Shakti Pdf आपके अवचेतन मन की शक्ति Pdf

 

 

 

 

 

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पतंजलि योग पद्धति – श्री कृष्ण कहते है जो दूसरे व्यक्ति है जो मन तथा इन्द्रियों को वश में करके आत्मसाक्षात्कार करना चाहते है। सम्पूर्ण इन्द्रियों तथा प्राणवायु के कार्यो को संयमित करके मन रूपी अग्नि में आहुति कर देते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर पतंजलि द्वारा सूत्रबद्ध योग पद्धति का निर्देश है। पतंजलि कृत योग सूत्र में आत्मा को प्रत्यगात्मा कहा गया है। जब तक जीवात्मा इन्द्रिय भोग में आसक्त रहता है तब तक वह परागात्मा कहलाता है और ज्यो ही वह इन्द्रिय भोग से विरत हो जाता है तो प्रत्यगात्मा कहलाने लगता है।

 

 

 

 

इस योग पद्धति के अनुसार प्रत्यगात्मा ही चरम उद्देश्य है। यह प्रत्यगात्मा पदार्थ की क्रियाओ से प्राप्त की जाती है। जीवात्मा के शरीर में दस प्रकार के वायु कार्यशील रहते है और इसे श्वास प्रक्रिया (प्राणायाम) द्वारा जाना जाता है।

 

 

 

इन्द्रिया इन्द्रिय विषयो से प्रतिक्रिया करती है यथा कान सुनने के लिए, आंख देखने के लिए, जीभ स्वाद के लिए तथा स्पर्श के लिए हाथ है और यह सब इन्द्रिया आत्मा से बाहर के कार्यो में लगी रहती है। यही कार्य प्राणवायु के व्यापार (क्रियाये) है।

 

 

 

पतंजलि योग पद्धति बताती है कि किस तरह शरीर के वायु के कार्यो को तकनिकी उपाय से नियंत्रित किया जाय, जिससे अंततः वायु के सभी आंतरिक कार्य आत्मा को भौतिक आसक्ति से शुद्ध करने में सहायता कर सके। अपान वायु नीचे की ओर जाती है। व्यान वायु से संकोच तथा प्रसार होता है, समान वायु से संतुलन बना रहता है और उदान वायु ऊपर की ओर जाती है और जब मनुष्य प्रबुद्ध हो जाता है तो वह इन सभी वायु को आत्म-साक्षात्कार की खोज में प्रयुक्त करता है।

 

 

 

यज्ञो का वर्गीकरण

 

 

 

Aapke Avchetan Man Ki Shakti Pdf
Aapke Avchetan Man Ki Shakti Pdf

 

 

 

यहां पर यज्ञो के अनेक प्रकार बताए गए है यथा कठोर व्रत सम्पति का त्याग, कठिन तपस्या इत्यादि। कुछ लोग कठोर व्रत अंगीकार करके, कुछ लोग अपनी सम्पति का परित्याग करके, कुछ कठिन तपस्या के द्वारा तथा कुछ अष्टांग योग पद्धति के अभ्यास द्वारा अथवा दिव्य ज्ञान में उन्नति करने के लिए वेदो के अध्ययन के द्वारा प्रबुद्धता प्राप्त करते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दो के तात्पर्य – इन यज्ञो के कई वर्ग किए जा सकते है। बहुत से लोग विविध प्रकार के दान-पुण्य के द्वारा अपनी सम्पति का यजन करते है। भारत में धनाढ्य व्यापारी या राजवंश के लोग अनेक प्रकार की धर्मार्थ संस्थाए खोल देते है। यथा धर्मशाला, अन्न क्षेत्र, अतिथि गृह, अनाथाश्रम तथा विद्यालय, अन्य देशो में भी अनेक अस्पताल, वृद्ध जनो के लिए आश्रम तथा गरीबो के लिए भोजन की व्यवस्था, शिक्षा तथा चिकित्सा की सुविधा प्रदान करने के संस्थान यह सब दान कर्म द्रव्यमय यज्ञ की श्रेणियां है।

 

 

 

 

कुछ लोग ऐसे भी है जो अनेक योग पद्धतियों का अनुसरण करते है। यथा पतंजलि पद्धति (ब्रह्म में तदाकार होने के लिए) अथवा हठयोग या अष्टांगयोग (विशेष सिद्धियों के लिए) कुछ लोग समस्त तीर्थ स्थानों की यात्रा करते है। यह सब अनुष्ठान योग-यज्ञ कहलाते है।

 

 

 

अन्य लोग जीवन में उन्नति करने अथवा उच्च लोको में जाने के लिए चन्द्रायण तथा चातुर्मास्य जैसे विविध तप करते है। इन विधियों के अंतर्गत कतिपय कठोर नियमो के अधीन कठिन व्रत करने होते है। उदाहरण के लिए – चातुर्मास्य व्रत रखने वाले वर्ष के चार मासो में (जुलाई से अक्टूबर तक) बाल नहीं काटते है, न ही कतिपय खाद्य वस्तु ही खाते है, न ही दिन में दो बार खाते है अर्थात एक बार ही भोजन ग्रहण करते है और अपने निवास स्थान को छोड़कर कही नहीं जाते है। जीवन के सुखो का परित्याग तपोमय यज्ञ कहलाता है।

 

 

 

 

कुछ लोग ऐसे है जो विभिन्न वैदिक साहित्य तथा उपनिषद तथा वेदांत सूत्र या सांख्य दर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाते है, इसे स्वाध्याय यज्ञ कहा जाता है। यह सारे योगी विभिन्न प्रकार के यज्ञो में लगे रहते है और उच्च जीवन की तलाश में रहते है जो भौतिक जगत में किसी सिद्धि विशेष के लिए किए जाते है। किन्तु कृष्ण भावनामृत इन सबसे पृथक है क्योंकि यह परमेश्वर की प्रत्यक्ष सेवा है। इसे उपर्युक्त किसी भी यज्ञ से प्राप्त करना संभव नहीं है। अपितु भगवान तथा उनके प्रामाणिक भक्तो की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है। फलतः कृष्ण भावनामृत दिव्य है।

 

 

 

 

 

 

29- श्वास को रोकने की विधि (प्राणायाम) – श्री कृष्ण कहते है – अन्य लोग भी है जो अपनी श्वास को रोककर समाधि में रहने का प्रयास (प्रणायाम) के द्वारा करते है। वह अपान में प्राण और प्राण में अपान को रोकने का अभ्यास करते है और अंत में प्राण-अपान को रोककर समाधि में रहते है अन्य योगी कम भोजन करके प्राण की प्राण में ही आहुति देते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – आरंभ में हठयोग के विविध आसनो की सहायता से इसका अभ्यास किया जाता है। श्वास को रोकने की योग विधि प्राणायाम कहलाती है। यह सारी विधिया इन्द्रियों को वश में करने तथा आत्म-साक्षात्कार की प्रगति के लिए संस्तुत की जाती है।

 

 

 

प्राणायाम में योगी विपरीत दिशा में श्वास लेने का तब तक अभ्यास करता है जब तक दोनों वायु (प्राण-अपान) उदासीन होकर पूरक अर्थात सम अवस्था में नहीं आ जाती है। इस विधि से शरीर के भीतर वायु को रोका जाता है जिससे वायु की गति की दिशा विपरीत हो सके। अपान वायु अधोमुखी (निम्नगामी) है और प्राण वायु की दिशा उर्ध्वगामी (ऊपर की ओर) होती है।

 

 

 

 

अपान वायु और प्राण वायु के योग को रेचक क्रिया कहते है जो योग का ही एक सोपान है। जब प्राणवायु और अपान वायु को पूर्ण रूपेण रोक दिया जाता है तो इस विद्या को कुम्भक योग कहते है। आत्म सिद्धि के लिए मनुष्य कुम्भक योगाभ्यास द्वारा जीवन की अवधि बढ़ा सकता है। किन्तु भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में स्थित रहने के कारण मनुष्य कृष्ण भावना भावित होकर स्वतः इन्द्रियों का नियंता (इन्द्रियों पर नियंत्रण करने वाला, जितेन्द्रिय) बन जाता है।

 

 

 

 

बुद्धिमान योगी एक ही जीवन काल में सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक रहता है। वह दूसरे जीवन की प्रतीक्षा नहीं करता। कृष्ण की सेवा में तत्पर रहने के कारण मनुष्य की चंचल इन्द्रियों को अन्य कही किसी भी कार्य में प्रवृत्त होने का अवसर ही नहीं प्राप्त होता है।

 

 

 

फलतः जीवन के अंत समय में कृष्ण भावना भावित व्यक्ति को स्वतः भगवान कृष्ण के दिव्य पद पर स्थानांतरित कर दिया जाता है। अतः वह दीर्घ जीवी होने के लिए प्रयास नहीं करता है। उसे तुरंत ही मोक्ष पद मिल जाता है जैसा कि भगवद्गीता में (14. 26) कहा गया है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति दिव्य अवस्था से प्रारंभ करता है और निरंतर उसी चेतना में जागृत रहता है। “जो व्यक्ति भगवान की निश्छल भक्ति में प्रवृत्त होता है, वह प्रकृति के गुणों को लांघ जाता है और तुरंत ही आध्यात्मिक पद को प्राप्त होता है।” अतः उसका पतन नहीं होता है और अंततः वह भगवद्धाम को जाता है।

 

 

 

कृष्ण प्रसादम को खाते रहने से स्वतः ही कम खाने की आदत बन जाती है जिससे इन्द्रिय निगृह में सहायता प्राप्त होती है। इन्द्रिय निगृह के मामले में कम भोजन करना (अल्पाहार) अत्यंत लाभदायक होता है और इन्द्रिय निगृह किए बिना इस संसार रूपी भवसागर के भव बंधन से निकल पाना कदापि संभव नहीं है।

 

 

 

 

30- यज्ञ से मजबूत आधार – श्री कृष्ण कहते है – हे अर्जुन, जो व्यक्ति हमेशा किसी न किसी यज्ञ में लगा रहता है उसे यज्ञ से एक सुदृढ़ आधार स्तम्भ प्राप्त होता है जो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कारक होता है। यह सभी यज्ञ करने वाले यज्ञो का अर्थ जानने के कारण पाप कर्मो से मुक्त हो जाते है और यज्ञो के फल रूप में अमृत को चखते हुए परम् दिव्य आकाश की ओर निरंतर बढ़ते जाते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अतः जब इन्द्रिय तृप्ति से भिन्न धरातल पर स्थित न हुआ जाय तब तक सच्चिदानंद के नित्य धरातल तक उठ पाना संभव ही नहीं है। विभिन्न प्रकार के यज्ञो (यथा द्रव्य यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, योग यज्ञ) की उपर्युक्त व्याख्या से यह दृष्टिगत होता है कि इन सारे उपक्रमों का एक ही लक्ष्य है वह है इन्द्रिय का निगृह। इन्द्रिय तृप्ति ही भौतिक अस्तित्व का मूल कारण है।

 

 

 

उपर्युक्त सारे यज्ञो से सांसारिक पाप कर्मो से विमल हुआ जा सकता है। जीवन में इस प्रगति से मनुष्य न केवल सुखी और ऐश्वर्यवान बनता है अपितु अंत में वह निराकार ब्रह्म के साथ तादात्म के द्वारा या भगवान श्री कृष्ण की संगति प्राप्त करके भगवान के शाश्वत धाम को प्राप्त करता है और यह शाश्वत धाम नित्य आकाश या ब्रह्म आकाश में है।

 

 

 

 

 

31- यज्ञ एक सत्य – श्री कृष्ण कहते है – हे कुरु श्रेष्ठ, कौन्तेय, अर्जुन – जब यज्ञ के बिना मनुष्य इस लोक अथवा जीवन में ही सुख पूर्वक नहीं रह सकता तो फिर अगले जन्म में कैसे रह सकेगा ?

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अज्ञानता और अज्ञान ही पाप पूर्ण जीवन का कारण है और पाप पूर्ण जीवन ही इस भौतिक जगत में अस्तित्व का कारण बनता है। मनुष्य जीवन ही वह द्वार है जिससे होकर ही इस भव बंधन से बाहर निकला जा सकता है। मनुष्य इस लोक में चाहे जिस रूप में रहे वह अपने स्वरुप से अनभिज्ञ रहता है। दूसरे शब्दों में भौतिक जगत में हमारा अस्तित्व हमारे पाप-पुण्य जीवन के बहुगुणित जीवन के कारण ही है।

 

 

 

अतः वेद हमे धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का मार्ग दिखाकर इस भौतिक जगत के बंधन से बाहर निकलने का अवसर प्रदान करते है। धर्म या ऊपर संस्तुत यज्ञ अनेक प्रकार से हमारी आर्थिक समस्याओ को स्वतः ही समाधान प्रदान करते है।

 

 

 

जब शरीर की आवश्यकता पूर्ण होती रहती है तब इन्द्रियों की तुष्टिकरण की बारी आती है। अतः वेदो में नियमित इन्द्रिय तृप्ति के लिए पवित्र विवाह का विधान किया गया है। जन संख्या में वृद्धि होने पर भी यज्ञ संपन्न करने से हमे प्रचुर भोजन, प्रचुर दूध इत्यादि मिलता रहता है।

 

 

 

मुक्त जीवन की पूर्णता परमेश्वर का सानिध्य प्राप्त करने को है। यह पूर्णता यज्ञ संपन्न करके ही प्राप्त की जाती है। इस प्रकार मनुष्य भौतिक बंधन से क्रमशः छूटकर उच्च पद की ओर अग्रसर होता है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, फिर भी यदि कोई व्यक्ति वेदो के अनुसार यज्ञ करने के लिए तत्पर नहीं होता है तो वह इस शरीर में सुखी जीवन की आशा कैसे कर सकता है। फिर दूसरे लोक में दूसरे शरीर से सुखी जीवन की आशा तो व्यर्थ ही है।

 

 

 

 

विभिन्न स्वर्गो में भिन्न-भिन्न प्रकार की जीवन की सुविधाए है और जो लोग यज्ञ करने में लगे है उनके लिए तो सर्वत्र ही परम् सुख विद्यमान रहता है। किन्तु सर्वश्रेष्ठ सुख तो वह है जिसे मनुष्य कृष्ण भावनामृत के अभ्यास द्वारा बैकुंठ जाकर प्राप्त करता है। अतः कृष्ण भावनामृत में गोता अवश्य ही लगाना चाहिए इसी में मानव जीवन की पूर्णता और सार्थकता निहित है

 

 

 

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